मुसलमानों को कट्टर बनाने के लिए पीएफआई को मिल रही है विदेशी मदद, सीएए विरोधी हिंसक प्रदर्शनों में भी हाथ

Nihar Ranjan Saxena  |   Updated On : January 10, 2020 02:41:09 PM
सीएए के खिलाफ हिंसक विरोध-प्रदर्शनों में पीएफआई का हाथ.

सीएए के खिलाफ हिंसक विरोध-प्रदर्शनों में पीएफआई का हाथ. (Photo Credit : न्यूज स्टेट )

ख़ास बातें

  •  गृह मंत्रालय ने सीएए विरोधी हिंसा पर पीएफआई के खिलाफ तैयार किया डोजियर.
  •  कई मुस्लिम देशों तक फैले तार. मिल रही है कट्टरता फैलाने के लिए भारी मदद.
  •  माओवादियों समेत अल-कायदा और तालिबान से भी संपर्क के पुख्ता सबूत.

नई दिल्ली:  

नागरिकता विरोधी कानून (Citizenship Ammendment Act) के खिलाफ हो रहे हिंसक विरोध-प्रदर्शनों (Violence) खासकर उत्तर प्रदेश में सामने आए पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) को संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सउदी अरब, बहरीन, कुवैत, कतर और ओमान से अच्छी-खासी धनराशि अपनी गतिविधियों और प्रोपेगंडा के प्रचार-प्रसार के लिए मिलती है. यह खुलासा गृह मंत्रालय (Home Ministry) द्वारा पीएफआई को लेकर तैयार किए गए डोजियर से मिलता है. गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने सीएए विरोधी हिंसक प्रदर्शनों के सिलसिले में 25 पीएफआई कार्यकर्ताओं को मेरठ, शामली, मुजफ्फरनगर औऱ लखनऊ से गिरफ्तार किया है. सिर्फ यूपी में ही नागरिकता कानून विरोधी हिंसा में 19 लोग मारे गए. ऐसे में पिछले सप्ताह केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने दो टूक कहा था कि कुछ विरोध-प्रदर्शनों में फैली हिंसा में पीएफआई की भूमिका सामने आई है. 'उपलब्ध सबूतों' के आलोक में गृह मंत्रालय पीएफआई के खिलाफ कार्रवाई करेगा. इसके साथ ही रविशंकर प्रसाद ने प्रतिबंधित संगठन सिमी (SIMI) और पीएफआई के संबंधों पर भी टिप्पणी की थी.

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यूपी के बाद केरल-असम भी पीएफआई पर प्रतिबंध की कर सकते हैं मांग
गौरतलब है कि पीएफआई की हिंसा में संलिप्तता पर उत्तर प्रदेश सरकार ने केंद्र से संगठन को प्रतिबंधित करने की मांग की है. ऐसी सुगबुगाहट है कि कर्नाटक और असम राज्य सरकार भी पीएफआई को प्रतिबंधित करने की मांग कर सकती हैं. पीएफआई का शीर्ष नेतृत्व केरल से जुड़ा हुआ है. संगठन पर आरोप है कि वह मुस्लिम युवाओं को इस्लाम की अति रूढ़िवादी सलाफी विचारधारा (Salafi) की ओर लाकर उन्हें कट्टर बनाता है. हालांकि संगठन इस आरोप का खुलकर विरोध करता आ रहा है. केरल की पीएफआई शाखा के प्रवक्ता सीए रउफ भी यही बात दोहराते हैं, 'पीएफआई में न तो सलाफी और ना ही सूफी इस्लाम है. यहां सिर्फ इस्लाम है. यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का प्रोपेगंडा है, जो मुसलमानों में विभेद कराना चाहती है.' पीएफआई के राजनीतिक अवतार सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के वरिष्ठ सदस्य मुजाहिद पाशा भी कहते हैं कि संगठन सलाफी इस्लाम के 'अति रूढ़िवादी या कट्टर' विचारधारा को प्रोत्साहित या प्राचारित नहीं करता है. समाज में जो भी बुराइयां हैं, उनके लिए पीएफआई और एसडीपीआई को जिम्मेदार ठहराना आसान है. संगठन अल्पसंख्यकों, पिछड़े तबके समेत हाशिये पर रह रहे लोगों के लिए काम करता है.

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इस तरह फैला रहा नेटवर्क
इन दावों के उलट गृह मंत्रालय द्वारा तैयार किए गए डोजियर में साफतौर पर कहा गया है कि पीएफआई के कर्ताधर्ता रेहाब फॉउंडेशन, द इंडियन सोशल फोरम और द इंडियन फ्रेटरनिटी फोरम सरीखे मुखौटा संगठनों के बैनर तले संयुक्त अरब अमीरात में सक्रिय है. पीएफआई के नेतृत्व ने अल आईन, दुबई में लुलु हाइपर मार्केट के पीछे अपना कार्यालय खोल रखा है. इसके साथ ही इस्लामिक कट्टरता फैलाने में संगठन सक्रिय है और भारत भेजने के लिए फंडिंग का इंतजाम भी देखता है. बेहरीन, यूएई, कुवैत और सउदी अरब में सक्रिय द इंडियन फ्रेटरनिटी फोरम भी कट्टर इस्लाम के लिए धन की उगाही करता है. संगठन का दायरा बढ़ाने के लिए पीएफआई के पदाधिकारी समय-समय पर इन देशों का दौरा करते हैं और भारतीय मुस्लिम युवकों को रोजगार के बहाने वहां संगठन की विचारधारा के प्रचार-प्रसार के लिए भेजते हैं.

