'हाथ' का साथ छोड़ बीजेपी का 'कमल' थामने वाले कांग्रेस के 7 बड़े चेहरे

Sajid Ashraf  |   Updated On : March 11, 2020 04:30:32 PM
bjp join

सांकेतिक चित्र (Photo Credit : न्यूज स्टेट )

ख़ास बातें

  •  18 साल तक कांग्रेसी रहने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने थामा बीजेपी का दामन.
  •  हालिया समय में इसके पहले कांग्रेस के सात बड़े चेहरे बीजेपी में शामिल हो चुके हैं.
  •  हाथ का साथ छोड़ कमल थामने पर राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म.

नई दिल्ली:  

ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) का कांग्रेस का 'हाथ' छोड़ कमल थामना भारतीय राजनीति में बहुत बड़ा उलटफेर है. सिंधिया ने कांग्रेस (Congress) को जड़ता का शिकार बताते हुए आम लोगों से दूर रहने वाली पार्टी भी करार दिया. सिंधिया कोई पहले कांग्रेसी नेता नहीं है, जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थामा है. हालिया समय में इसके पहले कांग्रेस के सात बड़े चेहरे बीजेपी में शामिल हो चुके हैं. इन सभी के हाथ का साथ छोड़कर कमल थामने पर राजनीतिक गलियारों में कई दिनों तक चर्चाओं का बाजार गर्म रहा था. एक नजर डालते हैं कांग्रेस से बीजेपी में आए 7 बड़े चेहरों पर...

यह भी पढ़ेंः ज्योतिरादित्य सिंधिया 53 साल बाद सपना साकार कर रहे दादी विजया राजे का !

रीता बहुगुणा जोशी
कांग्रेस की पूर्व दिग्गज नेता 2016 में बीजेपी में शामिल हुई थीं. उन्होंने 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में लखनऊ कैंट से चुनाव लड़ा था. रीता ने मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा यादव को हराकर यहां से जीत दर्ज की थी. रीता को योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री भी बनाया गया था. हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से उम्मीदवार बनाया. रीता यहां से अभी सांसद हैं. रीता बहुगुणा जोशी उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा और कमला बहुगुणा की बेटी हैं, जो पूर्व सांसद थे. उन्होंने एमए कर इतिहास में पीएचडी किया है. वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मध्ययुगीन और आधुनिक इतिहास में प्रोफेसर भी रही हैं. उन्होंने इलाहाबाद की मेयर बनकर 1995 में राजनीति में प्रवेश किया था. वह वर्तमान में उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं. वह 2007 से 2012 तक उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्षा थीं. 20 अक्टूबर 2016 को वह भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गईं. पार्टी छोड़ने से पहले 24 साल तक वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ थीं. उन्होंने दो बार लोकसभा चुनाव में चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों बार हार गई. 2012 के विधानसभा चुनावों में उन्हें लखनऊ छावनी के लिए विधान सभा के सदस्य के रूप में निर्वाचित किया गया था. उन्होंने पेट्रीस लुमुंबा विश्वविद्यालय के एक यांत्रिक इंजीनियर पी.सी. जोशी से विवाह किया. उनका एक बेटा, मयंक जोशी हैं.

यह भी पढ़ेंः यस बैंक के राणा कपूर से दो करोड़ रुपए लिए कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने, ईडी कर सकती है पूछताछ

हेमंत बिस्वा शर्मा
पूर्वोत्तर का यह कद्दावर नेता 2015 में बीजेपी में शामिल हुआ था. बीजेपी में इनके रुतबे का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पूर्वोत्तर राज्य में जब भी कोई संकट आता है, तो शर्मा पार्टी की तरफ से संकटमोचक होते हैं. असम में शर्मा पार्टी के भरोसेमंद चेहरों में शुमार हैं. असम में शर्मा के पास वित्त, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विभाग हैं. 2001 से 2015 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के टिकट से असम के जलकुबारी निर्वाचन क्षेत्र से विधानसभा के रूप में और मई 2016 तक भारतीय जनता पार्टी के सदस्य के रूप में विधायक के रूप में सेवा की है. शर्मा 2016 की असम विधानसभा की निर्वाचन जितके असम के कैविनेट मंत्री बने. भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर 2016 की असम विधानसभा चुनाव में जीत वह असम के कैबिनेट मंत्री बने. बीजपी के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा उन्हें 2016 में नार्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायन्स (नेडा) का प्रमुख बनाया गया.

यह भी पढ़ेंः नारी शक्ति को सलाम: ये हैं वो 7 महिलाएं जिन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी के सोशल मीडिया को संभाला

जगदंबिका पाल
यूपी में एक दिन के मुख्यमंत्री रहे जगदंबिका पाल 2014 में बीजेपी में शामिल हुए थे. वह लगातार दो बार से बीजेपी के टिकट पर डुमरियागंज से सांसद हैं. 2014 में वह उत्तर प्रदेश के डोमरियागंज सीट से 16वीं लोकसभा चुनाव में निर्वाचित हुए. इन्होंने 1993-2007 तक लगातार तीन बार बस्ती निर्वाचन क्षेत्र के विधायक के रूप में अपनी सेवाएं प्रदान की. उन्होंने 1998 में 3 दिनों के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया जब उत्तर प्रदेश के राज्यपाल ने कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर दिया. बाद में अदालतों के आदेश के बाद इसे जारी कर दिया गया. पेशे से वकील होने के साथ ही जगदम्बिका पाल ने गोरखपुर विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान, प्राचीन और आधुनिक इतिहास में एम ए और गोरखपुर विश्वविद्यालय से एलएलबी किया है.

यह भी पढ़ेंः साजिशन जमा किए गए पत्थर, पेट्रोल बम और पिस्टल ने बरपाया सबसे ज्यादा कहर!

