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सबक: आसमानी मुद्दे न उठाए बीजेपी, तो चुनाव से दूर रहे गांधी परिवार

निहार रंजन सक्सेना  |   Updated On : October 24, 2019 05:40:09 PM
सांकेतिक चित्र

सांकेतिक चित्र (Photo Credit : (फाइल फोटो) )

ख़ास बातें

महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव ने बड़े नेताओं के समक्ष खड़े किए सवाल.
परिणामों का सबक साफ है. बीजेपी जमीन पर रहे और कांग्रेस चुनाव से दूर.
क्षेत्रीय नेताओं का उभार बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए राहत की बात है.

नई दिल्ली:  

महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव परिणामों का सीधा असर कई राष्ट्रीय और प्रादेशिक नेताओं के राजनीतिक भविष्य पर पड़ना तय है. खासकर जब इन दोनों विधानसभाओं चुनावों में सत्तारूढ़ दल ने स्थानीय मुद्दों को दरकिनार कर राष्ट्रीय मुद्दों को जमकर उछाला. इस तरह दोनों राज्यों की बीजेपी सरकारों ने एक 'नैरेटिव' बनाने की कोशिश की, जो हरियाणा में तो नाकाम रहा, साथ ही महाराष्ट्र में भी बीजेपी के लिए पिछले विधानसभा के तुलना में प्रदर्शन कमजोर करने वाला ही साबित हुआ. इससे एक बड़ा सबक तो यही मिलता है कि जमीनी मुद्दों को दरकिनार कर आसमानी बातें करना हमेशा फायदे का सौदा साबित नहीं होता है.

नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी निस्संदेह लोकप्रिय नेता हैं और इस बात को समझते हुए दोनों राज्यों में उन्होंने 16 रैलियां की. उन्होंने इन रैलियों में राष्ट्रीय मुद्दों को उठाते हुए अपने दूसरे कार्यकाल के पांच महीनों की उपलब्धियों को ही भुनाने की कोशिश की. इसमें भी कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाना उन्होंने बतौर राष्ट्रवाद पेश किया. मोदी यह कहना नहीं भूले कि केंद्र और राज्य में बीजेपी की 'डबल इंजन' सरकार होने का फायदा विकास के रूप में सामने आएगा. 2014 में देवेंद्र फड़णनवीस और मनोहरलाल खट्टर के रूप में दो अनजान से चेहरों को बतौर मुख्यमंत्री पेश कर उन्होंने एक बड़ा दांव चला था. यह दांव 2019 में महाराष्ट्र में सफल रहा, तो हरियाणा में बैक फायर कर गया. हरियाणा विधानसभा चुनाव परिणाम बीजेपी के लिए चिंता का सबब है. जमीनी स्तर की बात की जाए तो अर्थव्यवस्था से जुड़े मसले थे, जो अब और बड़े बनकर सामने आएंगे. मोदी सरकार के लिए इन्हें त्वरित स्तर पर निपटना अब उनकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. हरियाणा के परिणाम यह भी बताते हैं कि स्थानीय मुद्दों को दरकिनार नहीं किया जा सकता है. राष्ट्रीय मसले कभी भी स्थानीय मसलों का विकल्प नहीं बन सकते. इसके साथ ही बीजेपी आलाकमान को यह भी गहराई से समझना होगा कि बीजेपी और मोदी को एक ही तराजू में पेश करने की भी अपनी एक सीमा होती है.

