कहानीः यू छोड़ कर चले जाना जैसे 'आखिरी पेंटिंग'

हॉस्‍पिटल की दीवार से पीठ टिकाए बैठा मैं अपने सामने से गुजरते हर इंसान को देख रहा था.

rashmi kulshreshta  |   Updated On : September 20, 2018 04:19 PM
Story rashmi kulshreshta

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नई दिल्‍ली:  

हॉस्‍पिटल की दीवार से पीठ टिकाए बैठा मैं अपने सामने से गुजरते हर इंसान को देख रहा था. बीमार इंसान को. तीस मिनट गुजर गए थे, यूं ही बैठे, ये सोचते कि अब क्या? इस रिपोर्ट के मिलने से पहले मुझे इंतजार था कि ये रिपोर्ट मुझे मिलेगी, सब ठीक ही आएगा, मैं अपनी पत्नी नीना को कहूंगा कि 'देखा कुछ नहीं निकला'. लेकिन अब इंतजार खत्म हो गया है. अब  मेरे हाथ में फंसे इस पन्ने में लिखा है कि कुछ ठीक नहीं निकला.

सदानंद गुप्ता

तभी रिसेप्शन पर बैठे शख़्स ने मेरा नाम पुकार कर डॉक्टर के दरवाजे की तरफ इशारा किया.

मैं भीतर चला आया. डॉक्टर ने मेरी रिपोर्ट पढ़कर वही बातें कहीं जो मेरे जैसे मरीजों को वो अक्सर कहते होंगे. मरीज़! इंसान या नाम के संबोधन से आगे बढ़कर मैं अब मरीज पर आ चुका था.

‘खुश रहें, अच्छे से जिएं’ जैसी प्रेरणादायक बातें सुनकर मैं घर चला आया. नीना ने दरवाजा खोला, ‘क्या कहा डॉक्टर ने...सब ठीक है ना’?

एक गहरी सांस भरकर मैंने कहा, ‘ज़्यादा ठीक नहीं’

वो चुपचाप मुझे देखने लगी, जैसे पूछना चाह रही हो कि ज़्यादा ठीक नहीं, मतलब कुछ तो ठीक है ना?

मैं अक्सर नकारात्मक शब्दों के इस्तेमाल से बचता हूं, जैसे मैंने उसे नहीं कहा कि सब खराब है. मैं भीतर आकर बिस्तर पर निढ़ाल हो गया. नीना वहीं सिरहाने पानी का गिलास लिए खड़ी रही.

‘तूने मेरी बड़ी सेवा की है नीना... अब थोड़ा आराम कर ले.’ मैंने आंखें मूंदे कहा.

‘आप ठीक हो जाएं तब आराम कर लेंगे.’ कहते हुए उसने गिलास मेरी ओर बढ़ा दिया.

पता नहीं मैं कभी ठीक हो पाऊंगा या नहीं. पता नहीं ये जो मेडिकल टर्म में रिपोर्ट लिखी है इसे नीना समझ पाएगी या नहीं.  डॉक्टर ने जो खुश रहें वाली नसीहत दी है उसे मैं अमल में ला पाऊंगा या नहीं.

रातभर मैं इसी में उलझा रहा. नीना मेरे बगल में लेटी आस-पड़ोस के उन दुर्लभ मरीज़ों के किस्से सुनाती रही जो अब स्वस्थ हैं. अब उसे कैसे बताता कि मैं उनमें से नहीं था. मैं तो जमीन पर पड़ी चूने की उस लकीर की तरह था जिसे हवा का हल्का झोंका बार-बार जरा-जरा सा अपने साथ लिए जा रहा था.

 

अगली सुबह मैं स्कूल जाने के लिए तैयार हो रहा था. नीना मेरे पीछे खड़ी आइने में मेरी सूरत बड़े लाड़ से निहार रही थी. शायद ठीक दिख रहा था मैं उसे. मैंने भी सब कुछ उससे छुपा लिया.

