अयोध्या केस में आज सुप्रीम कोर्ट में सौंपी जाएगी मध्यस्थता रिपोर्ट, जानें शुरू से लेकर अबतक का पूरा टाइम लाइन

NITU KUMARI  |   Updated On : July 31, 2019 06:26:50 AM
सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट (Photo Credit : )

नई दिल्ली:  

करीब 500 साल पुराना मामले में...करीब 150 साल से जारी तकरार पर... करीब दो दशक से चली आ रही कानूनी आजमाइश अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचती दिख रही है. हम बात कर रहे हैं अयोध्या के रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद की, जिसे सुलझाने के लिए हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सुनवाई हुई, पर अब तक नतीजा नहीं निकला. रामजन्म भूमि से जुड़े अयोध्या विवाद मामले में समझौते से समाधान की उम्मीद अब करीब करीब खत्म हो गयी है. अगले कुछ घंटों में ये साफ हो जाएगा कि अयोध्या मामले पर मध्यस्थता से नतीजा निकलेगा या अदालती इंसाफ से.

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने बातचीत से समाधान के लिए गठित मध्यस्थता पैनल से 31 जुलाई तक इस मामले में हुई प्रगति की अंतिम रिपोर्ट मांगी है. रिपोर्ट देखने के बाद मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ये तय करेगी कि इस मामले का निपटारा कैसे किया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए 2 अगस्त की तारीख मुकर्रर की है. उस दिन ओपन कोर्ट में सुनवाई होगी जिसके बाद अदालत ये फैसला लेगी कि इस मामले का हल मध्यस्थता से निकाला जाएगा या रोजाना की सुनवाई से. यानी जस्टिस कलीफुल्ला की अध्यक्षता वाली मध्यस्थता कमेटी के पास अब सिर्फ 31 जुलाई तक का वक्त बचा है. उसके बाद गेंद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के पाले में होगी.

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मध्यस्थता कमेटी के इम्तिहान की घड़ी

अयोध्या मामले का हल ढूंढने के लिए चार महीने पहले जिस मध्यस्थता कमेटी का गठन किया गया था उसका अंतिम इम्तिहान करीब आ चुका है. 31 जुलाई को जब इस कमेटी के अध्यक्ष कलीफुल्ला सुप्रीम कोर्ट में अपनी फाइनल रिपोर्ट दाखिल करेंगे तो सिर्फ अदालत ही नहीं पूरा देश ये जानना चाहेगा कि आखिर 145 दिन की जद्दोजहद का नतीजा क्या निकला. गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यों वाली संविधान पीठ ने मध्यस्थता कमेटी की प्रगति रिपोर्ट देखने के बाद 31 जुलाई तक अंतिम रिपोर्ट देने को कहा था. इस मामले में 2 अगस्त को ओपन कोर्ट में सुनवाई होगी और फिर ये तय होगा ये मुद्दा मध्यस्थता से सुलझेगा या अदालती सुनवाई से.

मंदिर पर मध्यस्थता की मियाद पूरी ?

बता दें कि जस्टिस एफ एम इब्राहिम कलीफुल्ला सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज हैं. सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने कलीफुल्ला को मध्यस्थता कमेटी का अध्यक्ष बनाया था. तीन सदस्यों वाली इस कमेटी में आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पंचू भी शामिल हैं. इसी साल मार्च में बनाई गई इस कमेटी को रिपोर्ट देने के लिए पहले 8 हफ्तों का वक्त दिया गया था. फिर कमेटी को 13 हफ्तों का अतिरिक्त समय दिया गया. अब सवाल है कि सालों पुराने जिस मुद्दे को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने खुद मध्यस्थता पैनल का गठन किया और फिर फाइनल रिपोर्ट के लिए 15 अगस्त तक की तारीख मुकर्रर की थी. उसकी मियाद घटाकर दो हफ्ते कम क्यों कर दी. क्या सुप्रीम कोर्ट को भी लग रहा है कि ये मामला मध्यस्थता या आपसी बातचीत से नहीं सुलझने वाला?