अमित शाह
बतौर गृहमंत्री अमित शाह के लिए यह पहले विधानसभा चुनाव थे. गृहमंत्री के साथ ही वह पार्टी अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी निभा रहे थे. दोनों ही राज्यों में अमित शाह ने प्रचार की रणनीति तैयार की थी और बेहद सघनता के साथ चुनाव प्रचार भी किया था. ऐसे में महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम उन्हें कुछ हद तक राहत दे सकते हैं और हरियाणा से उन्हें निराशा ही हाथ लगी. इसके बाद संगठन के स्तर पर नए सिरे से मेहनत करना जरूरी हो गया है. हरियाणा में निराशाजनक प्रदर्शन ने कार्यवाहक अध्यक्ष जेपी नड्डा के लिए भी काफी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. हालांकि इसका यह मतलब भी नहीं है कि शाह का कद कमतर हो जाएगा. वह पार्टी के लिए अभी भी मुख्य रणनीतिककार और पार्टी के दूसरे नंबर के बड़े नेता ही बने रहेंगे. हालांकि उन्हें अब फिर से रणनीति पर विचार करना होगा. खासकर यह देखते हुए कि जातिगत राजनीति के मामले में गैर प्रभावी जातियों पर फोकस करने की कीमत बीजेपी को प्रभावी जातियों की फटकार के रूप में झेलनी पड़ी है. इस बात को हरियाणा के मतदाताओं के रुझान से समझा जा सकता है, जहां जाट वोटरों ने बीजेपी को अपना हितैषी नहीं समझा. इसके साथ ही यह भी पता चलता है कि कश्मीर और नागरिकता बिल की भी बतौर चुनावी मुद्दा अपनी सीमाएं हैं.

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देवेंद्र फड़णनवीस
महाराष्ट्र में जो चुनावी नतीजे आए हैं, उससे फड़णनवीस बीजेपी के लिए एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय नेता के रूप में उभरे हैं. नागपुर से आए एक अनजान से और राजनीतिक दांव-पेंच से दूर ब्राह्मण ने बेहद कठोरता के साथ अपने राजनीतिक कौशल का परिचय दिया. इसके बलबूते फड़णनवीस ने न सिर्फ अपने विरोधियों पर लगाम कसी, बल्कि एक हद तक सरकार से नाराज चल रही जातियों को साधने में भी कुशलता का परिचय दिया. साथ-साथ विपक्ष के नेताओं को पार्टी से जोड़कर बीजेपी की ग्राह्यता बढ़ाने में महती भूमिका निभाई. वह दूसरी बार राज्य के सीएम की कुर्सी संभालने के साथ ही लंबे समय तक शासन करने वाले दूसरे मुख्यमंत्री हो जाएंगे. हालांकि अगर बीजेपी को पिछली बार की तुलना में ज्यादा सीटें नहीं मिलती हैं, तो उन्हें सहयोगी दलों और ऊर्जावान विपक्ष से निपटने में खासी चुनौती आ सकती है. राज्य के आकार, संसाधनों और राजनीतिक महत्व को देखते हुए फड़णनवीस का कद बढ़ना तय है. फिर भी उनके समक्ष चुनौतियां कम नहीं होंगी.

सोनिया गांधी
कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष बतौर वापसी करने के बाद सोनिया गांधी के लिए यह पहला चुनाव था. उन्हें विरासत में मृतप्रायः पार्टी ही मिली थी. लगातार दूसरे लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था. ऐसे में दो राज्यों के विधानसभा चुनाव के लिहाज से उनके पास तैयारी के लिए ज्यादा वक्त नहीं था. कह सकते हैं कि भले ही देर से सही उन्होंने कुछ कठोर निर्णय किए. इसमें भी प्रमुख तौर पर हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा को कांग्रेस की कमान दोबारा सौंपना शामिल रहा. फिर भी हरियाणा में उत्साहवर्धक प्रदर्शन से कांग्रेस का संकट खत्म होने वाला नहीं. राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के पास राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा कोई बड़ा चेहरा नहीं है, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को न सिर्फ चुनौती दे सके, बल्कि कांग्रेस में नई जान भी फूंक सके. महाराष्ट्र के चुनाव परिणामों ने कांग्रेस के शिकस्त के घावों को और हरा करने का ही काम किया है. साथ ही पार्टी कैडर का मनोबल भी औऱ टूटा है. खासकर यह देखते हुए कि वहां एनसीपी अब मुख्य विपक्षी दल बतौर उभर कर सामने आई है. दूसरे हरियाणा ने स्थानीय स्तर पर प्रभाव रखने वाले नेताओं की भूमिका साफतौर पर रेखांकित कर दी है, वहीं इसी आलोक में नेहरू-गांधी परिवार की प्रासंगिकता पर भी सवालिया निशान खड़ा कर दिया है.

