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जानिए क्या है कुंभ, अर्धकुंभ और सिंहस्थ के पीछे का इतिहास

NEWS STATE BUREAU  |   Updated On : December 16, 2018 10:05 AM
जानें कुंभ के पीछे की कहानी

जानें कुंभ के पीछे की कहानी

नई दिल्ली:  

कुंभ मेले का आयोजन चार जगहों हरिद्वार, प्रयागराज(प्रयाग), नासिक और उज्जैन में किया जाता है. यू तो देश में कुंभ मेले का आयोजन बहुत पुराने समय से हो रहा है. लेकिन क्या आपको यह मालूम है कि कुंभ मेले का प्रथम लिखित प्रमाण महान बौद्ध तीर्थयात्री ह्वेनसांग के लेख से मिलता है जिसमें छठवी शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के शासन में होने वाले कुंभ का प्रसंगवान वर्णन किया गया है.

शास्त्रों के अनुसार इन चार विशेष स्थानो पर  जिन पर कुंभ मेले का आयोजन होता है. नासिक में गोदावरी नदी के तट पर, उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर, हरिद्वार और प्रयाग में गंगा नदी के तट पर. सबसे बड़ा मेला कुंभ 12 वर्षो के अन्तराल में लगता है और 6 वर्षो के अन्तराल में अर्द्ध कुंभ के नाम से मेले का आयोजन होता है. वर्ष 2019 में आयोजित होने वाले प्रयाग में अर्द्ध कुंभ मेले का आयोजन होने वाला है.

इसके बाद साल 2022 में हरिद्वार में कुंभ मेला होगा और साल 2025 में फिर से इलाहाबाद में कुंभ का आयोजन होगा और साल 2027 में नासिक में कुंभ मेला लगेगा.

जानें क्या है कुंभ की कथा- कहा जाता है कि अमृत पर अधिकार को लेकर देवता और दानवों के बीच लगातार बारह दिन तक युद्ध हुआ था. जो मनुष्यों के बारह वर्ष के समान हैं. अतएव कुंभ भी बारह होते हैं. उनमें से चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और आठ कुंभ देवलोक में होते हैं. समुद्र मंथन की कथा में कहा गया है कि कुंभ पर्व का सीधा सम्बन्ध तारों से है. अमृत कलश को स्वर्गलोक तक ले जाने में जयंत को 12 दिन लगे. पुराणो के अनुसार देवों का एक दिन मनुष्यों के 1 वर्ष के बराबर होता है. इसीलिए तारों के क्रम के अनुसार हर 12वें वर्ष कुंभ पर्व विभिन्न तीर्थ स्थानों पर आयोजित किया जाता है.


यह भी पढ़ें- कुंभ से पहले विकास कार्य पूरे होने में इलाहाबाद HC ने जताया संदेह, योगी सरकार से मांगी रिपोर्ट

कहा जाता है कि युद्ध के दौरान सूर्य, चंद्र और शनि आदि देवताओं ने कलश की रक्षा की थी, अतः उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, तब कुंभ का योग होता है और चारों पवित्र स्थलों पर प्रत्येक तीन वर्ष के अंतराल पर क्रमानुसार कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है.

तीन वर्ष में आता है कुंभ- हरिद्वार, प्रयागराज, नासिक और उज्जैन उक्त चार स्थानों पर प्रत्येक तीन वर्ष के अंतराम में कुंभ का आयोजन होता है, इसीलिए किसी एक स्थान पर प्रत्येक 12 वर्ष बाद ही कुंभ का आयोजन होता है. जैसे अभी प्रयागराज में कुंभ का अयोजन हो रहा है, तो उसके बाद अब तीन वर्ष बाद हरिद्वार, फिर अगले तीन वर्ष बाद उज्जैन और फिर अगले तीन वर्ष बाद नासिक में कुंभ का आयोजन होगा. उसके तीन वर्ष बाद फिर से प्रयागराज में कुंभ का आयोजन होगा. उज्जैन के कुंभ को सिंहस्थ कहा जाता है.