अयोध्या पर बेनतीजा रही मध्यस्थता ?

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट का ये नया निर्देश तब आया जब अयोध्या मामले के एक पक्षकार गोपाल सिंह विशारद ने एक याचिका दायर कर ये कहा कि मध्यस्थता कमेटी के नाम पर विवाद सुलझने के आसार काफी कम हैं. इससे सिर्फ समय बर्बाद हो रहा है इसलिए कमेटी खत्म कर सुप्रीम कोर्ट स्वयं इस मामले की सुनवाई करे. उनकी दलील थी कि अयोध्या मामले का का विवाद 69 सालों से अटका पड़ा है. सुप्रीम कोर्ट की बनाई मध्यस्थता कमेटी ने विवाद को सुलझाने के लिए दोनों पक्षों के 11 संयुक्त सत्र बुलाए पर बातचीत का कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला. गोपाल सिंह विशारद के पिता राजेंद्र सिंह ने ही अयोध्या मामले पर 1950 में पहला मुकदमा दाखिल किया था. जिसमें बिना रोक-टोक रामलला की पूजा का हक मांगा गया था. उसके बाद फैजाबाद जिला अदालत से होते हुए ये मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट तक पहुंचा था. अब ताजा हालात में ये माना जा रहा है कि अगर मध्यस्थता कमेटी की रिपोर्ट से कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला तो 2 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट खुद इस मामले की रोजाना सुनवाई करने का फैसला ले सकता है.

2 अगस्त को क्या करेगा सुप्रीम कोर्ट ?

दो अगस्त को जब सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ सुनवाई के लिए बैठेगी तो मध्यस्थता कमेटी की रिपोर्ट के साथ ये भी देखेगी कि इस मामले से जुड़े तमाम दस्तावेजों के अनुवाद का काम पूरा हो गया है या नहीं. साथ ही ये भी देखेगी कि इस अनुवाद को लेकर किसी पक्षकार को कोई आपत्ति तो नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने जब ज्यादातर हिंदू पक्षकारों के विरोध के बावजूद ये मामला मध्यस्थता पैनल के पास भेजा था तो उसकी एक बड़ी वजह मामले से जुड़े दस्तावेजों का अनुवाद भी था. इन दस्तावेजों का अनुवाद उत्तर प्रदेश सरकार ने करवाया है. अगर अनुवाद पर किसी भी पक्षकार की असहमति हुई तो सुनवाई में और देरी हो सकती है. नियम के मुताबिक दस्तावेजों का अंग्रेजी भाषा में होना अनिवार्य है.

हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट लाए गए दस्तावेज

अयोध्या मामले से जुड़े तमाम दस्तावेज इलाहाबाद हाईकोर्ट से 15 ट्रंक में भरकर सुप्रीम कोर्ट लाए गए हैं. इनमें अंग्रेजी के अलावा हिंदी, अरबी, फ़ारसी, संस्कृत, उर्दू और गुरुमुखी भाषा में लिखे कागजात भी मौजूद हैं. बाबर के जमाने से लेकर रामायण काल तक के इन दस्तावेजों के आधार पर ही सुप्रीम कोर्ट आगे की सुनवाई करेगी. इसलिए ये जरूरी है कि इन दस्तावेजों का अनुवाद सभी पक्षों को मंजूर हो.

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मध्यस्थता कमेटी बनाने से क्या मिला ?