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राहुल गांधी
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव ने एक बार फिर राहुल गांधी के नेतृत्व की सीमाओं को रेखांकित करने का काम किया है. लोकसभा चुनाव परिणाम सामने आने के बाद पार्टी अध्यक्ष पद से भले ही राहुल गांधी ने किनारा कर लिया हो, लेकिन पार्टी में उनकी भूमिका नीति-निर्धारक और कांग्रेस के प्रमुख चेहरे बतौर कतई कम नहीं हुई है. राहुल गांधी ने देर से प्रचार शुरू किया और महज सात रैलियां ही की. उस पर वह लोकसभा चुनाव से सबक नहीं सीखते हुए एक बार फिर राफेल का मुद्दा उठाने से बाज नहीं आए. सिर्फ यहीं वह गलत साबित नहीं हुए, बल्कि हुड्डा को दरकिनार रखने का परिणाम भी उनके सामने आया. अगर हुड्डा समय रहते कांग्रेस की कमान संभाल लेते, तो राज्य में कांग्रेस का प्रदर्शन कुछ और ही होता. जब राहुल गांधी ने कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ा था, तो माना जा रहा था कि वह सांगठनिक भूमिका से कहीं ज्यादा अब बीजेपी के खिलाफ आंदोलन खड़ा करने के लिए जरूरी जमीन तैयार करने में लगाएंगे, लेकिन उन्होंने यह मौका एक बार फिर से खो दिया. ऐसे में अब कतई स्पष्ट नहीं है कि भविष्य के लिहाज से उनकी राजनीतिक भूमिका क्या होने वाली है. अब तो राहुल गांधी को अपनी छवि पर ही नए सिरे से काम करने की जरूरत आन पड़ी है. खासकर परिणामों के बाद यह तय करना उनके लिए मुश्किल होगा कि वह संगठन से दूर ही रहें या फिर से वापस लौट कर आएं.

शरद पवार
भारतीय राजनीति के एक दिग्गज खिलाड़ी नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के शरद पवार अपनी उम्र और खराब सेहत के बावजूद महाराष्ट्र में बेहतरीन लड़ाई लड़ने में कामयाब रहे. हालांकि पवार अपनी लंबी राजनीतिक पारी के लिहाज से पहली बार एक गंभीर और चुनौतीपूर्ण संकट से जूझ रहे हैं. यह संकट आया है परिवार में टकराव के रूप में. उनका परिवार बंट चुका है और प्रभावी क्षत्रप पार्टी छोड़ कर जा चुके हैं. पश्चिमी महाराष्ट्र जो उनका गढ़ माना जाता था, वहां बीजेपी ने अपनी मजबूत घुसपैठ दर्ज कराई है. यही नहीं, मराठों में ही उनकी पैठ पर सेंध लग रही है. भले ही चरणबद्ध तरीके से शरद पवार इन सभी चुनौतियों से निपट लें, लेकिन राज्य में मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरने के साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने अपने से अपेक्षाएं बढ़ा ली हैं. कांग्रेस को महाराष्ट्र में तीसरे स्थान पर धकेल कर पवार ने कहीं न कहीं यह भी साबित किया है कि मूलतः खांटी कांग्रेसी बतौर रणनीतिक कौशल को कांग्रेस के नए चेहरे चुनौती नहीं दे सकते हैं.

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उद्धव और आदित्य ठाकरे
हालिया चुनाव बाप-बेटे के लिए मिश्रित परिणाम देने वाला रहा. उन्होंने अपने पिता के छोड़कर गए राज ठाकरे की चुनौती को समाप्त कर उन्हें राजनीतिक हाशिये पर ढकेलने का काम किया है. इस तरह उन्होंने खुद को बाला साहब ठाकरे का असली उत्तराधिकारी ही साबित किया है. फिर वह सरकार का भी हिस्सा रहेंगे, जिसका प्रभाव अलग होगा. बीजेपी अपने दम पर बहुमत साबित नहीं कर सकी है, इससे शिवसेना की बीजेपी पर पकड़ और मजबूत होगी. पहली बार चुनावी समर में उतरे आदित्य जीत कर आने के बाद सरकार का हिस्सा बनने में सफल रहेंगे. हालांकि इस सबके बावजूद सच्चाई यही है कि बीजेपी गठबंधन में 'बड़े भाई' की ही भूमिका में रहेगी. शिवसेना को इसके दीर्घकालिक परिणाम झेलने के लिए तैयार रहना होगा. शिवसेना हमेशा बीजेपी के साये में रहेगी. अब शिवसेना को ही यह तय करना होगा कि वह इस स्थान से खुश है या अपने लिए अलग जगह बनाने की जरूरत कहीं और ज्यादा हो गई है.

