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तीन तलाक को अपराध बनाना समान नागरिक संहिता की दिशा में बड़ा कदम

Nihar Ranjan Saxena  |   Updated On : August 01, 2019 07:10 PM
सांकेतिक चित्र.

सांकेतिक चित्र.

ख़ास बातें

  •  तीन तलाक की शिकार 75 फीसदी मुस्लिम महिलाएं गरीब परिवारों से आती हैं.
  •  कांग्रेस का इसको लेकर रुख सिर्फ और सिर्फ राजनीति ही कहा जाएगा.
  •  बदलते समाज के साथ मुस्लिम महिलाओं को कानूनी संरक्षण देना वक्ती जरूरत.

नई दिल्ली.:  

तीन तलाक को अपराध की श्रेणी में लाना समान नागरिक संहिता की दिशा में बड़ा कदम है. तीन तलाक को अपराध बनाता 'मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक 2019' सामाजिक बराबरी और महिला अधिकारों के संदर्भ में बड़ी पहल है. हिंदुओं में शादीशुदा महिलाओं के अधिकारों को संरक्षण देते कई कानून पहले से ही हैं. अभी तक मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को संरक्षित करने की हर पहल को शरियत, हदीस और कुरान के नाम पर दरकिनार किया जाता रहा है. महज वोट बैंक के लिए शाहबानो मामले में आए फैसले को पलट देने से इसकी गलत नजीर पड़ी. इस लिहाज से देखें तो राज्यसभा में तीन तलाक को अपराध बनाता विधेयक पारित होना ऐतिहासक है और मोदी सरकार के घोष वाक्य 'सबका साथ सबका विकास और सबका विश्वास' के अनुकूल भी है.

गलतबयानी ज्यादा
हालांकि इस पर जिस तरह से बहस हुई और इसके विरोध में विपक्ष और मुस्लिम धर्मगुरुओं ने जो तर्क रखे उससे यह बात साफ हो जाती है कि वे तीन तलाक को लेकर गलतबयानी ही अधिक हुई है. इससे अजीब बात और कोई नहीं हो सकती है कि कई विपक्षी दलों ने उन मुस्लिम धर्मगुरुओं के साथ खड़ा होना पंसद किया जो तत्काल तीन तलाक की प्रथा को गलत तो मान रहे है, लेकिन उसे खत्म करने की पहल नहीं करना चाह रहे? खासकर कांग्रेस का इसको लेकर रुख सिर्फ और सिर्फ राजनीति ही करार दिया जा सकता है. यह देखते हुए भी कि कांग्रेस सरकार ने ही 55 साल पहले सती प्रथा के खिलाफ कानून बनाया था. बाद में हिंदू विवाह कानून में संशोधन के साथ 1961 में दहेज प्रथा के खिलाफ प्रगतिशील कानून देने वाली कांग्रेस तीन तलाक का विरोध कर रही है.

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मुस्लिम महिलाओं के शोषण पर आंखें बंद
केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने राज्यसभा में तीन तलाक पर चर्चा के दौरान सही ही कहा कि हिंदू महिला अधिकारों को लेकर कानून पारित करने का साहस दिखाने वाली कांग्रेस का रवैया तीन तलाक पर समझ से परे है. आखिर मुस्लिमों को कब तक सामाजिक बराबरी से दूर रखा जाएगा. गौरतलब है कि महज मुस्लिम धर्म गुरुओं को नाराज नहीं करने के लिए 1986 में शाहबानो के लिए न्याय का दरवाजा बंद कर दिया था. अब 2019 में शायराबानो के मामले में भी उसने तीन तलाक का रास्ते में अवरोध पैदा करने का काम किया. अगर मुस्लिम समाज की असल तस्वीर को सामने लाती सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाला, तो मुस्लिम महिलाओं के तीन तलाक के नाम पर हो रहे शोषण पर भी उसने अपनी आंख बंद कर रखी है.

