निर्भया केसः 22 जनवरी को दोषियों को फांसी देना संभव नहीं, दिल्ली सरकार ने कोर्ट में कहा

News State Bureau  |   Updated On : January 15, 2020 02:07:10 PM
निर्भया केस के आरोपी मुकेश, अक्षय, विनय और पवन

निर्भया केस के आरोपी मुकेश, अक्षय, विनय और पवन (Photo Credit : फाइल फोटो )

नई दिल्ली :  

निर्भया केस (Nirbhaya Case) में बुधवार को सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार के वकील ने कोर्ट में कहा कि यह संभव नहीं है कि 22 तारीख को दोषियों को फांसी दे दी जाए. इससे पहले दोषियों के वकीलों ने भी दया याचिका खारिज होने के बाद फांसी के लिए 14 दिन का समय दिए जाने की मांग की. जस्टिस मनमोहन ने सवाल किया- सुप्रीम कोर्ट 2017 में फैसला सुना चुका है. 2018 में पुनर्विचार अर्जी खारिज हो चुकी है. फिर क्यूरेटिव और दया याचिका दाखिल क्यों नहीं गई? क्या दोषी डेथ वारंट जारी होने का इतंजार कर रहे थे?

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शत्रुघ्‍न चौहान केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए अधिवक्‍ता रेबेका जॉन ने कहा, इस फैसले के मुताबिक आखिरी सांस तक दोषी को अपनी पैरवी का अधिकार रखता है. राष्‍ट्रपति द्वारा दया याचिका खारिज होने पर भी उसे 14 दिनों की मोहलत मिलनी चाहिए.सुनवाई के दौरान जज ने सवाल किया- सुप्रीम कोर्ट 2017 में फैसला सुना चुका है. 2018 में पुनर्विचार अर्जी खारिज हो चुकी है. फिर क्यूरेटिव और दया याचिका दाखिल क्यों नहीं गई? क्या दोषी डेथ वारंट जारी होने का इतंजार कर रहे थे? सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों के मुताबिक, एक वाजिब समयसीमा में इन कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल हो जाना चाहिए.

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इसके बाद शत्रुघ्‍न चौहान केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए अधिवक्‍ता रेबेका जॉन ने कहा, इस फैसले के मुताबिक आखिरी सांस तक दोषी को अपनी पैरवी का अधिकार रखता है. राष्‍ट्रपति द्वारा दया याचिका खारिज होने पर भी उसे 14 दिनों की मोहलत मिलनी चाहिए ताकि इस दरमियान वो अपने घरवालों से मुलाकात और बाकी काम कर सके. रेबेका जॉन की ओर से कहा गया, क़ानून आपको दो बार दया याचिका दाखिल करने की इजाज़त नहीं देता. जज ने फिर सवाल किया- 2017 में याचिका खारिज होने के बाद आपने इतने वक़्त में इन कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया?

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अभियोजन पक्ष की ओर से ASG मनिंदर आचार्य ने कहा - यह याचिका Premature है. इस पर अभी सुनवाई का कोई औचित्य नहीं है. राष्‍ट्रपति ने अभी दया याचिका पर कोई फैसला नहीं लिया है. जान-बूझकर दोषियों की ओर से फांसी को टालते रहने के लिए अपील दायर करने में देरी हुई. दिल्ली जेल मैनुअल के मुताबिक दया याचिका दाखिल करने के लिए सिर्फ 7 दिन मिलते हैं. ASG ने कहा - कल ही राष्‍ट्रपति के सामने दोषी की ओर से दया याचिका दायर की गई है. लिहाजा इस स्टेज पर इस अर्जी पर सुनवाई का कोई औचित्य नहीं है.

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सुनवाई के दौरान दिल्‍ली सरकार का पक्ष रखते हुए अधिवक्‍ता राहुल मेहरा ने कहा, दया याचिका लंबित रहने की सूरत में फांसी की सज़ा पर अमल नहीं हो सकता. जेल मैनुअल और दिल्ली सरकार के नियम भी यही कहते हैं. अगर दोषियों की ओर से जान-बूझकर कर देरी हो रही है तो कोर्ट फांसी के अमल की प्रकिया में तेजी लाने को कह सकती है. जस्टिस मनमोहन ने यह भी सवाल किए कि जेल अफसरों ने दोषियों को पहला नोटिस जारी करने में इतनी देर क्यों की.

राहुल मेहरा ने कहा- वैसे भी जब तक राष्ट्रपति फैसला नहीं ले लेते, तब तक फांसी नहीं दी जा सकती. लिहाज़ा इस स्टेज पर यह याचिका प्रीमैच्‍योर है. इस पर सुनवाई की ज़रूरत नहीं है. इसके बाद सुनवाई कर रहे जज ने सख्‍त टिप्‍पणी करते हुए कहा, यह साफ है कि कैसे दोषियों ने सिस्टम का बड़ी चालकी से दुरुपयोग किया. ऐसे में लोगों का सिस्टम से भरोसा उठ जाएगा. राहुल मेहरा ने कहा, 21 जनवरी की दोपहर को हम ट्रायल कोर्ट के जज के पास जाएंगे. तब तक दया याचिका खारिज होती है तो भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक 14 दिन की मोहलत वाला नया डेथ वारंट जारी करना होगा. यानी किसी भी सूरत में 22 जनवरी को तो डेथ वारंट पर अमल सम्भव नहीं है. लिहाजा यह याचिका अभी प्रीमैच्‍योर है.

First Published: Jan 15, 2020 01:31:31 PM
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