भूपेंदर सिंह हुड्डा
हरियाणा के दो बार मुख्यमंत्री और उत्तर भारत में कांग्रेस के बड़े और प्रभावी नेता रहे भूपेंदर सिंह हुड्डा के लिए बीते पांच साल अपने ही लोगों से लड़ने में बीते हैं. ऐसे में उन्हें जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ और मजबूत रखने के लिए कई यात्राएं करनी पड़ी. बीते सितंबर में ही सोनिया गांधी ने उन्हें सूबे की कमान दोबारा सौंपी. हुड्डा ने इस जिम्मेदारी के साथ दिखा दिया कि पार्टी के पुराने सिपाहसालारों में न सिर्फ दमखम है, बल्कि संसाधन भी हैं कि वह सत्ता में वापसी कर बीजेपी के समक्ष तगड़ी चुनौती पेश कर सकती है. जाट मतदाताओं को फिर से जोड़ना, स्थानीय प्रत्याशियों के चयन और जातिगत गठबंधन के समीकरण अच्छे से साधते हुए हुड्डा ने हरियाणा में कांग्रेस को बीजेपी के समक्ष ला खड़ा किया है. उन्होंने साबित किया है कि अगर स्थानीय मुद्दों को सलीके से उठाया जाए, तो बीजेपी को अच्छी चुनौती दी जा सकती है. उनकी अगली परीक्षा अब सरकार बनाने के लिए राजनीतिक संतुलन साधने की होगी. अगर वह गैर बीजेपी सरकार बनाने में सफल रहते हैं तो हुड्डा का कदम राष्ट्रीय राजनीति में और बढ़ना तय है.

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दुष्यंत चौटाला
हरियाणा के चुनाव परिणामों के साथ ही राज्य की राजनीति में दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी ने जोरदार दस्तक दी है. पिछले साल ही नई पार्टी बनाना और भारतीय राष्ट्रीय लोकदल से नाता तोड़ना एक साहसी कदम कहे जा सकते हैं. दुष्यंत निश्चंत तौर पर राज्य की राजनीति में तीसरी ताकत बनकर उभरे हैं. इसके साथ ही ओमप्रकाश चौटाला का राजनीतिक कैरियर भी संभवतः समाप्त माना जाएगा. फिलहाल शिक्षक भर्ती घोटाले में ओमप्रकाश चौटाला जेल में बंद हैं और उनका जाट वोट बैंक जेजेएन में आ गया है. तीस के वय के दुष्यंत आने वाले समय में हरियाणा में क्षेत्रीय ताकत की कमी को प्रभावी ढंग से दूर रख सकते हैं.

मनोहर लाल खट्टर
एक पंजाबी मनोहर लाल खट्टर को जब राज्य के सीएम पद की जिम्मेदारी दी गई थी, तो जाट बाहुल्य वाले राज्य में सभी को आश्चर्य हुआ था. एक नेता जिसे प्रशासकीय अनुभव नहीं रहा सूबे की कानून-व्यवस्था के प्रश्न पर नाकाम रहा. खासकर बतौर सीएम शुरुआती सालों में राज्य की कानून-व्यवस्था के चौपट होने का ठीकरा मनोहर लाल खट्टर के सिर पर ही फोड़ा जाता रहा. हालांकि भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद पर अंकुश लगाकर उन्होंने अपनी जगह बनाने में सफलता जरूर हासिल की. हालांकि जाहिर है कि यह सब उनके काम नहीं आया और वह आधी संख्या भी पार नहीं कर सके. बीजेपी आलाकमान के 75 पार का दावा तो बहुत दूर की बात है. खट्टर की हार के साथ ही यह तय हो गया है कि बीजेपी राज्यों में अजेय नहीं है और सत्ता विरोधी रुझान उसे जमीन पर ला सकता है. खट्टर फिलवक्त एक निराश शख्स हैं, जिनसे पार्टी आलाकमान कुछ सवालों के जवाब जरूर चाहेगा.

First Published: Oct 24, 2019 05:40:09 PM
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