शिवाजी, राणा प्रताप को 'भटका देशभक्त' मानते थे गांधीजी, इससे भी नाराज था गोडसे

Nihar Ranjan Saxena  |   Updated On : November 28, 2019 04:06:44 PM
सांकेतिक चित्र

सांकेतिक चित्र (Photo Credit : (फाइल फोटो) )

ख़ास बातें

  •  शिवाजी, राणा प्रताप और गुरु गोविंद को 'भटके देशभक्त' करार दे गांधीजी ने अपने आत्म दंभ को प्रदर्शित किया.
  •  गांधीजी एक हिंसक शांतिवादी थे, जिन्होंने सत्य और अहिंसा के नाम पर देश को सिर्फ आपदाएं दीं.
  •  1919 के आते-आते गांधीजी मुसलमानों का विश्वास जीतने के लिए अपने प्रयासों में हद दर्जे तक बेकरार दिखने लगे.

New Delhi :  

जिस नाथूराम गोडसे (Nathuram Godse) को लेकर बीजेपी ने साध्वी प्रज्ञा (Sadhvi Pragya) पर कार्रवाई की है, क्या उसका अंतिम बयान (Statement) आपने पढ़ा है? गुरुवार को साध्वी प्रज्ञा के गोडसे पर दिए बयान को लेकर कांग्रेस (Congress) समेत अन्य विपक्षी दलों ने बीजेपी को अपने निशाने पर ले रखा है. बीजेपी (BJP) ने विवाद को थामने के लिए प्रज्ञा को रक्षा मामलों की संसदीय समिति से बाहर का रास्ता दिखा दिया है. उम्मीद यह भी जताई जा रही है कि बीजेपी उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा सकती है. ऐसी स्थिति में सोशल मीडिया (Social Media) भी दो खेमों में बंटा नजर आ रहा है. एक खेमे की ओर से साध्वी प्रज्ञा #godse Final Statement in COURT #well_done_Pragya हैशटैग चल रहा है, तो दूसरा खेमा साध्वा प्रज्ञा को लानते-मलानते भेज बीजेपी को कठघरे में खड़ा कर रहा है. ऐसे में एक बार फिर गोडसे का अंतिम बयान चर्चा में आ गया है, जो उसने गांधीजी की हत्या का मुकदमा सुन रही अदालत में दिया था. एक नजर आप भी डालें...

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महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का अंतिम बयान (अंश)
13 जनवरी 1948 को मुझे खबर मिली कि गांधीजी (Gandhiji) ने आमरण अनशन (Hunger Strike) पर बैठने का निर्णय किया है. इसका कारण यही पता चला कि वह हिंदू-मुस्लिम एकता 9Hindu Muslim Unity)का आश्वासन चाहते हैं. हालांकि मैं और मेरे जैसे कुछ अन्य लोग इसके पीछे के असल मकसद को समझ पा रहे थे... वह सरकार पर दबाव बना पाकिस्तान (Pakistan) को 55 करोड़ रुपए देने के लिए राजी होने पर मजबूर करना चाहते थे. इस भुगतान का विरोध सरकार पहले ही कर चुकी थी. हालांकि गांधीजी के आमरण अनशन के मद्देनजर या उसके दबाव में सरकार को अपना निर्णय बदलने पर बाध्य होना पड़ा. मेरी सोच इस मसले पर साफ हो चुकी थी कि आम जनता की राय का कोई महत्व नहीं है, बल्कि वह पाकिस्तान के प्रति गांधीजी के झुकाव के समक्ष बेहद 'मामूली' दर्जा रखती है.

1946 और उसके आसपास सरकार से संरक्षण प्राप्त मुस्लिम कट्टरवादी नेता सुहरावर्दी (suhrawardy )के उकसावे पर मुसलमानों ने नोआखली (Noakhali Riots) में हिंदुओं (Hindus) पर जमकर अत्याचार (Atrocities) किए, जिससे हमारा खून उबल रहा था. यह देखकर हमारी शर्म और रोष की कोई सीमा नहीं रही जब गांधीजी सुहरावर्दी का कवच बनकर सामने आ गए और उसे 'शहीद साहब' करार देने लगे. अपनी प्रार्थना सभाओं में भी वह सुराहवर्दी को 'शहीद' (Martyrs) करार देने से बाज नहीं आते थे.