अयोध्या मामले से जुड़े हिंदू संगठन पहले से ही कहते रहे हैं कि इस विवाद का निपटारा मध्यस्थता से मुमकिन नहीं है. आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों की मांग थी कि केंद्र सरकार कानून बनाकर या अध्यादेश लाकर अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ करे. लेकिन आठ सालों से ये मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित होने के कारण मोदी सरकार ने पिछले कार्यकाल में ये तय किया कि अदालत ही इस समस्या का समाधान करे तो बेहतर होगा. इसके अलावा चुनावी मौसम होने की वजह से भी सरकार को कोई कदम उठाने पर कड़े सियासी विरोध का सामना करना पड़ सकता था. लिहाजा प्रधानमंत्री मोदी ने तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए ये कह दिया था कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला ही अंतिम और मान्य होगा. तब सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले की जल्द और रोजाना सुनवाई से इनकार करते हुए लोकसभा चुनाव से पहले ये मुद्दा मध्यस्थता पैनल के हवाले कर दिया था. अब सवाल ये उठ रहे हैं कि अगर ये मुद्दा सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से ही सुलझाया जाना था तो इसे मध्यस्थता पैनल को सौंपकर इतना लंबा क्यों खींचा गया?

राम के नाम पर बार बार कोहराम

यूं तो पिछले तीन दशकों में कोई ऐसा साल नहीं गुजरा जब अयोध्या में राम मंदिर को लेकर हिंदू संगठनों और साधु संतों की तरफ से कोई रैली, प्रदर्शन या धर्मसभा न की गई हो. पर हर बार चुनावी मौसम में इसकी गूंज ज्यादा सुनाई दी. इस बार के आम चुनाव से पहले भी राम के नाम पर जमकर कोहराम हुआ. अयोध्या से लेकर काशी तक और प्रयागराज से दिल्ली तक आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों के आह्वान पर लाखों साधु संतों ने राम मंदिर का नारा बुलंद किया. मकसद था सरकार और सुप्रीम कोर्ट पर मामले के जल्द निपटारे के लिए दबाव बनाना.

सुप्रीम कोर्ट के रुख से गहराया विवाद

अयोध्या का विवाद तब और गहराया जब सुप्रीम कोर्ट ने ये कह दिया कि राम मंदिर के अलावा भी कई ऐसे अहम मुद्दे हैं जिनका पहले निपटारा किया जाना जरूरी है. पर संघ और शिवसेना जैसे सहयोगियों के बढ़ते दबाव के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी को ये कहना पड़ा कि जब तक मामला सुप्रीम कोर्ट में है तब तक फैसले का इंतजार करना पड़ेगा.

एक साल में कैसा रहा सुप्रीम कोर्ट का रुख ?

पिछले एक साल में अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट का रुख कैसा रहा उसे यूं समझिए कि 13 जुलाई, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन पर 20 जुलाई से लगातार सुनवाई की बात कही थी. 20 जुलाई, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रखा. 27 सितंबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 29 अक्टूबर से अयोध्या विवाद पर सुनवाई करेगा. 29 अक्टूबर, 2018 को कोर्ट ने 4 जनवरी 2019 तक के लिए मामले की सुनवाई टाल दी. 4 जनवरी, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 10 जनवरी 2019 से सुनवाई के लिए नई बेंच का गठन किया जाएगा. 10 जनवरी, 2019 को जस्टिस ललित के बेंच से अलग होने के बाद सुनवाई की नई तारीख 29 जनवरी की मुकर्रर की. 26 फरवरी, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता कमेटी के जरिये अयोध्या विवाद को सुलझाने की कोशिश की जाएगी. 8 मार्च, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने रिटायर्ड जस्टिस कलीफुल्ला की अगुवाई में 3 सदस्यों वाली मध्यस्थता कमेटी बना दी. मतलब जुलाई 2018 से अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में शुरू हुआ सुनवाई का सिलसिला अब एक बार फिर घूमकर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के लिए हाजिर हो गया है. तो फिर सवाल है कि मध्यस्थता कमेटी बनाने से क्या मिला?

मध्यस्थता कमेटी से पक्षकारों को क्या उम्मीद ?