तीन तलाक की शिकार 75 मुस्लिम महिलाएं गरीब परिवारों से
वास्तव में तत्काल तीन तलाक की कुप्रथा (तलाक-ए-बिद्दत) उन सामाजिक बुराइयों में से है जो मुस्लिम महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक साबित करती है. क्या ऐसी कोई प्रथा धर्मसम्मत कही जाएगी जो पति को पत्नी को एक झटके में छोड़ने का अधिकार देती हो? तत्काल तीन तलाक की बुराई के चलन में होने के कारण मुस्लिम महिलाएं अपने वैवाहिक भविष्य को लेकर आशंका से घिरी रहती थीं. इससे भी खराब बात यह थी कि जब उन्हें एक झटके में तीन तलाक दे दिया जाता था तो वे एक तरह से सड़क पर आ जाती थीं. इस हालत में उन्हें मुश्किल से ही कोई सामाजिक-मानसिक या आर्थिक मदद मिलती थी. अगर आंकड़ों की भाषा में बात करें तो तीन तलाक की शिकार 75 फीसदी मुस्लिम महिलाएं गरीब परिवारों से आती हैं.

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कई मुस्लिम देशों में नहीं तीन तलाक की कुप्रथा
एक बड़ी सच्चाई मुस्लिम धर्मगुरुओं के साथ खड़ी कांग्रेस या अन्य विपक्ष भी अनदेखी कर रहा है. वह यह है कि दुनिया के कई मुस्लिम राष्ट्रों में भी तीन तलाक की प्रथा खत्म कर दी गई है. ऐसे में जब भारत विश्व गुरु बनने का ख्वाब देख रहा है, तो समाज को बदलने के अच्छे प्रयासों के रास्ते में भी रोड़े अटकाए जा रहे हैं. वह भी उस कुरान के नाम पर जहां मुस्लिम महिलाओं को बराबरी से कहीं ज्यादा अधिकार दिए गए हैं. क़ुरान में एकतरफ़ा, एक ही वक़्त में या एक ही बैठक में तलाक देना गैर-इस्लामी माना गया है.

क्या कहता है सूरह निसा
सूरह निसा के अनुसार अगर औरत की नाफ़रमानी और बददिमागी का खौफ़ हो तो उसे नसीहत करो और अलग बिस्तर पर छोड़ दो. अगर किसी औरत को अपने शौहर की बददिमागी और बेपरवाही का खौफ़ हो तो बीवी को भी शौहर को मौका देना चाहिए, न कि फ़ौरन कोई फ़ैसला करना चाहिये. घर को बरबादी से बचाने के लिए अगर उसके हक मे कोई कमी हो तो उसे भूल कर हर हाल मे घर को बचाने की कोशिश करनी चाहिए. अगर शौहर बीवी की सारी कोशिशें नाकाम हो जाएं, तो भी तलाक देने मे जल्दबाज़ी की जगह एक और रास्ता यह है कि दोनों के खानदान से एक-एक समझदार और हकपरस्त व्यक्ति को शामिल कर रास्ता निकालना चाहिए.

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क्या है बिल के प्रावधान
सबसे पहले तो यही है कि तीन तलाक के मामले को दीवानी मामलों की श्रेणी से निकालकर आपराधिक श्रेणी में ले आता है. तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत रद्द कर दिया गया है. ऐसा होने पर पुलिस संबंधित शख्स को बगैर वारंट गिरफ्तार कर सकती है. दोषी पाए जाने पर तीन साल की सजा का प्रावधान है. इस बिल का एक बड़ा पहलू यह है कि पीड़ित महिला की खुद की या नजदीकी रिश्तेदार की शिकायत पर ही यह संज्ञेय अपराध बनेगा. दूसरे शब्दों में कहें तो पड़ोसी या कोई अनजान शख्स इस मामले में केस दर्ज नहीं करा सकता. मजिस्ट्रेट पीड़ित महिला का पक्ष सुनकर पति को जमानत दे सकेगा, पत्नी की पहल पर सुलह करा सकेगा नाबालिग बच्चे के संरक्षण का अधिकार तय करेगा. गुजारा भत्ता की रकम तय कर सकेगा. यानी तीन तलाक के खिलाफ कानून बन जाने से मुस्लिम महिला सामाजिक-आर्थिक तौर पर स्वावलंबी बन सम्मान की जिंदगी जीने की अधिकारी होगी.

विपक्ष का विरोध बेबुनियाद
विपक्ष का एक मोटा-मोटी विरोध यही है कि जब सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक को अमान्य करार दे चुका है, तो उस पर कानून खासकर आपराधिक कानून बनाने की जरूरत क्या थी. इसके अलावा दूसरी वजह यह है कि पति के जेल जाने पर पत्नी और बच्चे को गुजारा भत्ता कौन देगा? साथ ही विपक्ष का एक अन्य बड़ा आरोप यह भी है कि इस कानून के लागू होने के बाद इसका दुरुपयोग हो सकता है. इसकी वजह यह है कि तीन तलाक साबित करने की जिम्मेदारी सिर्फ मुस्लिम महिला पर है.