चौधरी बीरेंद्र सिंह
चौधरी बीरेंद्र सिंह 2014 में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए थे. पीएम नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल में उन्हें इस्पात मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई थी. इस साल जनवरी में बीरेंद्र सिंह ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. कहते हैं कि हरियाणा में चौधरी बीरेंद्र सिंह जहां से खड़े होते थे राजनीति भी वहां से शुरू होती थी. पार्टी कोई भी हो जीत की गारंटी तो चौधरी बीरेंद्र सिंह होते थे. वह अलग-अलग पार्टियों से एक ही सीट पर चुनाव जीतने का कारनामे कर चुके हैं. हरियाणा की राजनीति में चौधरी बीरेंद्र सिंह की गूंज 4 दशक तक रही है, लेकिन बीरेंद्र सिंह शानदार राजनीतिक विरासत के बावजूद मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच सके. सक्रिय राजनीति से संन्यास ले चुके चौधरी बीरेंद्र सिंह को ये मलाल जरूर रहेगा कि आखिर किस ग्रह-दोष की वजह से वो सूबे के सीएम नहीं बन सके? साल 1977 में पहली दफे उचाना कलां विधानसभा सीट बनी. चौधरी बीरेंद्र सिंह यहां के पहले विधायक बने. देश भर में इमरजेंसी के कारण कांग्रेस के खिलाफ लहर थी. उस वक्त पूरे हरियाणा में कांग्रेस केवल 5 सीटें बमुश्किल ही जीत सकी थीं, लेकिन उसी कांग्रेस विरोधी लहर में कांग्रेस के टिकट पर बीरेंद्र सिंह ने बड़े अंतर से जीत हासिल कर चुनाव जीता और वो रातों-रात राजनीति के नए सितारा बन गए.

यह भी पढ़ेंः भारत के खिलाफ पाकिस्तान को परमाणु क्षमता से लैस कर रहा चीन, नाभिकीय हथियारों के 'अवैध संबंधों' की पुष्टि

राधाकृष्ण विखे पाटिल
महाराष्ट्र में कांग्रेस के दिग्गज नेता राधाकृष्ण विखे पाटिल पिछले साल कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल हुए थे. पाटिल ने जिस समय इस्तीफा दिया था वह विधानसभा में विपक्ष के नेता थे. फिलहाल बीजेपी में हाशिए पर चल रहे हैं. उनके महाविकास अघाड़ी में शामिल होने की अटकलें हैं. अहमदनगर जिले के रहने वाले विखे पाटिल महाराष्ट्र के राजनीतिक इतिहास में दुर्जेय नाम है और इस परिवार को राज्य में शक्कर सहकारिता आंदोलन के अग्रदूतों में से एक माना जाता है. अहमदनगर जिले के पत्रकार बीबी पाटिल ने कहा, 'विखे पाटिल परिवार लंबे समय तक सत्ता से दूर नहीं रह सकता. उनके बेटे राधाकृष्ण विखे पाटिल और पोते सुजॉय ने यही प्रवृत्ति अपनाई.'

यह भी पढ़ेंः निर्भया के गुनहगारों को कल भी नहीं हो पाएगी फांसी, यहां समझें पूरा मामला

नारायण राणे
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे नारायण राणे ने पिछले साल बीजेपी का दामन थामा था. कांग्रेस छोड़ने के बाद राणे को बीजेपी के समर्थन से राज्यसभा में चुना गया था. बीजेपी ने अभी राणे को महाराष्ट्र में कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी है. नारायण राणे ने अपनी महाराष्ट्र स्वाभिमान पार्टी का बीजेपी में विलय कर दिया था. शिवसेना से राजनीति की शुरुआत करने वाले नारायण राणे अब बीजेपी के हैं. उनसे पहले उनके दो बेटे नीलेश और नितेश बीजेपी ज्वाइन कर चुके थे. 1985 से 1990 तक राणे शिवसेना के कारपोरेटर रहे. 1990 में वो पहली दफे शिवसेना की पार्टी से विधायक बने. इसके साथ ही वह विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी बने. शिवसेना छोड़ने के बाद नारायण राणे 3 जुलाई 2005 में कांग्रेस में शामिल हो गए. शिवसेना से बगावत करने के बावजूद राणे विधानसभा का चुनाव जीतकर विधायक बने. कांग्रेस सरकार में भी राणे राज्य के राजस्व मंत्री बने. हालांकि महाराष्ट्र की पृथ्वीराज सरकार की भी आलोचना कर नारायण राणे सुर्खियां बटोर चुके हैं.

यह भी पढ़ेंः 'दिल्ली हिंसा में मूक दर्शक बनी रही पूर्व पुलिस कमिश्नर पटनायक की टीम'

एस एम कृष्णा
पूर्व विदेश मंत्री रहे एस एम कृष्णा 2017 में कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल हो गए थे. कर्नाटक के इस कद्दावर नेता के पास अभी कोई अहम जिम्मेदारी नहीं है. उन्हें आधुनिक बैंगलोर का जनक कहा जाता है. उन्होंने सरकारी-निजी साझेदारी का समर्थन किया. 2004 में वे महाराष्ट्र के राज्यपाल बने. सक्रिय राजनीति में लौटने के उद्देश्य से उन्होंने 5 मार्च 2008 को उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। 22 मार्च 2009 को डॉ मनमोहन सिंह ने उन्हें अपने कैबिनेट में शामिल कर लिया और उन्हें विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी. एसएम कृष्णा, मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल के एक मात्र ऐसे मंत्री थे, जो मंत्री, उपमुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल और तीन बार केंद्रीय मंत्री का पद संभाल चुके थे.

First Published: Mar 11, 2020 04:30:32 PM

न्यूज़ फीचर

वीडियो