अयोध्या विवाद से जुड़े हिंदू पक्षकार तो शुरू से ही इस मामले में मध्यस्थता कमेटी बनाए के खिलाफ थे. पर सुप्रीम कोर्ट ने बातचीत के जरिये इस मुद्दे को सुलझाने की आखिरी कोशिश की तो चुनावी मौसम की नजाकत को देखते हुए सरकार और हिंदू संगठन दोनों के लिए खामोशी मजबूरी बन गई. रही बात मुस्लिम पक्षकारों की तो मध्यस्थता कमेटी के साथ हुई कई दौर की बातचीत के बाद भी वो किसी नतीजे तक नहीं पहुंच पाए. उधर आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठन पहले से ही मांग करते रहे हैं कि सरकार को अध्यादेश लाकर या कानून बनाकर अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ करना चाहिए. ऐसे में सवाल ये उठता है कि अगर मध्यस्थता कमेटी की रिपोर्ट से समाधान नहीं निकला तो क्या ये मांग दोबारा उठेगी?

सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट पर

मामला सुप्रीम कोर्ट में है इसलिए कोई भी पक्ष फिलहाल इस बारे में खुलकर कुछ कहने से बच रहा है. सबको इंतजार है 2 अगस्त का जब सुप्रीम कोर्ट में मध्यस्थता कमेटी की रिपोर्ट पढ़ी जाएगी. उसके बाद अदालत के रुख से ही तय होगा कि दोनों पक्षों का रुख क्या होगा.

अदालती दांवपेंच में उलझा अयोध्या विवाद

रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर पहला बड़ा अदालती फैसला साल 2010 में आया था. तब इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटने का निर्देश दिया था. उसमें से एक हिस्सा रामलला विराजमान को, दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को और तीसरा हिस्सा सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को देने की बात कही गई थी. पर वो फैसला न तो हिंदू संगठनों ने मंज़ूर किया और न ही मुस्लिम पक्षकारों ने. हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दोनों पक्षों ने देश की सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाया. उसके बाद पिछले 8 सालों से सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे की बारीकियों और पेंचीदगियों को समझने की कोशिश कर रहा है. इस बीच कई बार इसके जल्द निपटारे की मांग उठी पर फैसला टलता रहा. अब आपसी बातचीत से अयोध्या विवाद का सर्वमान्य हल निकालने की अंतिम कोशिश भी नाकाम होती दिख रही है. ऐसे में कयास ये लग रहे हैं कि कानून की कलम से निकलने वाला नतीजा क्या होगा और वो हाई कोर्ट के फैसले से कितना अलग होगा.

क्या है अयोध्या मामले का विवाद ?

अयोध्या में मंदिर-मस्जिद की लड़ाई को यूं समझिए कि आज जहां विवादित जमीन है, वहां करीब तीन दशक पहले बाबरी मस्जिद थी. और जिस जगह वो मस्जिद बनी थी वहां कोई पांच सौ साल पहले राम मंदिर होने का दावा किया जाता है. इन पांच सदियों में कब कब क्या क्या हुआ उसकी कहानी बहुत लंबी है. इसलिए उस पर जाने के बजाए विवादित जमीन के मौजूदा भूगोल को समझना जरूरी है.

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2.77 एकड़ जमीन का विवाद

असली विवाद 2.77 एकड़ का वो इलाका जिसके मालिकाना हक की कानूनी लड़ाई चल रही है. ये खाका 6 दिसंबर 1992 से पहले का है. विवादित ढांचे के बीच वाले गुंबद में है गर्भगृह यानी रामलला की जगह. गर्भगृह के सामने राम चबूतरा की जगह है. उसके बाद भंडारा है, फिर सीता रसोई. विवादित ढांचे की दूसरी तरफ है वक्फ बोर्ड की जमीन. 1992 में विवादित ढांचा गिराये जाने के बाद केंद्र सरकार ने ये पूरा इलाका अपने कब्जे में ले लिया और कुल 67.7 एकड़ से ज्यादा जमीन का अधिग्रहण कर लिया.

67 एकड़ जमीन पर किसका दावा ?