‘सोच रहा हूं एक पेंटिंग बनाऊं.... जाने से पहले.’ ये आख़िरी वाले तीन शब्द मैंने सिर्फ़ मन में कहे.

‘स्कूल के बच्चों को सिखाते हो ना कला, वहीं बना लेना.’ कहते हुए उसने बड़ी चालाकी से मेरी कमीज़ की जेब में मुट्ठीभर मेवाएं डाल दीं. मैंने एक बादाम निकालते हुए कहा, ‘वो नहीं...अपने लिए एक पेंटिंग. जो सिर्फ़ मेरी हो.’

 

एक स्कूल में आर्ट टीचर, नीना मुझे सिर्फ़ इतना ही जानती थी. मैं कभी पेंटर भी रहा था, उसे मालूम भी नहीं था. मैंने भी कभी बताया नहीं था उसे. हम अपनी नाकामियां अक्सर छुपा ही जाते हैं. बैग उठाकर मैं स्कूल के लिए निकल गया. मैं आगे कदम बढ़ राह था और मन के कदम सालों पीछे दौड़ रहे थे.

उन दिनों मैं नौकरी छोड़कर बैठा था. ऐसा नहीं कि उसमें कोई परेशानी थी, बस मन नहीं लगता था. सफ़ेद पन्ने पर छपे काले शब्द मुझे भाते नहीं थे. मुझे तो रंगों में डूबना-उबरना अच्छा लगता था. पिताजी मेरे इस शौक को पागलपन कहा करते थे. सच कहूं तो किसी भी कला से प्रेम करना एक तरीके का पागलपन ही तो है. अपने शौक से इश्‍क करना क्या होता है ये मुझ जैसे फ़ितूरी लोग ही समझ सकते होंगे.

उन्हीं दिनों पता चला था कि बड़े शहरों में पेंटर अपनी पेंटिंग की नुमाइश लगाते हैं. बस उसी रोज़ से ठान लिया था कि अगली एग्ज़ीबिशन मेरी होगी. पहली फुर्सत में नौकरी छोड़ी और कूंची पकड़ ली.

‘दिमाग़ खराब हो गया है इसका. ये सारे शौक देखने में अच्छे लगते हैं लेकिन कमाई नहीं होती. जब जेब में पैसे नहीं होंगे...तब पता चलेगा इसे.’  जिस रोज़ नौकरी छोड़कर आया था उस शाम पिताजी ने बहुत गुस्सा किया. मैं भी उन्हें सुनता रहा. पूरे घर में मां ही थीं जिन्होंने हमेशा मेरा साथ दिया. ना समझ आने वाली पेंटिंग को देखकर भी , ‘वाह...ये तो बड़ी बढ़िया बनाई है कहती थीं.’

मैं जब मुस्कराते हुए उसको सीधा करता तो ज़ोर से हंस देती. कहतीं कि तूने बनाई ना...इसलिए अच्छी बनी है, उल्टी रखने पर भी समझ में आती है.

 

कोई 6 महीनों में 11 पेंटिंग बना चुका था मैं. शहर में एक जगह आर्ट एग्ज़ीबिशन लगी, तो इस दफ़ा मैंने भी इसमें हिस्सा लेने की बात घर में सबके सामने रखी.

‘नौकरी छोड़ने से पहले पूछे थे...जो अब कह रहे हो.’ पिताजी ने अपना गुस्सा फिर उड़ेला. वैसे पिताजी से ज़्यादा उम्मीद थी नहीं मुझे. हां मां ने पेटिंग देखकर एक बात कही, ‘लोगों को कैसे पता चलेगा कि ये तेरी पेंटिंग है... अपना हस्ताक्षर तो डाल दे.’

मां चाहती थी कि लोग मुझे जानें...तभी वो मुझे बार-बार कहती रहतीं कि मैं अपनी पेंटिंग के नीचे दस्तखत करूं. मैंने नहीं किए..कभी भी.