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हिंदू महिला के अधिकार
राजा राम मोहन राय से लेकर पंडित जवाहर लाल नेहरू तक ने हिंदू महिलाओं की सामाजिक दशा-दिशा सुधारने के लिए कई ऐतिहासिक काम हुए. सबसे पहले सती प्रथा पर रोक लगाई गई. फिर 1955 में हिंदू विवाह अधिनियम, 1956 में क्रमशः हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, हिंदू अवयस्कता और संरक्षता अधिनियम समेत हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम लागू किया गया. 1955 से पहले भारत में तलाक के मामले में ना के बराबर ही थे, लेकिन हिंदू नारी को बराबरी के अधिकार के तहत हिंदू विवाह अधिनियम एक बड़ा फैसला रहा. इसके तहत पत्नी तलाक की स्थिति में गुजारा भत्ता पाने की अधिकार है. उस दौर में भी मुसलमानों ने यही कहा कि उनका समाज कुरान के अनुसार ही फैसला लेगा. शाहबानो मामले में क्रांतिकारी फैसला आने पर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने उसे पलट दिया. हालांकि सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था के तहत सीआरपीसी 125 के तहत मुस्लिम महिला भी गुजारा भत्ता पाने की अधिकारी हो गईं. बाद में दहेज को सामाजिक बुराई मान दहेज उत्पीड़न (498) का कानून बनाया गया. हालांकि इसके दुरुपयोग के मामले बढ़ते देख सुप्रीम कोर्ट की दखल के बाद संशोधन (498 ए) किया गया.

हिंदुओं के लिए भी आपराधिक मामले
इस तरह अगर देखा जाए तो तीन तलाक का विरोध करने वालों का तर्क कि हिंदुओं के लिए सजा का कोई प्रावधान नहीं है, अपने आप ही गलत साबित होता है. शादीशुदा हिंदू महिला को दहेज उत्पीड़न से लेकर गुजारा भत्ता, बच्चों के भरण पोषण और घरेलू हिंसा से बचाने की व्यवस्था मौजूद है. अभी तक मुस्लिम महिलाओं के लिए कानून ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी, लेकिन 'मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक 2019' के अस्तित्व में आ जाने से अब वह भी कानून के संरक्षण में आ गई हैं. रहा सवाल इसके दुरुपयोग का, तो दहेज उत्पीड़न कानून का उदाहरण दिया जा सकता है. इसके दुरुपयोग के बढ़ते मामलों को देखने के बाद ही सुप्रीम कोर्ट की पहल पर इसमें संशोधन किया गया था. यानी बगैर जांच के गिरफ्तारी नहीं हो सकती है. ऐसे में तीन तलाक कानून का दुरुपयोग रोकने समय के साथ ही नजीर स्थापित होंगी.

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हिंदुओं से कम है मुस्लिमों में तलाक का प्रतिशत
यह सही है कि तीन तलाक का तरीका बेहद आसान होने के बाद भी अपने देश के मुस्लिमों के बीच तलाक का अनुपात कम है. मात्र 0.5 अर्थात आधा प्रतिशत. शायद हिंदुओं से भी कम. पढ़े-लिखे और जागरूक मुस्लिम तीन तलाक का प्रयोग शायद ही कभी करते है. इसका प्रचलन अनपढ़ और नशे के आदी लोगों में ही ज्यादा है. इसका प्रयोग बिना आगे-पीछे सोचे क्षणिक गुस्से और भावावेश में ही ज्यादा होता रहा है. इसके बावज़ूद अपने देश में लैंगिक समानता के आदर्श के आलोक में इसमें संशोधन कर इसे कुछ और कठोर बनाने की जरूरत लंबे अरसे से महसूस की जाती रही है. मंगलवार को इस लिहाज से राज्यसभा में जो हुआ वह न सिर्फ ऐतिहासिक है, बल्कि समान नागरिकता संहिता के अनुरूप और बराबरी के संवैधानिक अधिकार के तहत जरूरी भी है.
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं.)

First Published: Wednesday, July 31, 2019 01:44:10 PM
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