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Ayodhya Supreme Court Verdict : निर्मोही अखाड़े और शिया वक्‍फ बोर्ड ने यह किया था दावा

News State Bureau  |   Updated On : November 09, 2019 12:42:51 PM
अयोध्‍या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

अयोध्‍या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला (Photo Credit : फाइल फोटो )

New Delhi:  

Ayodhya Verdict : हिन्‍दुओं के सबसे बड़े आराध्‍य भगवान श्रीराम का वनवास त्रेता युग में तो महज 14 साल में ही खत्‍म हो गया था. लेकिन कलयुग में उनका वनवास ज्‍यादा लंबा हो गया था. सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी तौर पर श्रीराम को एक व्‍यक्‍ति मानते हुए अयोध्‍या (Ayodhya) में राम मंदिर का रास्‍ता साफ कर दिया है. देश के सबसे बड़े विवाद में फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हिन्‍दुओं की आस्‍था और विश्‍वास को दरकिनार नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने केंद्र सरकार को तीन माह में राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्‍ट और योजना बनाने का आदेश दिया है. साथ ही मुस्‍लिम पक्ष के लिए अयोध्‍या में ही दूसरी जगह 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया गया है. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने सुन्‍नी वक्‍फ बोर्ड की याचिका खारिज कर दी और साथ ही निर्मोही अखाड़े का एक सूट भी खारिज कर दिया. ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि शिया वक्‍फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े ने आखिर दलील क्‍या दी थी और उनका दावा क्‍यों खारिज कर दिया गया.

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शिया वक्‍फ बोर्ड की क्या दलील थी
शिया वक्फ बोर्ड की ओर से वकील एमसी धींगरा ने कहा कि 1936 में शिया सुन्नी वक्फ बोर्ड बनाने की बात तय हुई और दोनों की वक्फ सम्पत्तियों की सूची बनाई जाने लगी. 1944 में बोर्ड के लिए अधिसूचना जारी हुई. वो मस्जिद शिया वक्फ की संपत्ति थी, लेकिन हमारा मुतवल्ली शिया था. गलती से इमाम सुन्नी रख दिया गया. हम इसी वजह से मुकदमा हारे.
रिकॉर्ड में दर्ज है कि 1949 में मुतवल्ली जकी शिया था. कोर्ट ने कहा कि आप हिन्दू पक्ष का विरोध नहीं कर रहे हैं, बस इतना ही काफी है. सीजीआई ने कहा कि हाईकोर्ट में आपकी अपील 1946 में खारिज हुई और आप 2017 में SLP लेकर सुप्रीम कोर्ट आए. इतनी देरी क्यों? जिस पर शिया वक्फ बोर्ड की ओर से वकील ने कहा कि हमारे दस्तावेज सुन्नी पक्षकारों ने जब्त किए हुए थे.

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निर्मोही अखाड़ा ने कोर्ट में क्या दलीलें रखी थी
निर्मोही अखाड़े की तरफ से वकील सुशील जैन ने अब तक अपनी बातें रखी हैं
निर्मोही अखाड़ा पूजा प्रबंधन और अधिकार को लेकर लड़ रहा है
सुनवाई के दूसरे ही दिन 7 अगस्त को निर्मोही अखाड़े ने कहा कि उसके पास रामजन्मभूमि के स्वामित्व का कोई सबूत नहीं है
निर्मोही अखाड़ा ने कहा कि साल 1982 में डकैती हुई थी, जिसमें हमने सारे रिकॉर्ड खो दिए
1934 से किसी भी मुस्लिम को विवादित ढांचे में प्रवेश नहीं मिला है
1855 से पहले यहां कभी नहीं पढ़ी गई नमाज
ये मंदिर ही था जिसकी देखरेख निर्मोही अखाड़ा करता था
पूरा का पूरा ढांचा जमीन से घिरा हुआ है और हिंदू देवता वहां थे
विवादित जमीन पर मालिकाना हक़ का दावा नहीं कर रहे
सिर्फ पूजा-प्रबन्धन और कब्जे का अधिकार मांग रहे हैं
मेरे सेवादार के अधिकार को छीन कर मुझसे कब्जा लिया गया
रामलला की ओर से जो निकट सहयोगी देवकी नंदन अग्रवाल बनाए गए है, मैं उन्हें नहीं मानता. वो तो पुजारी भी नहीं है.
मैं रामलला और रामजन्मस्थान की याचिका के खिलाफ नहीं हूं
सिर्फ निर्मोही अखाड़े का नाम गैजेटियर और ऐतिहासिक दस्तावेजो में अंकित हैं
सिर्फ मैं ही हिंदू पक्ष का प्रतिनिधित्व कर सकता हूं
हम देव स्थान का मैनेजमेंट करते हैं और पूजा का अधिकार चाहते हैं
निर्मोही अखाड़ा जन्मस्थान का मैनेजमेंट देखता है
हमारा दावा आंतरिक अहाते को लेकर है
बाहर तो हमारा अधिकार और कब्ज़ा पहले से ही था
जल्दी जल्दी सुनवाई से नाराज होकर कहा अयोध्या मामले की सुनवाई अब 20-20 की तरह हो गई है
खफा SC ने पूछा- क्या पहले टेस्ट था?
हम तो सदियों से रामलला के सेवायत रहे हैं
हमारे सेवा के अधिकार को किसी ने चुनौती नहीं दी है
हमें मन्दिर से बेदखलकर बाहर किया गया. पर हमारी सेवा चलती रही
अब कोर्ट हमारी बजाय बाकी पक्षकारों को कब्जा साबित करने को कहे

First Published: Nov 09, 2019 12:42:15 PM
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