ईरान का शीर्ष कमांडर सुलेमानी कभी अमेरिका का मददगार रहा लेकिन ट्रंप ने उतारा मौत के घाट, जानिए इसका राज

Nihar Ranjan Saxena  |   Updated On : January 03, 2020 08:14:14 PM
अल-कायदा और तालिबान के खात्मे में अमेरिका की मदद की थी कासिम ने.

अल-कायदा और तालिबान के खात्मे में अमेरिका की मदद की थी कासिम ने. (Photo Credit : न्यूज स्टेट )

ख़ास बातें

  •  कासिम सुलेमानी अमेरिकी हमलों के बाद उससे सहयोग के लिए तैयार हो गए.
  •  हमला करने का ब्लू प्रिंट कासिम सुलेमानी ने अमेरिका को उपलब्ध कराया था.
  •  इसके बाद जॉर्ज बुश ने ईरान को 'शैतान की धुरी' करार दे प्रतिबंधों के बोझ तले लादा.

नई दिल्ली:  

शुक्रवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर ड्रोन हमले में मारे गए अल-कुद्स फोर्स के सर्वेसर्वा कासिम सुलेमानी ईरान में एक बड़ी और ताकतवर शख्सियत थे. वह ईरानी समाचार चैनलों पर भी एक जाना-पहचाना चेहरा थे. यह अलग बात है कि शुक्रवार को अमेरिका के हाल-फिलहाल शत्रु नंबर 1 की पहचान बतौर मारे गए सुलेमानी एक समय अमेरिका के गहरे मददगार बनकर उभरे थे. अमेरिका पर 9/11 हमले के बाद अफगानिस्तान में अमेरिकी सुरक्षा बलों को तालिबान और अल-कायदा के खिलाफ मिली सफलता का नुस्खा कासिम सुलेमानी ने ही सुझाया था.

अल-कायदा से प्रतिशोध की ज्वाला
यात्री हवाई जहाजों को 'मिसाइल' की तरह इस्तेमाल कर अमेरिकी प्रतीकों पर किए गए आत्मघाती हमले ने पूरी दुनिया को भौचक्का कर दिया था. इन हमलों में अल-कायदा का खौफ भी दुनिया पर तारी हो गया था. अल-कायदा का सर्वोच्च कमांडर ओसामा बिन लादेन अफगानिस्तान की गुफाओं में बैठ कर दुनिया को आतंकवाद की चपेट में लाने का ख्वाब देख रहा था. उन दिनों अफगानिस्तान पर अल-कायदा सरीखे कट्टर इस्लामिक संगठन तालिबान का ही शासन था. ऐसे में अमेरिका बदले की आग में झुलस रहा था.

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अमेरिका को पुख्ता खुफिया सूचनाएं और तार्किक कारणों की थी तलाश
ऐसे में अमेरिका अल-कायदा पर कार्रवाई के लिए पुख्ता खुफिया सूचनाएं जुटाने में लगा हुआ था. इसके साथ ही अमेरिका तालिबान का खात्मा कर अफगानिस्तान में एक लोकतांत्रिक सरकार के गठन का भी खाका खींच रहा था. इराक पर हमले के अनुभव के बाद किसी दूसरे देश पर हमला करना अमेरिका के लिए कोई बड़ी बात नहीं था. हालांकि अफगानिस्तान पर हमला करने के लिए अमेरिका को पुख्ता खुफिया सूचनाओं और तार्किक कारणों की दरकार थी. ये दोनों ही अमेरिका को मुहैया कराए थे कुद्स फोर्स के सर्वेसर्वा कासिम सुलेमानी ने. गौरतलब है कि कुद्स का शाब्दिक अर्थ होता है पवित्र और फारसी में कुद्स का संबंध येरुशलम से है, जो यहूदियों, ईसाइयों और मुसलमानों के लिए पवित्र स्थान है.

पश्चिम एशिया नहीं थाईलैंड-लातिन अमेरिका से परे है कुद्स फोर्स का प्रभाव
ऐसे में ईरान में इस्लामिक क्रांति के दौरान 1979 के दौर में कुद्स फोर्स का गठन हुआ था. इसकी बदौलत ईरान पर अपना पूरा नियंत्रण स्थापित करने वाले अयातुल्ला खामेनेई ने ईरान रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (आईआरजीएस) में कुद्स फोर्स को असीम ताकतें दीं. वास्तव में कुद्स फोर्स अमेरिका की ही खुफिया संस्था सीआईए और स्पेशल फोर्स का मिला-जुला रूप है. कुद्स फोर्स ही विदेशों में ईरान के लिए खुफिया सूचनाएं जुटाती है और घरेलू मोर्चे पर आईआरजीएस की सैन्य ईकाई की तरह काम करती है. इसका प्रभाव सिर्फ पश्चिम एशिया भर में नहीं है, बल्कि थाईलैंड और लातिन अमेरिका से भी परे है.

