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राजस्थान के इतिहास में पहली बार संकट में पड़ा विधानसभा सत्र, सभापति इन बातों को लेकर जताई नाराजगी

News State Bureau  | Reported By : लालसिंह फौजदार |   Updated On : January 11, 2019 10:30 AM
image: rajassembly.nic.in

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जयपुर:  

विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल की नाराजगी के कारण 15वीं विधानसभा का 15 जनवरी को प्रस्तावित पहला सत्र कानूनी पेंच में उलझ गया है. प्रदेश में ऐसा पहली बार हो रहा है. हालांकि राज्यपाल कल्याण सिंह ने विधानसभा सत्र की तारीख को मंजूरी दे दी है, लेकिन अध्यक्ष की नाराजगी के कारण इसकी अधिसूचना अटक गई है.

राजस्थान में नई विधानसभा के पहले सत्र की तारीख को लेकर विवाद के बाद अजीबो गरीब परिस्थितियां बन गई हैं. दरअसल प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बाद 12 दिसंबर 2018 को नई विधानसभा का गठन हो चुका है. इधर, सरकार ने भी 15वीं विधानसभा का पहला सत्र 15 जनवरी को बुलाने का ऐलान कर दिया. विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल की आपत्ति के बाद नई विधानसभा के पहले सत्र की शुरुआत से पहले ही विवाद खड़ा हो गया है. दरअसल विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल कहते हैं कि शॉर्ट नोटिस पर विधानसभा सत्र बुलाना सही नहीं है. इसके साथ ही लोकसभा के नियम-परंपराओं का हवाला देते हुए स्पीकर ने उनसे राय-मशविरा नहीं किए जाने को लेकर भी नाराजगी जताई है. पूरा मामला अब राजभवन पहुंच चुका है. ऐसे में इस बात को लेकर संशय की स्थिति बनी हुई है कि अब 15 जनवरी से नई विधानसभा का पहला सत्र शुरू हो भी सकेगा या नहीं?

राजस्थान में विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. सत्ता परिवर्तन भी हो गया और नई सरकार ने काम करना भी शुरू कर दिया. अब नई विधानसभा के पहले सत्र में चुने गए विधायकों को शपथ दिलाई जानी है, लेकिन सत्र से पहले ही विधानसभा बुलाने की तारीख को लेकर विवाद खड़ा हो गया है. दरअसल सरकार 15 जनवरी से सत्र बुलाकर विधायकों की शपथ का कार्यक्रम शुरू करना चाहती है. इसकी खातिर राजभवन से वारंट भी जारी हो चुका है, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल ने विधानसभा सचिव को नोटिस जारी करने के निर्देश नहीं दिए हैं.

विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल का तर्क है कि लोकसभा की परंपराओं को राज्यों में भी माना जाता है और लोकसभा में परिपाटी यही रही है कि सत्र बुलाने से पहले सदन के नेता या सरकार का प्रतिनिधि स्पीकर से बात करता है. उसके बाद ही सत्र की तारीख तय होती है. स्पीकर कैलाश मेघवाल खुद की अवहेलना से नाराज हैं. नियमों का हवाला देते हुए वे कहते हैं कि कम से कम 21 दिन का नोटिस तो सत्र से पहले विधायकों को दिया ही जाना चाहिए.

-क्या कहते हैं विधानसभा में सत्र बुलाने के नियम?
स्पीकर कैलाश मेघवाल विधानसभा की नियम-प्रक्रियाओं का हवाला देते हुए कहते हैं कि इन नियमों में साफ तौर पर 21 दिन के नोटिस का प्रावधान है. मेघवाल बताते हैं कि पहले 14 दिन के नोटिस का प्रावधान हुआ करता था, लेकिन 14 दिन की अवधि कम लगी तो बाद में इसे बढ़ाकर 21 दिन किया गया. संविधान के अनुच्छेद 208(1) के अनुसरण में राजस्थान विधानसभा की प्रक्रिया तथा कार्य संचालन संबंधी नियम विरचित किए गए हैं. प्रक्रिया नियमावली के नियम- 3(2) में 21 दिन के नोटिस का ज़िक्र किया गया है.

-क्या शॉर्ट नोटिस पर बुलाया जा सकता है विधानसभा सत्र?
स्पीकर खुद यह मानते हैं कि शॉर्ट नोटिस पर भी विधानसभा का सत्र बुलाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए ऐसी विशेष परिस्थितियों का ज़िक्र किया जाना जरूरी होता है. कैलाश मेघवाल ने कहा कि पिछले 5 साल के कार्यकाल के दौरान उन्होंने भी शार्ट नोटिस पर विधानसभा का सत्र आहूत किया है. जरूरी संविधान संशोधन को विधानसभा से अनुमोदित कराने के लिए यह सत्र बुलाया गया था और इन विशेष परिस्थितियों का ज़िक्र सत्र आहूत करने के शार्ट टर्म नोटिस में भी किया गया था. इसके साथ ही विधानसभा अध्यक्ष यह भी कहते हैं कि अभी भी शार्ट टर्म नोटिस पर सरकार विधानसभा का सत्र बुला सकती है, लेकिन उसके लिए उत्पन्न हुई विशेष परिस्थितियों का जिक्र तो सरकार को करना ही होगा.

