Valentine Day Special: 14 के खौफ में जी रहे कई हजार युवा, इस दिन नहीं बजती कोई शहनाई, न हुई किसी बेटी की विदाई

News State Bureau  | Reported By : DRIGRAJ MADHESHIA |   Updated On : February 14, 2019 08:35 AM
कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्हें ये 14 नंबर की चांदनी रास नहीं आती. 14 इन्हें लुभाता नहीं बल्‍कि डराता है.

कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्हें ये 14 नंबर की चांदनी रास नहीं आती. 14 इन्हें लुभाता नहीं बल्‍कि डराता है.

गोरखपुर:  

14 नंबर जादू युवा दिलों के सर चढ़कर बोलने को तैयार है. फरवरी की 14 तारीख (Valentine Day ) की खुमारी दुनिया भर के युवाओं पर छाने वाली है. लेकिन कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्हें ये 14 नंबर की चांदनी रास नहीं आती. 14 इन्हें लुभाता नहीं बल्‍कि डराता है. जब दुनिया भर के युवा 14 फरवरी यानि वेलेंटाइन डे (Valentine Day  2019) का बेसब्री से इंतजार कर रहे होते हैं तो उत्तर प्रदेश के कई जगहों के जवां दिलों की धड़कनें इस दिन के करीब आते ही और तेज़ हो जाती हैं. इज़हार-ए-मोहब्बत के लिए नहीं बल्कि इस मनहूस 14 के लिए. जी हां यह वेलेंटाइन डे 14 को छोड़कर किसी और तारीख को पड़ता तो हज़ारों युवाओं के अरमान ठंडे नहीं पड़ते.

गोरखपुर और बस्ती मंडल में मनहूस 14

अंक शास्त्र में विश्वास रखने वाले 13 की संख्या को अशुभ मानते हैं पर गोरखपुर और बस्ती मंडल के कई गावों में 14 का खौफ है. मीठाबेल, ब्रह्मपुर, चौरी, नेवास, घूरपाली, पैसोना और बलौली के लोगों में यह खौफ ऐसा वैसा नहीं. खौफ इस कदर है कि किसी भी महीने की 14 तारीख को न तो कोई डोली उठी और न ही किसी युवक के सिर पर सेहरा सजा. शहनाई की धुन तो इस दिन कभी बजी नहीं और न ही कोई बैंड बाजा बारात निकली. यहां तक कि किसी दुकान पर आप 14 रुपये सामान खरीदते हैं तो आपको 15 रुपये देने पड़ेंगे. अगर आप जिद पर अड़ गए तो दुकानदार 13 रुपये ही लेगा.

जन्‍मदिन मनाने से भी तौबा

कौशिक गोत्र के ब्राह्मण परिवारों के लिए यह संख्या इतनी मनहूस है कि किसी भी महीने की 14 तारीख को किया गया शुभ कार्य इनके लिए अभिशाप बन जाता है. ब्रह्मपुर के कमलाकांत दूबे बताते हैं कि चाहे जनेऊ संस्कार हो, या विवाह संस्कार, किसी भी सूरत में 14 को हम लोग नहीं मनाते. एमएससी कर चुके राधाकृष्ण दूबे बताते हैं किसी के बच्चे का जन्मदिन अगर किसी भी महीने की 14 तारीख को पड़ता है तो किसी की हिम्मत नहीं इस दिन कोई छोटी पार्टी भी रख ले. चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने में ही क्यों न रहता हो.

सोच भी बदली और परंपराएं भी टूटीं

गोरखपुर से करीब 40 किलोमीटर दूर ब्रह्मपुर, मीठाबेल और चौरी गांव में आधुनिकता की रौशनी पहुंच चुकी है. बच्‍चे, बूढ़े हों या नौजवान, हाथ में स्‍मार्ट फोन लिए दिख जाएंगे. ट्वीटर को या फेसबुक या फिर इंस्‍टाग्राम, सोशल मीडिया पर यहां के युवाओं की दमदार उपस्‍थिति है. परंपरा और वर्जनाओं को तोड़ते हुए कई घरों की बहुएं भी घूंघट छोड़ सोशल मीडिया पर हैं. समय के साथ लोगों की सोच भी बदली और परंपराएं भी टूटीं, लेकिन नहीं टूटी तो सदियों से चली आ रही ये रूढ़ी.