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ईरान-इराक के हीरो थे कासिम सुलेमानी
इस लिहाज से देखें तो कुद्स फोर्स के सर्वोच्च कमांडर कासिम सुलेमानी 1980-88 के ईरान-इराक युद्ध के दौरान तेजी से उठे. उन दिनों वह स्पेशल फोर्स का हिस्सा हुआ करते थे और कासिम सुलेमानी ने इराक की सद्दाम हुसैन की सेना के ऊपर कई महत्वपूर्ण जीत हासिल की. इन उपलब्धियों के आधार पर कासिम को 1998 में कासिम को कुद्स फोर्स का सर्वेसर्वा बनाया गया. इसके तीन साल बाद जब अल-कायदा के आत्मघाती आतंकियों ने अमेरिकी प्रतीकों को अपना निशाना बनाया, तब तक कासिम क्षेत्रीय खुफिया तंत्र पर अपना पूरा प्रभुत्व स्थापित कर चुके थे.

एक तीर से दो निशाने साधे गए
हालांकि गौर करने वाली बात यह है कि 1980 के बाद से ईरान और अमेरिका के बीच औपचारिक कूटनीतिक रिश्ते नहीं रहे हैं. फिर भी कासिम सुलेमानी अमेरिकी हमलों के बाद उससे सहयोग के लिए तैयार हो गए. खासकर जब अमेरिका ने तालिबान और अल-कायदा के खिलाफ सुलेमानी से मदद मांगी. उस वक्त कासिम और अमेरिका दोनों ही दुश्मन का दुश्मन, दोस्त-दोस्त वाली भूमिका में थे. अमेरिका जहां 9/11 आतंकी हमलों को अंजाम देने वाले अल-कायदा को सजा देना चाहता था. वहीं, कासिम सुलेमानी तालिबान से बदला लेना चाहते थे, क्योंकि तालिबान ने शिया अफगानों को निशाना बनाया था.

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अल-कायदा और तालिबान के खात्मे का ब्लू प्रिंट यूएस को कासिम ने दिया
बताते हैं कि इसके बाद अमेरिकी रक्षा और खुफिया प्रतिष्ठानों के आला अधिकारियों और कासिम सुलेमानी की ओर से नियुक्त ईरानी वार्ताकार के बीच कई चरणों में गुप्त बातचीत हुई. दोनों पक्षों के बीच पहली बैठक अमेरिका पर आतंकी हमलों के ठीक बाद जिनेवा में हुई थी. यह भी पता चला कि कासिम सुलेमानी अमेरिका से तब नाराज भी हो गए थे, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि अमेरिका तालिबान पर हमला करने में विलंब कर रहा है. इसके बाद 2001 के अक्टूबर में कासिम सुलेमानी की ओर से नियुक्त वार्ताकार ने बकायदा एक नक्शा अमेरिका को उपलब्ध कराया था. इस नक्शे में साफ-साफ लक्ष्य बताए गए थे कि अमेरिकी फौज को पहले कहां हमला करना है. उसके बाद कहां हमला करना है. इस तरह चरणबद्ध तरीके से हमला करने का ब्लू प्रिंट कासिम सुलेमानी ने अमेरिका को उपलब्ध कराया था.

जॉर्ज बुश ने बाद में माना कासिम को शत्रु
इस लिहाज से देखें तो आज ट्रंप के निर्देश पर मारे गए कासिम सुलेमानी ने ही अफगानिस्तान में तालिबान के काफी हद तक सफाए में अमेरिका का मार्ग प्रशस्त किया था. यह अलग बात है कि तालिबान पर हमले के तीन महीने बाद ही तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने ईरान को 'शैतान की धुरी' करार देकर प्रतिबंधों के बोझ तले लाद दिया. इसके बाद से ही कासिम सुलेमानी अमेरिका के लिए भी शत्रु की श्रेणी में आ गए, जिसे अंततः शुक्रवार को ड्रोन हमले में मार गिराया गया.

First Published: Jan 03, 2020 08:14:14 PM
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