विवादित जगह समेत कुल 67.7 एकड़ वो जमीन है जिस पर केंद्र सरकार का नियंत्रण है. उसमें से 2.77 एकड़ का वो विवादित जमीन है जिसके लिए अलग-अलग दावेदारी है. कुल अधिगृहीत जमीन के करीब दो तिहाई यानी 43 एकड़ जमीन पर रामजन्मभूमि ट्रस्ट का मालिकाना दावा है. इसके अलावा वो अधिसूचित जमीन है जो कानून लड़ाई जीतने वाले पक्ष को दी जाएगी.

विवादित ढांचे वाली जमीन 0.323 एकड़

जिस जमीन पर विवादित ढांचा था वो करीब 0.323 एकड़ यानी तिहाई एकड़ से भी कम है. पर उसकी वजह से करीब 67 एकड़ से भी ज्यादा जमीन पर पेंच फंसा हुआ है. यही वजह है कि इस साल जनवरी में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर गैर विवादित स्थल यानी जिस जमीन पर विवाद नहीं है उस हिस्से को रामजन्मभूमि न्यास को सौंपने की मांग की थी, ताकि वहां निर्माण का काम शुरू हो सके पर अदालत ने यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया.

विवादित जमीन के अधिग्रहण की कहानी

2.77 एकड़ की जिस जमीन को लेकर पूरा विवाद है, उसका अधिग्रहण अक्टूबर 1991 में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार ने किया था. फिर विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद जनवरी 1993 में तत्कालीन नरसिंह राव सरकार ने विवादित स्थल समेत आस-पास की 67.7 एकड़ जमीन को अपने नियंत्रण में ले लिया. उसमें विवादित ढांचे के साथ रामकथा पार्क और शिलान्यास स्थल भी शामिल है. इस मामले में सितंबर 1993 में सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की बेंच ने केंद्र सरकार के जमीन अधिग्रहण के फैसले को सही ठहराया.

गैर विवादित जमीन पर किसकी दावेदारी ?

1994 में इस्माइल फ़ारूक़ी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि विवादित ज़मीन पर कोर्ट का फैसला आने के बाद गैर विवादित ज़मीन को उनके मूल मालिको को वापस लौटाने पर विचार किया जा सकता है. पर उसके लिए जमीन के मालिकों को कोर्ट में अर्जी दायर करने को अनिवार्य बताया. उसके बावजूद राम जन्मभूमि न्यास ने सरकार से ग़ैरविवादित ज़मीन सौंपने की मांग की जिसे 1996 में केंद्र सरकार ने ठुकरा दिया. तब न्यास ने हाई कोर्ट में अपील की जो 1997 में खारिज हो गई. अदालती आदेश के बावजूद साल 2002 में जब गैर विवादित जमीन पर फिर से पूजा शुरू की गई तो मामला फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और कोर्ट ने साफ लहजे में कहा कि फैसला आने तक किसी भी सूरत में 67 एकड़ जमीन पर यथास्थिति में बदलाव नहीं होना चाहिए.

इलाहाबाद हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

इस पूरे मामले में बड़ा मोड़ तब आया जब इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने अपना फैसला सुनाया. सितंबर 2010 में हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 2.77 एकड़ की विवादित जमीन को 3 बराबर हिस्सों में बांटने को कहा. इसमें रामलला वाली जमीन हिंदू महासभा को दी गई. जमीन का दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को सौंपा गया और तीसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया गया. हाई कोर्ट का फैसला न तो हिंदू पक्षकारों का रास आया और न ही मुस्लिम पक्षकारों को. इसलिए दोनों पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली. अब सवाल है कि हाई कोर्ट के फैसले से इतर सुप्रीम कोर्ट ऐसा क्या निर्णय दे जो दोनों पक्षों को मंजूर हो.