जानें कुंभ क्या है- कलश को कुंभ कहा जाता है. कुंभ का अर्थ होता है घड़ा. इस पर्व का संबंध समुद्र मंथन के दौरान अंत में निकले अमृत कलश से जुड़ा है. देवता-असुर जब अमृत कलश को एक दूसरे से छीन रह थे तब उसकी कुछ बूंदें धरती की तीन नदियों में गिरी थीं. जहां जब ये बूंदें गिरी थी उस स्थान पर तब कुंभ का आयोजन होता है. उन तीन नदियों के नाम है:- गंगा, गोदावरी और क्षिप्रा.

जानें अर्धकुंभ क्या है- अर्ध का अर्थ होता है आधा. हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का आयोजन होता है. पौराणिक ग्रंथों में भी कुंभ एवं अर्ध कुंभ के आयोजन को लेकर ज्योतिषीय विश्लेषण उपलब्ध है. कुंभ पर्व हर 3 साल के अंतराल पर हरिद्वार से शुरू होता है. हरिद्वार के बाद कुंभ पर्व प्रयागराज नासिक और उज्जैन में मनाया जाता है. प्रयाग और हरिद्वार में मनाए जानें वाले कुंभ पर्व में एवं प्रयाग और नासिक में मनाए जाने वाले कुंभ पर्व के बीच में 3 सालों का अंतर होता है. यहां माघ मेला संगम पर आयोजित एक वार्षिक समारोह है.

जानें सिंहस्थ क्या है- सिंहस्थ का संबंध सिंह राशि से है. सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर उज्जैन में कुंभ का आयोजन होता है. इसके अलावा सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुंभ पर्व का आयोजन गोदावरी के तट पर नासिक में होता है. इसे महाकुंभ भी कहते हैं, क्योंकि यह योग 12 वर्ष बाद ही आता है. इस कुंभ के कारण ही यह धारणा प्रचलित हो गई की कुंभ मेले का आयोजन प्रत्येक 12 वर्ष में होता है, जबकि यह सही नहीं है.

कुंभ पर्व और ग्रहों का संयोग

1.हरिद्वार में कुंभ- हरिद्वार का सम्बन्ध मेष राशि से है. कुंभ राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर कुंभ का पर्व हरिद्वार में आयोजित किया जाता है. हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का भी आयोजन होता है.

2. प्रयाग में कुंभ- प्रयाग कुंभ का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि यह 12 वर्षो के बाद गंगा, यमुना एवं सरस्वती के संगम पर आयोजित किया जाता है. ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार जब बृहस्पति कुंभ राशि में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है तब कुंभ मेले का आयोजन प्रयाग में किया जाता है.अन्य मान्यता अनुसार मेष राशि के चक्र में बृहस्पति एवं सूर्य और चन्द्र के मकर राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या के दिन कुंभ का पर्व प्रयाग में आयोजित किया जाता है. एक अन्य गणना के अनुसार मकर राशि में सूर्य का एवं वृष राशि में बृहस्पति का प्रवेश होनें पर कुंभ पर्व प्रयाग में आयोजित होता है.

3. नासिक में कुम्भ- 12 वर्षों में एक बार सिंहस्थ कुंभ मेला नासिक एवं त्रयम्बकेश्वर में आयोजित होता है. सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुकुंभ पर्व गोदावरी के तट पर नासिक में होता है. अमावस्या के दिन बृहस्पति, सूर्य एवं चन्द्र के कर्क राशि में प्रवेश होने पर भी कुंभ पर्व गोदावरी तट पर आयोजित होता है.

4. उज्जैन में कुंभ- सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर यह पर्व उज्जैन में होता है. इसके अलावा कार्तिक अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र के साथ होने पर एवं बृहस्पति के तुला राशि में प्रवेश होने पर मोक्षदायक कुंभ उज्जैन में आयोजित होता है.

First Published: Sunday, December 16, 2018 09:21:41 AM
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