गांधीजी का कांग्रेस पर पहले प्रभाव बढ़ा और फिर वह कांग्रेस में सर्वोपरि हो गए. लोगों को जागरूक करने के लिए गांधीजी के आंदोलन व्यापक होने लगे और उनमें 'सत्य' (Truth) और 'अहिंसा' (Non Voilence) के नारे जोर-शोर से लगने लगे. गांधीजी के आंदोलनों के परिणामों को देश के समक्ष लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई. सबसे बड़ी बात उसे 'सत्य' और 'अहिंसा' की देन करार दिया जाने लगा. मैंने कभी भी क्रूर आक्रांता के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह को अन्याय या गलत नहीं माना था.

...उतार-चढ़ाव भरे युद्ध में राम (Sri Ram) ने अंततः रावण (Ravana) को मारा था...कृष्ण (Krishna) ने कंस (kans) की धूर्तता की सजा उसकी हत्या करके ली थी... ऐसे में शिवाजी, राणा प्रताप और गुरु गोविंद (Guru Govind Singh) को 'भटके देशभक्त' करार देकर गांधीजी ने सिर्फ और सिर्फ अपने आत्म दंभ (Self Conceit) को ही प्रदर्शित किया. विडंबना यह है कि गांधीजी एक हिंसक शांतिवादी थे, जिन्होंने सत्य और अहिंसा के नाम पर देश को सिर्फ आपदाएं ही दीं. इसके विपरीत राणा प्रताप, शिवाजी और गुरु गोविंद सिंहजी अपनी बहादुरी और देशभक्ति के लिए देशवासियों के दिल में कहीं गहरे प्रतिष्ठापित रहेंगे.

1919 के आते-आते गांधीजी मुसलमानों (Muslims) का विश्वास जीतने के लिए अपने प्रयासों में हद दर्जे तक बेकरार दिखने लगे थे इसके लिए वह एक के बाद एक बेतुके वादे मुसलमानों से किए जा रहे थे. उन्होंने इस देश में खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया. यहां तक कि इस मसले पर उन्होंने समग्र राष्ट्रीय कांग्रेस को इस पर एक नीति बनाने के लिए बाध्य कर दिया... इसके तुरंत बाद ही मोपला विद्रोह ने साफ कर दिया कि मुसलमानों को राष्ट्रीय एकता के बारे में रत्ती भर भी भान नहीं है. राष्ट्रीय एकता को लेकर उनके भाव स्पष्ट नहीं थे. यही वजह है कि मुसलमानों ने व्यापक स्तर पर हिंदुओं का नरसंहार किया. इसके बावजूद ब्रितानी हुकूमत हिंदुओं के प्रति मोपला विद्रोह को लेकर पूरी तरह से बेपरवाह रही. कुछ समय बाद इसे दबाया भी गया और उसे गांधीजी के हिंदू-मुस्लिम एकता के उद्घोष का परिणाम बताया गया. इसके बाद ब्रितानी हुकूमत और मजबूत हो गई, मुसलमान पहले से कहीं ज्यादा धर्मांध और कट्टर हो गया. इन सभी का दुखद परिणाम सिर्फ और सिर्फ हिंदुओं को ही भुगतना पड़ा.

यहां पढ़े नाथूराम गोडसे का पूरा बयान

(अदालत के समक्ष महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के इस अंतिम बयान से न्यूज स्टेट अपनी सहमति-असहमति नहीं प्रकट करता है. वह बस सोशल मीडिया पर चले रहे इस बयान को अपने पाठकों के समक्ष रख रहा है.)

First Published: Nov 28, 2019 02:48:54 PM
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