ये फिल्में न होतीं तो राखी का त्योहार फीका हो जाता !

रक्षा बंधन त्योहार के चमक बढ़ाने में फिल्मों का रहा बड़ा रोल

  |   Updated On : August 19, 2018 06:36 PM
ये फिल्में न होतीं तो राखी का त्योहार फीका हो जाता !

ये फिल्में न होतीं तो राखी का त्योहार फीका हो जाता !

नई दिल्ली:  

“चंदा रे, मेरे भइया से कहना, बहना याद करे...”। फिल्म ‘चंबल की क़सम’ का यह गाना आज भी जब कभी बजता है तो सहसा ही कदम ठिठक जाते हैं और दिल-ओ-दिमाग इस गाने की शिद्दत में कहीं खो सा जाता है। भाई-बहन के प्यार और भरोसे को जितनी खूबसूरती से साहिर लुधियानवी ने गीत में ढाला, उतनी ही संजीदगी से ख़य्याम ने इसकी धुन तैयार की और फिर लता मंगेशकर के सुरों में सजकर यह गीत हमेशा-हमेशा के लिए रक्षाबंधन का बेमिसाल प्रतीक बन गया।

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इसी तरह साठ के दशक में आई फिल्म ‘काजल’ का यह गाना याद कर लीजिए- “मेरे भइया मेरे चंदा मेरे अनमोल रतन...”। आशा भोसले की दिलकश आवाज और मीना कुमारी की भावपूर्ण अदायगी से सजे इस गाने का सार भी यही है कि एक बहन के लिए संसार में सबसे अनमोल और सबसे दुलारा सिर्फ उसका भाई है, जिसके बगैर बहन की जिंदगी उदास और बेमानी है।

‘रेशम की डोरी’ फिल्म का एक गाना- “बहना ने भाई की कलाई से प्यार बांधा है...” की मधुरता और लोकप्रियता के बारे में भी बताने की ज़रूरत नहीं। सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में ढला ये गाना आज भी रक्षाबंधन के मौके पर बजने वाला सबसे पसंदीदा गीत है। ऐसे एक-दो नहीं दर्जनों ऐसे गाने हैं जो दशकों से समाज में न सिर्फ भाई-बहन के पवित्र प्यार का प्रतिनिधित्व करते आ रहे हैं बल्कि, रक्षाबंधन जैसे पुनीत पर्व की पारंपरिक महिमा को और मजबूत करते रहे हैं।

कहते हैं, स्वस्थ और सुंदर साहित्य समाज के लिए सच्चे मार्गदर्शक का काम करते हैं, तो सांस्कृतिक सुरीलेपन से सजा सिनेमा किसी भी समाज के लिए सबसे दमदार दर्पण की तरह होते हैं। उनमें सामाजिक रीति-रिवाजों और परंपराओं का सच्चा अक्स या प्रतिबिंब नज़र आता है। भारतीय समाज में भी फिल्मों की प्रासंगिकता को इसी शाश्वत सच ने असीमित आकाश दिया। करीब सौ सालों के फिल्मी सफर में सामाजिक सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी हर वह चीज दर्शकों तक मनभावन अंदाज में पहुंची जिसका पारंपरिक ताना-बाना सदियों नहीं हजारों साल पुराना है। फिर चाहे वो होली-दिवाली और ईद जैसे धार्मिक और सामाजिक उत्सव का त्योहार हो या राखी और भैयादूज जैसा पारिवारिक स्नेह का प्रतीक पर्व।

इसमें कोई दो राय नहीं कि बीसवीं सदी के पूर्वार्ध तक, जब फिल्मों का आगमन नहीं हुआ था, तब ऐसे धार्मिक-सांस्कृतिक जलसे या पर्व-त्योहार सिर्फ किस्से-कहानियों या जन-श्रुतियों के माध्यम से ही अपना सफर तय करते रहे थे। इनमें अगर रक्षाबंधन या राखी की बात करें तो समाज के सामने प्रेरणा के रूप में या तो हूमायूं और रानी कर्णावती जैसे कुछ ऐतिहासिक घटनाओं का ब्यौरा था या फिर हिरण्यकश्यप के पुत्र और भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर आग में कूद जानेवाली होलिका का पौराणिक जिक्र था।

ऐसी ही पौराणिक, ऐतिहासिक घटनाओं या श्रुतियों के आधार पर रक्षाबंधन का पर्व सदियों तक समाज को प्रभावित और प्रोत्साहित करता रहा। पर लोक-कथाओं और नाटकों के दौर से निकलकर जब हमारा समाज सुनहरे पर्दे के सांस्कृतिक कैनवास का हिस्सा बना तो इन तमाम रीति-रिवाजों और पारंपरिक त्योहारों को जैसे पंख लग गए। भारत के फिल्मी इतिहास का प्रारंभ भले ही धार्मिक और पौराणिक कथाओं से हुआ पर चालीस और पचास का दशक आते-आते यही फिल्में सामाजिक दस्तूरों को निभाने और आगे बढ़ाने की सबसे मजबूत रिवायत बन गईं।

खासकर भाई-बहन के प्यार का प्रतीक रक्षाबंधन जैसे पर्व ने तो इसी फिल्मी माध्यम के जरिये समाज की बहुसंख्यक आबादी तक अपनी विशेष पहचान बनाई। बिना किसी धार्मिक मुलम्मे या किसी अवतार के सहारे अगर राखी ने समाज में भाई-बहन के निश्छल और निस्वार्थ प्रेम को उत्सव का रूप दिया तो इसमें फिल्मों के योगदान से इनकार नहीं किया जा सकता। आम तौर पर नायक-नायिका के रोमांस और मोहब्बत के ख़लनायक के ईर्द-गिर्द घूमने वाली फिल्मों में भी जब कभी राखी के नजराने के तौर पर भाई-बहन के प्रेम को दर्शकों के सामने रखा गया तो उसे जबर्दस्त समर्थन और कामयाबी मिली।

1959 में बनी फिल्म 'छोटी बहन' का गीत, 'भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना' आज तक जनमानस गुनगुनाता है। 1962 में आई फिल्म राखी की कहानी और उसके गानों ने तो इतिहास ही रच डाला। सत्तर के दशक में जब सेक्स और हिंसा को फिल्मों की कामयाबी का सबसे जरूरी पैमाना माना जाने लगा था, तब 1971 में प्रदर्शित फिल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' का एक गाना 'फूलों का तारों का सबका कहना है...' ने देश के तमाम भाइयों के लिए बहन की मौजूदगी और उसके महत्व को और जरूरी और प्रभावशाली बना दिया।

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हालांकि बाद के सालों में मसालेदार मनोरंजन वाले फिल्मी दौर ने भाई-बहन के भावनात्मक रिश्ते को ज्यादा जगह नहीं दी पर इस दौरान भी कभी ‘अंधा कानून’ तो कभी ‘प्यारी बहना’ जैसी फिल्मों ने इस रिश्ते को काफी सशक्त और सफल पहचान दिलाई। आज के दौर में भी भले ही भाई-बहन के रिश्ते को केंद्र में रखकर फिल्में बननी कम हो गई हों पर राखी के त्योहार पर गली-मोहल्ले हर जगह उन्हीं गानों की धूम होती है जिनमें एक भाई के लिए एक बहन के प्यार का और एक बहन के प्रति एक भाई के भरोसे की गूंज सुनाई दे। यही है कच्चे धागे के पक्के वादे की सबसे अनोखी और बुलंद पहचान।

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First Published: Sunday, August 19, 2018 06:20 PM

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