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2006 में आया अस्तित्व में, सिमी का उत्तराधिकारी
22 नवंबर 2006 को तीन समूहों कर्नाटक फोरम फॉर डिग्निटी, नेशनल डेवलपमेंट फंड (केरल) और मनीथा नीथि पसारई (तमिलनाडु) के विलय से बने पीएफआई की जड़े आज कहीं अधिक गहरे पैठ बना चुकी हैं. डोजियर के मुताबिक तकरीबन 24 राज्यो में पीएफआई के 80 हजार से अधिक कार्यकर्ता हैं. डोजियर में पीएफआई को प्रतिबंधित संगठन सिमी का ही उत्तराधिकारी बताया गया है. डोजियर में कहा गया है कि कट्टरपंथी इस्लाम और उसकी विचारधारा को मानने वाला यह संगठन केरल में बड़ी संख्या में हत्याओं में लिप्त रहा है. इसके इतर दंगों के अलावा कई अन्य आपराधिक घटनाओं में भी संगठन की संलिप्तता सामने आई है.

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माओवादियों से भी संबंध
यही नहीं, डोजियर में कहा गया है कि पीएफआई एक अन्य संगठन पीएफआई यूथ विंग (माओ) भी चलाता है, जिसके प्रतिबंधित कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) से संबंध है. खासकर दक्षिण भारत में यह ईकाई अंडरग्राउंड माओवादियों के साथ काम कर रही है. इस बात का खुलासा केरल के वायनाड में सीपी जलील हत्याकांड की जांच में हुआ था. गृह मंत्रालय को यह भी पता चला है कि केरल के त्रिशूर का रहने वाला उल्हूमन सैदमोहम्मद पीएफआई का सक्रिय कार्यकर्ता है और मालदीव में शिक्षक बतौर कार्यरत है और वास्तव में भारत विरोधी तमाम व्हॉट्सएप समूहों का एडमिन है. सैदमोहम्मद ने ईशनिंदा के झूठे मामलों में मालदीव में कई हिंदुओं और ईसाईयों को फंसाया है. हालांकि पीएफआई के रउफ इस नाम के शख्स के कार्यकर्ता होने से ही इंकार करते हैं. तमिलनाडु के तंझावूर में पीएमके नेता रामलिंगम की हत्या में भी एनआईए ने पीएफआई के आधा दर्जन सदस्यों के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया था.

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कथनी-करनी में जमीन-आस्मां का अंतर
यह अलग बात है कि पीएफआई घोषित तौर पर राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने समेत सांप्रदायिक और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के लिए लोकतांत्रिक परिपाटियों के अंदर काम करने का दावा करता है. संगठन का घोषित एजेंडा अल्पसंख्यकों समेत पिछड़े तबके के आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक विकास पर काम करना है. इसके साथ ही संगठन देश के विभिन्न इलाकों में कमजोर तबके के कल्याण और विकास के लिए भी काम करता है. हालांकि गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक पीएफआई का एक गुप्त अंग है, जो अत्याधुनिक विस्फोटकों, हथियारों और गोला-बारूद के इस्तेमाल में प्रशिक्षित है. 2010 जुलाई में केरल पुलिस ने देसी बम, हथियारों, सीडी समेत तालिबान और अल-कायदा समर्थित साहित्य बरामद किया था. 2013 अप्रैल में केरल पुलिस ने राज्य भर में पीएफआई के केंद्रों पर छापामार कार्रवाई की थी, जिसमें नारथ, कन्नूर से हथियारों, विदेशी मुद्रा समेत तलवारें, विस्फोटक बनाने की सामग्री जब्त की थी. एनआई की एक अदालत ने इस सिलसिले में 21 पीएफआई कार्यकर्ताओं को नामजद भी किया था.

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अल-कायदा समर्थक और यहूदी विरोधी भी
यह भी सामने आया है कि पीएफआई समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय मसलों पर भी अपनी आवाज बुलंद करता आया है. मुस्लिम ब्रदरहुड के नेता मोहम्मद मोर्सी को दी गई मौत की सजा के खिलाफ पीएफआई के कुछ कार्यकर्ताओं ने 2015 में दिल्ली में मिस्र के दूतावास के समक्ष भी विरोध-प्रदर्शन किया था. डोजियर के मुताबिक संगठन इजरायल या यहूदी विरोधी रवैया भी मुखर कर चुका है. 2012 नवंबर और 2014 जुलाई में संगठन ने फिलीस्तीन समर्थक और यहूदी विरोधी मुहिम 'आई एम गाजा' मुहिम राष्ट्रीय स्तर पर चलाई थी. पीएफआई के पश्चिम एशिया में भी संपर्क हैं, जिससे उसे आर्थिक और राजनीतिक खाद-पानी मिलता रहता है. यानी वक्ती जरूरत आन पड़ने पर पीएफआई के नेतृत्व या कार्यकर्ताओं को इन देशों में राजनीतिक शरण भी मिल सकती है. पीएफआई और एसडीपीआई को सउदी से भी भारी इमदाद मिलती है. पीएफआई ने केरल में एक गैर-सरकारी संगठन द मुस्लिम रिलीफ नेटवर्क (एमआरएन) खड़ा किया है, जो पश्चिम एशिया में कट्टरपन को बढ़ावा देने के साथ वहां से फंड जुटाता है. एमआरएन को जेद्दाह के इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक से समय-समय पर दान-अनुदान मिलता रहता है. इस बैंक के जेद्दाह स्थित वर्ल्ड असेंबली ऑफ मुस्लिम यूथ से भी संबंध रहे हैं. यह वह संगठन था जो अल-कायदा समर्थक भी बताया गया था.

First Published: Jan 10, 2020 02:16:10 PM
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