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गांव से दूर शहरों में रहने वालों में भी खौफ

ब्राह्मण बाहुल्‍य इन गांवों में पढ़े-लिखों की कमी नहीं हैं. इस इलाके के अधिकतर लोग ग्रेजुएट और पोस्‍ट ग्रेजुएट हैं. महिलाएं भी ज्‍यादा पढ़ी-लिखी हैं. भारत का शायद ही कोई चीनी मिल नहीं है जहां इस इस इलाके का कोई व्‍यक्‍ति काम न करता हो, वह भी पैनकुली से लेकर जीएम तक के पोस्‍ट पर. असम के गुवाहाटी में अपना बिजनेस जमा चुके मीठाबेल के टंकेश्‍वर दूबे कहते हैं," किसी भी महीने की 14 तारीख या यूं कहें चतुर्दशी को हम लोग शुभकार्य नहीं करते. गांव से हजारों किलोमीटर दूर रह रहा हूं, लेकिन इस बात का मुझे हमेशा ख्‍याल रखना पड़ता है.''

टंकेश्‍वर आगे बताते हुए कहते हैं,' 17 साल पहले मेरी बहन की शादी गोरखपुर में हुई थी. जिस दिन शादी हुई वह तारीख 14 तो नहीं थी, लेकिन उस दिन आंशिक रूप से चतुर्दशी पड़ रही थी. शादी के तीसरे दिन ही बहन-बहनोई के साथ हादसा हो गया. कार एक्‍सीडेंट में घायल बहनोई कई महीनों तक बिस्‍तर पर पड़े रहे, बहन को गंभीर चोटें आईं. किसी तरह उनकी जान बच गई.'

जिसने तोड़ी परंपरा उसे भुगतना पड़ा

14 के दिन किए गए शुभ कार्यों के बदले हादसे से गुजरने वाला टंकेश्‍वर का परिवार अकेला नहीं है. बुजुर्ग रामानंद बताते हैं कि उनके पड़ोसी का बेटा दिल्‍ली के किसी प्राइवेट कंपनी में बड़े पद पर था. उस समय उसने गलती से 14 तारीख को ही नई-नई मारूति-800 कार ली थी.

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कार लेने के कुछ दिन बाद ही पूरा परिवार दिल्‍ली से उसी कार में कहीं जा रहा था. एक ट्रक ने कार को ऐसा रौंदा कि कोई नहीं बचा. 14 तारीख या चुतर्दशी के दिन ऐसे कई हादसे हुए हैं जिससे हम लोग इसे 'मानि' मानते हैं.

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आखिर क्‍यों हैं मनहूस 14

मीठाबेल, यह वही गांव हैं जहां सेना से रिटायर कैप्‍टन आद्या प्रसाद दूबे अपना कैंप चलाते हैं. अपने कैंप से करीब 3500 युवाओं को सेना और पैरामीलिट्री फोर्सेज में भेज चुके कैप्‍टन भी इस परंपरा को नहीं तोड़ते. कैप्‍टन बताते हैं कि किसी को यह याद नहीं कि यह परंपरा कबसे चली आ रही है लेकिन मानते सभी हैं.

कहा जाता है कि सदियों पहले गांव से सटा घना जंगल था. जंगल का कुछ हिस्‍सा आज भी मौजूद है. इस जंगल में किसी कारण आग लग गई और पूरा गांव जलकर खाक हो गया. गांव में रहने वाला कोई नहीं बचा. एक महिला अपने बच्‍चों के साथ मायके गई थी, वही इस बणवाग्‍नि से बच पाई.

First Published: Monday, February 11, 2019 08:30 AM

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