-राजभवन पहुंचा पूरा मामला, विधानसभा अध्यक्ष बोले- सरकार ने की गलती, वहीं करे भूल सुधार
स्पीकर कैलाश मेघवाल कहते हैं कि राजभवन से जारी वारंट 8 जनवरी की शाम 7 बजे विधानसभा पहुंचा. इसके बाद स्पीकर की तरफ से विधानसभा सचिव को सत्र बुलाने के लिए नोटिस जारी करने के निर्देश देने थे. मेघवाल कहते हैं कि इस बारे में सरकार के किसी प्रतिनिधि ने उनसे ना तो बातचीत की और न ही तारीख को लेकर कोई जानकारी दी. लिहाजा उन्होनें विधानसभा सचिव को नोटिस जारी करने के निर्देश नहीं दिये. विधानसभा अध्यक्ष ने इस सिलसिले में बुधवार को राज्यपाल कल्याण सिंह से मुलाकात भी की और उन्हें 3 पन्नों का अपना ज्ञापन भी सौंप दिया.

स्पीकर की तरफ से राज्यपाल को नियम-प्रक्रिया के बारे में भी बताया गया. इसके साथ ही स्पीकर कैलाश मेघवाल ने 10 से 12 जनवरी तक अपने दिल्ली प्रवास का कार्यक्रम भी रद्द कर दिया है. स्पीकर ने राज्यपाल को इस बात की सूचना दी है कि विधानसभा सत्र को लेकर उपजे घटनाक्रम के चलते दिल्ली दौरा निरस्त करके वह जयपुर में ही रहेंगे ताकि किसी भी समय उनसे चर्चा हो सके.

-क्या प्रोटेम स्पीकर आहूत नहीं कर सकता विधानसभा सत्र ?
इस घटनाक्रम के बीच सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या प्रोटेम स्पीकर विधानसभा सत्र नहीं बुला सकता? इस पर मेघवाल का तर्क है कि प्रोटेम स्पीकर की शपथ आमतौर पर सत्र से एक या दो दिन पहले होती है. स्पीकर कहते हैं कि प्रोटेम स्पीकर का काम सिर्फ नव-निर्वाचित विधायकों को शपथ दिलाने और नये स्पीकर के चुनाव तक ही सीमित है.

-क्या अभी तक भी सरकारी नुमाइन्दे से नहीं हुई स्पीकर की बात?
स्पीकर कैलाश मेघवाल से सरकार के किसी प्रतिनिधि की व्यक्तिगत बातचीत तो नहीं हुई, लेकिन मेघवाल यह जरूर कहते हैं कि आज सुबह संसदीय कार्य मंत्री शांति धारीवाल ने फोन पर उनसे बातचीत की थी. धारीवाल ने कहा कि दिल्ली से लौटने के बाद वे स्पीकर से मुलाकात भी करेंगे और इस मुद्दे पर चर्चा भी होगी.

-क्या यह अहम का टकराव है?
पूरे घटनाक्रम को देखते हुए यह भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस पूरे मामले में सिर्फ अहम का टकराव ही मूल कारण है या कुछ और मामला है? इस सवाल पर मेघवाल कहते हैं कि अहम के टकराव का प्रश्न ही नहीं उठता. वे अपनी तरफ़ से सभी मुद्दों को नियम-प्रक्रिया के आधार पर संचालित करने की बात कहते हैं.

-अब क्या होगा आगे? क्या 15 जनवरी से ही होगा सत्र?
बहरहाल पूरे मुद्दे पर बने गतिरोध को देखते हुए प्रदेश में सबके मन में यही सवाल उठ रहा है कि 15 जनवरी की पहले से तयशुदा तारीख पर विधानसभा सत्र शुरू हो पाएगा या नहीं? यही सवाल जब विधानसभा अध्यक्ष से किया जाता है तो वह कहते हैं कि संभव तो सब कुछ है, लेकिन सरकार ने गलती की है, तो गलती सुधारनी भी सरकार को ही पड़ेगी. इससे पहले स्पीकर कैलाश मेघवाल ने कहा कि शॉर्ट टर्म नोटिस पर विधानसभा की सुरक्षा व्यवस्था करने में भी संकट होगा. जब उनसे पूछा गया कि सरकार से बातचीत के बात सुरक्षा व्यवस्था कैसे होगी? इस पर मेघवाल ने कहा कि सब कुछ हो सकता है.

-वही भाजपा, कांग्रेस के नेता एक दूसरे पर हमला बोल रहे हैं-
भाजपा, कांग्रेस की सरकार पर संवैधानिक संस्थाओं के अपमान करने का आरोप लगा रहे हैं. वहीं कांग्रेस के नेता इसे बड़ा मामला नहीं मान रहे हैं. स्पीकर कैलाश मेघवाल के पूरे मामले पर अपने तर्क हैं लेकिन प्रेस से रू-ब-रू होने के दौरान उन्होंने सबसे पहले जो शब्द कहे वे भी जवाब की बजाय सवाल ही खड़े कर रहे हैं. उनका कहना था कि, 'विषय गम्भीर नहीं है, लेकिन इसे गम्भीर बनाया जा सकता है.' ऐसे में प्रदेश में संवैधानिक संकट की स्थिति बनती हुई तो दिख रही है, लेकिन खुद स्पीकर की ही भाषा में सवाल यह है कि इसे गम्भीर समझा भी जाए या नहीं? हां मगर इस पर सियासत जमकर हो रही है.

First Published: Friday, January 11, 2019 09:43 AM

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