सुप्रीम कोर्ट के सामने दो विकल्प

2 अगस्त को जब मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई में 5 सदस्यीय संविधान पीठ बैठेगी तो ये तय हो जाएगा कि देश के सबसे संवेदनशील मसले का कानूनी निपटारा कितने समय में हो पाएगा. अयोध्या मामले पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के सामने दो विकल्प होंगे. पहला विकल्प ये कि मध्यस्थता कमेटी को ही बातचीत से हल निकालने का मौका दिया जाए. दूसरा विकल्प ये है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर खुद सुनवाई करे. संविधान पीठ ये संकेत पहले ही दे चुकी है कि अगर मध्यस्थता से बात नहीं बनती है तो इस मामले की दिन प्रतिदिन यानी रोजाना सुनवाई होगी. सुप्रीम कोर्ट में किसी मामले में दिन प्रतिदिन सुनवाई का मतलब ये है कि हफ्ते में 3 दिन सुनवाई होगी. ये 3 दिन होंगे मंगलवार, बुधवार और गुरुवार. सोमवार और शुक्रवार का दिन विविध मामलों की सुनवाई के लिए तय है जबकि शनिवार और रविवार को सुप्रीम कोर्ट में अवकाश रहता है.

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से जल्द समाधान

अयोध्या विवाद को सुलझाने में पहले ही काफी देरी हो चुकी है. इसलिए ये उम्मीद जताई जा रही है कि नियमित सुनवाई से इसका जल्द नतीजा सामने आ पाएगा. 5 जजों की जो संविधान पीठ अयोध्या मामले की सुनवाई करेगी उसमें मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई भी शामिल हैं. उनके लिए भी इस मुद्दे का जल्द समाधान इसलिए जरूरी है क्योंकि उनकी रिटायरमेंट करीब है. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई इसी साल 17 नवंबर को रिटायर होने वाले हैं. रिटायरमेंट से पहले सुनवाई पूरी कर फैसला देना जरूरी है. अगर फैसला नहीं आया तो मामले की दोबारा सुनवाई करनी होगी.

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रिटायरमेंट से पहले फैसले का दबाव

प्रचलित परंपरा और नियम के मुताबिक अगर सुनवाई पूरी होने या फैसला सुनाने से पहले कोई जज रिटायर होता है तो नई बेंच बनाकर पूरे मामले की फिर से सुनवाई करनी पड़ती है. इसलिए चीफ जस्टिस हर हाल में 17 नवंबर से पहले अयोध्या मुद्दे को अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश करेंगे. मोटे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के सामने अयोध्या विवाद के निपटारे के लिए करीब साढ़े तीन महीने का वक्त है. ऐसे में नियमित सुनवाई के तहत अदालत के पास किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए बमुश्किल 40 से 45 दिन मिलेंगे. हालांकि चीफ जस्टिस रंजन गोगोई तेजी से मामलों के निपटारे के लिए मशहूर हैं. इस लिहाज से अयोध्या विवाद के हल के लिए इतना समय पर्याप्त माना जा रहा है.

चीफ जस्टिस बनाएंगे नया इतिहास ?

सुप्रीम कोर्ट के इतिहास को देखें तो अब तक देश के हर मुख्य न्यायाधीश ने अपने कार्यकाल में कोई न कोई बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाकर ही विदाई ली है. याद कीजिए तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस टीएच ठाकुर को, जिन्होंने अपने एक फैसले से भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे बीसीसीआई को साफ सुथरा कर दिया था. उसके बाद मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठे जस्टिस खेहर भी ट्रिपल तलाक़ को रद्द करने और निजता के अधिकार को मौलिक का दर्जा दिलाने वाला ऐतिहासिक फैसला लिख कर गए थे. जस्टिस दीपक मिश्रा ने भी जाते जाते महिलाओं के लिए सबरीमाला मंदिर में प्रवेश का रास्ता साफ कर दिया था. ऐसे में मुख्य न्यायाधीश के तौर पर जस्टिस रंजन गोगोई भी चाहेंगे कि देश उनको अयोध्या विवाद में लिखे गए फैसले के लिए याद करे.

First Published: Jul 30, 2019 11:53:17 PM
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