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लोकसभा चुनाव पूर्णिया: क्या मां की हारी हुई सीट वापस ला पाएंगे महागठबंधन के उम्मीदवार उदय सिंह या चलेगा कुशवाहा का तीर

Kunal Kaushal  |   Updated On : April 17, 2019 07:07 PM

नई दिल्ली:  

सीमांचल के सबसे महत्वपूर्ण शहरों में से एक और कमिश्नरी का दर्जा रखने वाले पूर्णिया में इस बार लोकसभा चुनाव के समीकरण पूरी तरह बदले हुए हैं. लोकसभा चुनाव 2014 में दुश्मन रहे (संतोष कुशवाहा, जेडीयू) अब दोस्त बन चुके हैं जबकि मोदी लहर में कमल के फूल पर बैठकर ताल ठोक रहे दोस्त (उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह) अब दुश्मन बन गए हैं. लोकसभा के दूसरे चरण में मुख्य तौर पर सीमांचल के ही पांच जिलों, पूर्णिया, अररिया, किशनगंज, कटिहार और भागलपुर में चुनाव हो रहे हैं. यहां पर 18 अप्रैल यानि गुरुवार को पूर्णिीया के करीब 18 लाख मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर अपना सांसद चुनेंगे.

संतोष कुशवाहा का सियासी गणित

बात अगर एनडीए उम्मीदवार संतोष कुशवाहा की करें तो ग्राउंड जीरो पर शहर से लेकर गांवों तक उनके खिलाफ रोष हैं लेकिन चूंकि इस बार वो एनडीए के उम्मीदवार हैं और लोग वहां अभी भी मोदी को बतौर प्रधानमंत्री बेहद पसंद कर रहे हैं तो उनके लिए राह थोड़ी आसान हो सकती है. हालांकि मेरी ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि लोग बीते पांच सालों में उनके काम-काज से कुछ खास खुश नजर नहीं आ रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ बीजेपी के ज्यादातर  कार्यकर्ता भी कुशवाहा को उम्मीदवार के तौर पर थोपे जाने से पार्टी हाईकमान से नाराज चल रहे हैं.

ऐसे में इसका खामियाजा कुशवाहा को उठाना पड़ सकता है क्योंकि उन्हें भीतरघात का सामने करना पड़ेगा. ग्राउंड जीरों पर जाकर मैंने खुद महसूस किया कि बीजेपी के ज्यादातर समर्थक और कार्यकर्ता कुशवाहा से खुश नहीं है और अप्रत्यक्ष तौर पर महागठबंधन के प्रत्याशी उदय सिंह जो पहले बीजेपी के नेता हुए करते थे उनके समर्थन में है और लोगों से उन्हें ही वोट देने की अपील कर रह रहे हैं. चुनाव प्रचार के दौरान कुशवाहा का बीते लोकसभा चुनाव का वो भाषण भी खूब वायरल हुआ जिसमें वो कहते हुए दिख रहे हैं कि यह चुनाव अगड़ा बनाम पिछड़ा का है. कुशवाहा का यह दांव बीते चुनाव में काम कर गया था और वो सीधे एमएलसी से सांसद बन गए थे.

संतोष कुशवाहा ने चुनाव से ठीक पहले कहा है कि उन्हें पिछले पांच सालों में इस पिछड़े क्षेत्र में किए विकास कार्यों पर पूरा भरोसा है. उन्होंने कहा कि जनता मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनाने के लिये पूरी तरह से मन बना चुकी है और उन्हें जनता का पूरा आशीर्वाद मिलेगा.  कुशवाहा ने भी ऑडियो संदेश जारी कर पूर्णियां के 18 लाख मतदाताओं से पीएम मोदी और नीतीश कुमार के हाथ को मजबूत करने की अपील की है.

उदय सिंह का सियासी समीकरण

अब बात अगर पप्पू सिंह उर्फ उदय सिंह की करें तो यह 10 साल  (2004-2009, 2009-14) तक बीजेपी के पूर्णिया से सांसद रहे हैं और बीजेपी से टिकट नहीं मिलने पर अब कांग्रेस पार्टी के बैनर तले चुनावी मैदान में उतरे हैं. हालांकि पहले भी यह अपनी मां माधुरी सिंह की तरह ही कांग्रेस में रह चुके थे लेकिन साल 2004 में चुनाव से पहले बीजेपी का दाम थाम लिया था. पप्पू सिंह की छवि पूर्णिया में बेहद अच्छी मानी जाती है और इन्हें लोग मृदुभाषी भी मानते हैं.