 

‘अरे सदानंद जी तबियत कैसी है?’ वाइस प्रिंसिपल ने पुकारा तो मैं चौंका.

हाथ हिलाकर इशारा करते हुए कहा, ‘हां ठीक है’ और स्टाफ़ रूम की ओर कदम बढ़ा दिए. चलते हुए मुझे याद आ रहा था वो दिन जब पहली पेंटिंग खरीदी गई थी.

‘6 महीने की पहली कमाई है. फ़्रेम करवा कर रख लो इसे.’ पितीजी की बात ताने जैसी लगी थी मुझे. मैंने हंसते हुए बात टाल दी. पलटकर जवाब देता भी तो किसे, मेरे अपने ही तो थे. फ़िक्र करते थे वो मेरी.

धीरे-धीरे वक़्त बदलने लगा. थोड़ा बहुत नाम होने लगा था मेरा.

कामयाबी किसी पहाड़ी जैसी होती है, जिसकी चोटी पर चढ़ने में जितनी मेहनत लगती है, उससे उतरने में ज़रा भी परिश्रम नहीं करना पड़ता. मैं भी ढ़लान पर था. दो साल सब कुछ ठीक रहा फिर हवाएं उल्टी बहने लगीं. कद्रदान नयापन चाहते और मैं पुराने रंग ही छापता रहा.

शायद चुक जाते हैं हम. कल्पनाशीलता एक वक़्त बाद किसी बिंदु पर आकर ख़त्म हो जाती है. जैसे मेरी हो गई थी. मेरी पेंटिंग्स अब आर्ट गैलरी की जगह स्टोर रूम में पड़ी रहने लगीं.

‘स्कूल में आर्ट टीचर की जगह खाली है, एप्लाई कर दो.’ उस रोज़ पिताजी ने कहा.

इस दफ़ा मैंने मान ली उनकी बात. उस रोज़ बाद मेरी रंगों की दुनिया छोटी हो गई थी.

 

‘सर... आप आएंगे क्लास में? या फिर हम खुद कुछ बना लें.. गुडहल का फूल या कोई सीनरी?’ 9वीं कक्षा के एक लड़के ने पूछा तो मैं यादों से बाहर आया. वो रुककर मेरी शक्‍ल देखता रहा जैसे कमज़ोरी की लकीरें ढूंढ रहा हो. मैं अपनी सीट से उठा और उसके पीछे चल दिया. पांव कमज़ोरी की वजह से हल्के पड़ रहे थे.

मन अगर बीमार हो तो शरीर झटक जाता है. मेरा मन बीमार तो कब का था. जिस वक़्त हाथ से पेंटिंग ब्रश छूटा था शायद तब से.

स्कूल से घर पहुंचते हुए शाम हो गई. नीना दरवाज़े पर खड़ी मेरा इंतज़ार कर रही थी.

‘क्या हुआ आज देर लगा दी बड़ी.’ पूछते हुए उसने मेरे हाथ में पकड़े रंगों देखा तो बोली, ‘मैं स्टोर से सामान निकलवाकर दालान में लगवा दूं?’

पूछते वक़्त उसकी आवाज़ की कंपकंपाहट महसूस की थी मैंने...जैसे कुछ छूट रहा हो उसके मन से.

 

अगली शाम जाने कितनी देर ब्रश हाथ में पकड़े सोचता रहा कि क्या बनाऊं? कौन से रंग उडेलूं कि ज़िदंगी की सबसे बेहतर पेंटिंग बन जाए! सालों बाद इस बड़े कैनवास के सामने खड़े होने में अजीब सा डर लग रहा था..जैसे कैनवास कितना बड़ा हो और ज़िंदगी कितनी छोटी.

