BREAKING NEWS
  • छोटा राजन का भाई उतरा महाराष्ट्र के चुनावी रण में, इस पार्टी ने दिया टिकट - Read More »
  • IND vs SA, Live Cricket Score, 1st Test Day 1: भारत ने टॉस जीता पहले बल्‍लेबाजी- Read More »
  • Howdy Modi: पीएम मोदी Iron Man हैं, जानिए किसने कही ये बात- Read More »

बीजेपी में मोदी-शाह की जोड़ी पार्टी के इतिहास को एक बार फिर से दोहरा रही है

Nihar Ranjan Saxena  |   Updated On : June 28, 2019 03:36:48 PM

(Photo Credit : )

ख़ास बातें

  •  एक और एक ग्यारह की तर्ज पर काम कर रही मोदी-शाह की जोड़ी.
  •  बेहतरीन कैमेस्ट्री और विश्वास के भाव ने रखी संबंधों की मजबूत नींव.
  •  बीजेपी के विजय रथ को और आगे बढ़ाने की है चुनौती.

नई दिल्ली.:  

भारतीय जनता पार्टी (BJP) आज जिस मुकाम तक पहुंची है उसमें अटल-आडवाणी (Atal-Advani) की जोड़ी के योगदान को कभी भी कमतर करके नहीं देखा जा सकता. एक लिहाज से देखें तो अटल बिहारी वाजपेयी बीजेपी का चेहरा (Face) थे, तो लाल कृष्ण आडवाणी आधार स्तंभ (Pillar). दोनों के राम मंदिर रथयात्रा (RathYatra) के प्रयोग ने भारतीय राजनीति में बीजेपी का वह स्वर्णिम इतिहास लिखा कि कांग्रेस (Congress) आज अस्तित्व के संकट से दो चार हो रही है. यह जानना तो और भी रोचक रहेगा कि कांग्रेस के इस संकट के लिए जिम्मेदार बने पीएम नरेंद्र मोदी को संघ से भाजपा में लाने में आडवाणी की भूमिका ही अहम रही है. आज मोदी-शाह की जोड़ी बीजेपी की नींव (Foundation) को मजबूत करने का काम कर रही है. हालांकि एक अंतर यह जरूर है कि अटल-आडवाणी की भाजपा काडर (BJP Cadre) केंद्रित बीजेपी मोदी-शाह के दौर में सियासी समीकरण (Political Equations) बैठाने में सिद्धहस्त हो चुकी है.

यह भी पढ़ेंः देश के मूड को समझने में क्यों विफल रहा 'लुटियंस दिल्ली'

मोदी के कवच साबित हुए आडवाणी
गौरतलब है कि लाल कृष्ण आडवाणी की पहली रथयात्रा में संयोजक के रूप में सारथी नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ही थे. इसके बाद मोदी के राष्ट्रीय सचिव और गुजरात (Gujarat) के मुख्यमंत्री (CM Narendra Modi) बनने में आडवाणी की ही केंद्रीय भूमिका रही. यही नहीं, गुजरात दंगों (Gujarat Riots) के बाद जब अटल बिहारी वाजपेयी ने सीएम नरेंद्र मोदी को 'राजधर्म' का पालन करने की नसीहत दी थी, तो उनके कवच बनकर भी सामने आए थे लाल कृष्ण आडवाणी. एक लिहाज से लाल कृष्ण आडवाणी ने बीजेपी को राजनीतिक पार्टी और संगठन को गढ़ने में महती भूमिका निभाई है. आडवाणी ने ही बीजेपी को नए चेहरे दिए. इस कड़ी में प्रमोद महाजन, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली (Arun Jaitley), नरेन्द्र मोदी, कल्याण सिंह, वेंकैया नायडू, राजनाथ सिंह (Rajnath Singh) जैसे नेताओं का नाम आता है. इस नई पीढ़ी के रूप में दूसरी पंक्ति के भाजपा नेताओं ने अपने-अपने स्तर पर बीजेपी को बढ़ाने का काम किया है.

यह भी पढ़ेंः जानें गृह मंत्रालय कैसे करता है काम, गृहमंत्री अमित शाह के सामने क्या होंगी चुनौतियां

बीजेपी में इतिहास खुद को रहा है दोहरा
अब बीजेपी में आडवाणी मार्गदर्शक (Mentor) की भूमिका में हैं और मोदी-शाह की जोड़ी पार्टी व संगठन (BJP Party) को आगे ले जाने का काम कर रही है. कह सकते हैं कि बीजेपी का यह युग पुरुष इतिहास को दोहराते हुए देख रहा है. हालांकि यह कहना भी गलत नहीं होगा कि अमित शाह भाजपा के संगठन पर आडवाणी की तुलना में कहीं मजबूत पकड़ रखते हैं. यही वजह है कि गांधीनगर (Gandhi Nagar) की जिस सीट पर अमित शाह लाल कृष्ण आडवाणी के बूथ प्रभारी थे, 2019 में उसी सीट से अमित शाह लोकसभा में पहुंचे हैं. एक तरह से अमित शाह ने 2019 में आडवाणी की विरासत (Party Legacy) को संभाल लिया है. गृहमंत्री बनने के बाद सक्रिय राजनीति में उन्होंने धमाकेदार एंट्री की है.

