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आखिर क्यों कहते आए हैं उमर अब्दुल्ला... 2019 नहीं 2024 की तैयारी करे विपक्ष

News State Bureau  |   Updated On : April 17, 2019 01:36 PM
सांकेतिक चित्र

सांकेतिक चित्र

नई दिल्ली.:  

देश के युवा नेताओं और उनकी राजनीतिक सोच-समझ की बात करें तो नेशनल कांफ्रेस (national conferrence) पार्टी के नेता और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला (Omar Abdullah) अलग खड़े नजर आते हैं. भले ही वह चुनावी माहौल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हर छोटी-बड़ी बात पर कठघरे में खड़ा कर रहे हों, लेकिन यह उनकी दूरदृष्टि ही थी जिसने 2014 लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi)की सूनामी के बाद सभी राजनीतिज्ञ दलों को 2024 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुटने को कहा था.

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बात चाहे जम्मू-कश्मीर में पीडीपी से गठबंधन की रही हो या फिर विभिन्न राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव परिणामों की, उमर अब्दुल्ला हरेक मसले पर अपनी हर बात बेबाकी से रखते आए हैं. अब जब वे देश के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस (Congress) के सुर में सुर मिलाते हुए पीएम नरेंद्र मोदी की मजम्मत में लगे हुए हैं, तो उनके 2014 लोकसभा और कुछ राज्यों में 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद किए गए ट्वीट को याद करना जरूरी हो जाता है.

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याद करें 2014 में लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट किया था, 'फॉर्गेट 2019...प्रिपेयर फॉर 2024'. उस समय मोदी की सूनामी ने न सिर्फ कांग्रेस को जबर्दस्त शिकस्त दी थी, बल्कि केंद्रीय सत्ता में दावेदारी करने वाले अन्य क्षेत्रीय दल भी मोदी लहर से बुरी तरह प्रभावित हुए थे. ऐसे में उमर अब्दुल्ला की ट्वीट के गहरे राजनीतिक निहितार्थ निकाले गए थे. उस वक्त यह मानने वाले भी कम नहीं थे कि उमर ने 'हवा' को पहचान लिया है.

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इसके बाद बीजेपी का विजयरथ कई विधानसभा चुनावों (Assembly Elections) में दौड़ा और सामने आए नतीजों ने बीजेपी को 'अपराजेय' पार्टी बतौर स्थापित किया. खासकर उत्तर प्रदेश समेत उत्तर-पूर्व के राज्यों में बीजेपी को मिली अप्रत्याशित सफलता ने राजनीतिक पंडितों तक को अपनी सोच बदलने पर मजबूर कर दिया. 2017 में इसीलिए उमर ने एक और ट्वीट कर 2014 की अपनी ट्वीट को फिर से दोहराया.

उमर का अपनी इन ट्वीट्स में साफतौर पर कहना था कि बीजेपी खासकर पीएम मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी को हराने के लिए विपक्ष को नई रणनीति पर काम करना होगा. साथ ही उमर ने वैकल्पिक एजेंडे पर काम करते हुए मतदाताओं को बेहतर विकल्प दिए जाने की वकालत भी की थी.

यह अलग बात है कि जम्मू-कश्मीर में बीजेपी-पीडीपी गठबंधन (BJP-PDP Alliance) टूटने के बाद उमर के सुर भी बदलते नजर आए. पुलवामा आतंकी हमले और उसके बाद देश के कई हिस्सों में कश्मीरी छात्रों और व्यापारियों के खिलाफ हुई 'हिंसक' (kashmiri students) प्रतिक्रिया के बाद तो उमर पीएम मोदी के खिलाफ कुछ ज्यादा ही मुखर हो गए. हालांकि बीच-बीच में वह पीएम मोदी की तारीफ करना नहीं भूलें. चाहे वह मोदी का कश्मीरी छात्रों-व्यापारियों की सुरक्षा को लेकर दिया गया संदेश हो या उसके पहले जम्मू-कश्मीर में महत्वाकांक्षी रेल परियोजना हो. उमर ने पीएम नरेंद्र मोदी को बधाई देने का भी कोई मौका हाथ से जाने नहीं दिया है.

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इसका प्रतिसाद भी उन्हें बीजेपी खासकर पीएम नरेंद्र मोदी की ओर से भरपूर मिला है. याद करें पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती ने धारा 370 और 35-ए हटाए जाने पर राज्य के सुलग उठने की धमकी दी थी. इसके बाद दो झंडे और दो प्रधानमंत्री का 'जुमला' नेशनल कांफ्रेस की ओर से उछाला गया. इस नारे को लेकर पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी के अन्य नेताओं ने भी जमकर बयानबाजी की, लेकिन उनके हमले के केंद्र में नेशनल कांफ्रेस के बजाय कांग्रेस ही रही. बीजेपी की ओर से यही कहा जाता रहा कि कांग्रेस के जम्मू-कश्मीर में सहयोगी....

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इस तरह के बयानों के निहितार्थ आसानी से समझे जा सकते हैं. उमर अब्दुल्ला को कहीं न कहीं अच्छे से पता है कि 2014 की ही तरह 2019 में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्थिति मजबूत है. पुलवामा आतंकी हमले के बाद बालाकोट एयर स्ट्राइक ने मोदी की छवि को और सुधारने का काम किया है. ऐसे में अगर उमर की 2014 और 2017 की 'फॉर्गेट 2019...प्रिपेयर फॉर 2024' ट्वीट्स फिर से सामने आ रही हैं, तो इसके गहरे निहितार्थ हैं. इन्हें समझ पाना उमर के बस की ही बात है, क्योंकि वह जम्मू-कश्मीर में बैठे हुए भी देश की नब्ज (loksabha elections 2019) को समझने का माद्दा रखते हैं.

First Published: Wednesday, April 17, 2019 01:32 PM

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