हालांकि सांसद रहने के दौरान इन पर भी ज्यादातर समय दिल्ली में रहकर अपना बिजनेस संभालने के ही आरोप लगते थे और शहर के लोग अपने जनप्रतिनिधि के अपने पास नहीं होने से आक्रोशित नजर आ रहे थे. इस बार चूंकि वो कांग्रेस को मिली पूर्णिया सीट के तहत महागठबंधन (आरजेडी, कांग्रेस, आरएलएसपी और हम) के उम्मीदवार हैं ऐसे में उनके जीतने की संभावना कुशवाहा के मुकाबले थोड़ी ज्यादा है. ऐसा इसलिए है क्योंकि एक तो कांग्रेस को सीमांचल में रहने वाले मुस्लिमों का भी वोट मिलता है जबकि बीजेपी की कट्टर छवि की वजह से कुशवाहा को इसका नुकसान होगा. वहीं मुस्लिम और यादव आरजेडी के कोर वोटर्स माने जाते हैं ऐसे में बड़ी संख्या में इनका वोट भी उदय सिंह की तरफ शिफ्ट होगा.

उदय सिंह के लिए अच्छी बात यह भी है कि बीजेपी के ज्यादातर स्थानीय कार्यकर्ता भी उदय सिंह को ही शहर की पहली पसंद मान रहे हैं और अप्रत्यक्ष तौर पर उनके लिए काम कर रहे हैं. पीएम मोदी की लोकप्रियता को उदय सिंह अच्छे से समझते हैं इसलिए वो हर चुनावी रैली और अभियान में इस बात का जिक्र करना नहीं भूलते कि पूर्णिया में मेरा मुकाबला संतोष कुशवाहा से है न कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. उन्होंने अपने ऑडियो संदेश में भी कहा था कि वो कुशवाहा के खिलाफ लड़ रहे हैं न कि पीएम मोदी के खिलाफ. ऐसे में यह भी संभावना जताई जा सकती है कि अगर उदय सिंह जीत गए और चुनाव के बाद जरूरत पड़ी तो उदय सिंह एक बार फिर कमल का फूल उठा लेंगे.

2014 में कुशवाहा और उदय सिंह के बीच वोटों का अंतर

हालांकि बीते लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद उदय सिंह अपनी सीट नहीं बचा पाए थे. कुशवाहा को 2014 के चुनाव में 4,18, 826 जबकि उदय सिंह को 3,02, 157 वोट मिले थे और जीत का अंतर 1.16 लाख वोट का था. तीसरे स्थान पर रहे कांग्रेस उम्मीदवार को करीब उतने ही वोट मिले थे जो जीत का अंतर था.

39 सालों से पूर्णिया की जनता को पसंद नहीं है कांग्रेस का 'हाथ' क्या इस बार मिलेगा साथ

बीते 39 सालों से पूर्णिया में कांग्रेस के हाथ को वहां की जनता का साथ नहीं मिला है. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या इस बार उदय सिंह कांग्रेस के हाथ को वहां की जनता का साथ दिला पाएंगे. साल 1957 में इस सीट से कांग्रेस के टिकट पर फनी गोपाल सेन गुप्ता ने जीत दर्ज की थी. इसके बाद 1962 और 1967 के चुनाव में भी उन्हीं को ही जीत मिली थी. 1977 में जेपी लहर में यह सीट कांग्रेस के हाथों से निकल गई थी जिसे वो आज तक अपने पाले में नहीं कर पाई है. लखनलाल कपूर यहां के गैर कांग्रेसी सांसद बने. माधुरी सिंह की जीत के साथ 1980 में यह सीट फिर कांग्रेस की झोली में चली गयी. 1989 में जनता दल के टिकट पर मोहम्मद तस्लीमुद्दीन सांसद बने.  1996 में सपा की टिकट पर राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव यहां के सांसद बने. 1999 में पप्पू यादव निर्दलीय चुनाव लड़कर सांसद बने. 2004 और 2009 में बीजेपी से उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह सांसद बने.

First Published: Wednesday, April 17, 2019 06:29 PM

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