यह भी पढ़ेंः थ्री लैंग्वेज सिस्टम पर बोले शशि थरूर, साउथ में हिंदी है, नॉर्थ में मलायम या तमिल का नामलेवा नहीं

मोदी-शाह की केमेस्ट्री है बेमिसाल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) और गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) नई बीजेपी के आधार स्तंभ हैं. दोनों की न सिर्फ केमेस्ट्री अच्छी है, बल्कि एक-दूसरे को बाखूबी समझते भी हैं. विश्वास का भाव तो खैर दोनों के बीच है ही. इस जोड़ी का प्रभाव भी गुजरात में बीजेपी के उभार में स्पष्ट देखा जा सकता है. गुजरात में बतौर सीएम मोदी के मंत्रिमंडल में भी अमित शाह गृह मंत्री (Home Minister) की भूमिका निभा चुके हैं. अब केंद्रीय मंत्रिमंडल (Cabinet) में शाह फिर पुरानी, लेकिन कहीं चुनौतीपूर्ण भूमिका में हैं. शाह की छवि ऐसी है कि आपराधिक तत्वों समेत राष्ट्र विरोधी (Anti Nationals) तत्वों को उनसे भय होने लगा है.

यह भी पढ़ेंः बागपत में सेना के जवानों को दबंगों ने पीटा, वीडियो हुआ वायरल

शह-मात की हर बिसात से वाकिफ है मोदी-शाह की जोड़ी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने राजनीतिक जीवन में कभी किसी ऐसे व्यक्ति पर दांव नहीं लगाया, जो उनके लिए अहितकारी हो. बीजेपी अध्यक्ष (BJP President) और केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने भी ऐसा ही किया है. हालांकि 2019 का लोकसभा चुनाव (Loksabha Elections 2019) जीतने के बाद मोदी सरकार-2 की चुनौतियां काफी बढ़ गई हैं. अच्छी बात यह है कि पीएम मोदी समझते हैं कि इन चुनौतियों को बिना अमित शाह के पार नहीं पाया जा सकता. इसलिए भी उन्होंने गृहमंत्री के लिए अमित शाह को ही चुना है. इसी साल हरियाणा, महाराष्ट्र और असम में (Assembly Elections) चुनाव होने हैं. इनसे जुड़ी स्थितियों औऱ चुनौतियों को भांपते हुए ही प्रधानमंत्री ने शाह को यह जिम्मेदारी दी है.

यह भी पढ़ेंः केजरीवाल सरकार महिलाओं को दे सकती बड़ा तोहफा, मेट्रो और DTC बसों में मुफ्त सफर कराने की तैयारी

मोदी-शाह की जोड़ी में मनभेद की गुंजाइश ही नहीं
भारतीय राजनीति में अटल-आडवाणी की जोड़ी में कुछ मुद्दों पर गंभीर मतभेद (Differences) होने के बाद भी मनभेद नहीं हुआ. आडवाणी ने कभी अटल की मुखालफत नहीं की. इसके समानांतर प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह का तालमेल और बेहतर है. भाजपा के एक महासचिव का कहना है कि अमित शाह वह सोच ही नहीं सकते जो प्रधानमंत्री को नापसंद (Modi Dislikes) हो. वह कहते हैं प्रधानमंत्री के सामने होने पर वह सम्मान में नजर तक नहीं उठाते. यही हाल प्रधानमंत्री मोदी का है. उन्होंने अपना आभा मंडल ऐसा बना रखा है कि किसी सहयोगी को भी अध्यक्ष (अमित शाह) के बारे में प्रधानमंत्री (Prime Minister) से कुछ कहने के पहले 100 बार सोचना पड़ता है. कह सकते हैं कि मोदी-शाह की यह जोड़ी बीजेपी (BJP) को भारतीय राजनीति के ऐतिहासिक शिखर तक पहुंचाने के लिए अश्वमेघ को घोड़ा छोड़ चुकी है. अब देखते हैं इस विजयी रथ को रोकने का काम कौन करता है?

First Published: Jun 02, 2019 06:39:16 PM
Post Comment (+)

न्यूज़ फीचर

वीडियो