ज़िंदगी कितनी भी लंबी हो जाए, लेकिन जब वक़्त कम हो तब ज़रूर छोटी नज़र आती है. हर घटते लम्हे के साथ सैकड़ों काश जुड़ जाते हैं. मेरा काश सिर्फ़ एक था... एक ऐसी पेंटिग  जो सबसे बेहतर हो.

मैं रंग छिड़कने लगा था उस खाली कैनावास पर. सूनापन चुना था मैंने. स्लेटी, स्याह, सादा रंगों में. एक बंद कमरा, जंग लगी खिड़की और उसकी चौखट पर बैठा एक पंछी जो पंख फड़फड़ा रहा है.

‘कितनी देर लगे रहेंगे...थोड़ा आराम कर लें.’ जब मैं सुस्ताने बैठता तो नीना अक्सर कहती.  दिल होता कि उसकी बात मान लूं... पर मान नहीं पाता.

‘इकट्ठा आराम करूंगा. एक दफ़ा ये पूरी हो जाए.’ कहकर मैं उसे एक चाय बनाने भेज देता. नीना चाय बनाकर लाती और मेरे पीछे खड़ी रहती.

मैं अक्सर सोचता हूं कि जब मैं नहीं रहूंगा...तो ये क्या करेगी. किसका इंतज़ार, किसकी सेवा, किससे मनुहार....

‘तुम आराम कर लेना. मैंने यूं ही कह दिया.’ शायद मुझे आगे कहना चाहिए था...'मेरे जाने के बाद.'

जाना ज़िंदगी में जाना उतना ही ज़रूरी होता है जितना आना. मां चली गईं थी, पिताजी भी चले गए थे और अब मेरी बारी थी. सब अपनी बारी से चले जाते हैं इस जीवन में लगी लंबी कतार के साथ.

कुछ दिनों में कमरा, दीवारें, खिड़की सब कैनवास पर उतर गए थे. बस बचा था तो वो फड़फड़ाता पंछी.

तबियत अब थोड़ी खराब रहने लगी. हां, ज़्यादा नहीं थोड़ी. 15-20 मिनट में थक जाता, बीच-बीच में हाथ कांपने लगते तो नीना संभाल लेती मेरा हाथ. समझने लगी थी वो. शायद बहुत पहले समझ गई थी जब मैंने एक अदद पेंटिंग की इच्छा जताई थी.

कितनी परतें होती हैं स्त्री चरित्र में. जिस वक़्त वो मेरे साथ होती डरती हुई नहीं दिखती...बस आंखों के नम किनारे पकड़ में आ जाते.

मैं अब आखिरी पड़ाव पर था. खिड़की पर वो पंछी बनाना  शुरू कर दिया था मैंने. खुलते हुए पंख, आसमां को ताकती आखें, उचके हुए पंजे, ज़मीन के तल से ऊपर, बहुत ऊपर. फड़फड़ाता हुआ पंछी नहीं उड़ता हुआ पंछी बना दिया था मैंने. उसकी आंखों पर काले रंग की बूंद रखकर पूरा कर दिया. नीना उस रोज़ मेरे कंधे पर सिर रखकर रो दी थी. कंधे पर महसूस की थी मैंने वो बूंद उसे पोंछा नहीं बह जाने दिया.

‘नीचे साइन नहीं करोगे?’ उसने काफ़ी देर बाद पूछा.

मुझे मां याद आ गईं. मैंने कूंची में ज़रा सा काला रंग लगाया और कोने पर लिखा... 'संदानंद'

उस रात बड़ी सुकून की नींद आई थी, गहरी, आरामदेह.

सुबह का वक़्त था या जाने रात का, नीता मुझे हिला रही थी. मैं मुस्कराते हुए उसे देख रहा था. वो रो रही थी और मैं उड़ रहा था मेरे आख़िरी पेंटिंग के उस उड़ते पंछी के साथ.

First Published: Wednesday, September 19, 2018 01:08 PM

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