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2014 में लाल किले से पीएम मोदी ने किए चार बड़े ऐलान, 5 साल में कितने वादे पूरे और कितने अधूरे

Kunal Kaushal  |   Updated On : August 15, 2018 02:30 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)

नई दिल्ली:  

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पांचवीं बार ऐतिहासिक लाल किले के प्राचीर से देश को संबोधित करेंगे। साल 2014 के मई महीने में पीएम नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव में 30 सालों के बाद स्पष्ट बहुमत के साथ एनडीए सरकार बनाई थी और लाल किले के प्राचीर से खुद को प्रधानमंत्री नहीं बल्कि देश का प्रधानसेवक बताया था। उन्होंने लाल किले से अपने पहले भाषण में बेटियों की सुरक्षा से लेकर डिजिटल भारत और स्वच्छता अभियान से लेकर सांसद ग्राम योजना तक कई योजनाओं और सामाजिक सुधारों पर जोर दिया था। अब जब नरेंद्र मोदी 16 वीं लोकसभा के कार्यकाल के दौरान अंतिम बार लाल किले की प्राचीर से जनता से संवाद करेंगे तो एक तरफ जहां लोगों को उनसे अगले पांच सालों में देश की रूप रेखा पर उनके विचार जानने को मिलेंगे वहीं पांच साल पहले शुरू किए गए उनकी योजनाओं पर भी लोग चर्चा करेंगे। ऐसे में आज हम आपको बताते हैं  उन योजनाओं की स्थिति और क्रियान्वन के बारे में जिन्हें पीएम नें पांच साल पहले शुरू किया था।

स्वच्छता अभियान

पीएम मोदी ने लाल किले से अपने पहले भाषण में देश की जनता को संबोधित करते हुए कहा था, 'भाइयो-बहनों, हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं। क्या कभी हमारे मन को पीड़ा हुई कि आज भी हमारी माताओं और बहनों को खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है? डिग्निटी ऑफ विमेन, क्या यह हम सबका दायित्व नहीं है? बेचारी गांव की - मां बहनें अंधेरे का इंतजार करती हैं, जब तक अंधेरा नहीं होता है, वो शौच के लिए नहीं जा पाती हैं। उसके शरीर को कितनी पीड़ा होती होगी, कितनी बीमारियों की जड़ें उसमें से शुरू होती होंगी! क्या हमारी मां-बहनों की इज्ज़त के लिए हम कम-से-कम शौचालय का प्रबंध नहीं कर सकते हैं?

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भाईयों बहनों, किसी को लगेगा कि 15 अगस्त का इतना बड़ा महोत्सव बहुत बड़ी-बड़ी बातें करने का अवसर होता है। भाइयों- बहनों, बड़ी बातों का महत्व है, घोषणाओं का भी महत्व है, लेकिन कभी-कभी घोषणाएं जगाती हैं और जब घोषणाएं परिपूर्ण नहीं होती हैं, तब समाज निराशा की गर्त में डूब जाता है। इसलिए हम उन बातों के ही कहने के पक्षधर हैं, जिनको हम अपने देखते-देखते पूरा कर पाएं। भाइयों- बहनों मैं कहता हूं कि आपको लगता होगा कि क्या लाल किले से सफाई की बात करना, लालकिले से टॉयलेट की बात बताना, यह कैसा प्रधान मंत्री है? मैं नहीं जानता हूँ कि मेरी कैसी आलोचना होगी, इसे कैसे लिया जाएगा, लेकिन मैं मन से मानता हूं। मैं गरीब परिवार से आया हूं, मैंने गरीबी देखी है और गरीब को इज्‍़ज़त मिले, इसकी शुरूआत यहीं से होती है। इसलिए ‘स्वच्छ भारत’ काएक अभियान इसी 2 अक्टूबर से मुझे आरम्भ करना है और चार साल के भीतर-भीतर हम इस काम को आगे बढ़ाना चाहते हैं। एक काम तो मैं आज ही शुरू करना चाहता हूं। हिन्दुस्तान के सभी स्कूलों में टॉयलेट हो, बच्चियों के लिए अलग टॉयलेट हो, तभी तो हमारी बच्चियां स्कूल छोड़ कर भागेंगी नहीं।

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पांच साल बाद स्थिति

साल 2014 में दो अक्टूबर को पीएम मोदी के शुरू किए स्वच्छता अभियान ने देश में एक नया माहौल पैदा किया। सचिन तेंडुलकर से लेकर मुकेश अंबानी तक इस अभियान के तहत सड़कों पर झाड़ू लगाकर देश को स्वच्छता का संदेश देते दिखे। स्वच्छ भारत अभियान के तहत बीते पांच सालों में देश में करीब 6 लाख टॉयलेट्स सरकार की मदद से बनाए जा चुके हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मोदी सरकार के शासन काल में करीब 3 लाख गांव और 300 जिले खुले शौच से मुक्त हो चुके हैं जिलमें छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, चंडीगढ़ और बिहार जैसे राज्य मुख्य तौर पर शामिल हैं। बिहार ने तो इस मामले में सौ घंटे में 11 हजार 244 टॉयलेट बनाने का रिकॉर्ड अपने नाम दर्ज कर लिया था।

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जनधन योजना

साल 2014 में स्वतंत्रता दिवस के दिन पीएम मोदी ने लाल किले से गरीबों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने के लिए जनधन योजना लाने का लाने का ऐलान किया था। इसको लेकर पीएम मोदी ने कहा था, भाइयों-बहनों, इस आज़ादी के पर्व पर मैं एक योजना को आगे बढ़ाने का संकल्प करने के लिए आपके पास आया हूँ - ‘प्रधान मंत्री जनधन योजना’। इस ‘प्रधान मंत्री जनधन योजना’ के माध्यम से हम देश के गरीब से गरीब लोगों को बैंक अकाउंट की सुविधा से जोड़ना चाहते हैं। आज करोड़ों-करोड़ परिवार हैं, जिनके पास मोबाइल फोन तो हैं, लेकिन बैंक अकाउंट नहीं हैं। यह स्थिति हमें बदलनी है। देश के आर्थिक संसाधन गरीब के काम आएं, इसकी शुरुआत यहीं से होती है। यही तो है, जो खिड़की खोलता है। इसलिए‘प्रधान मंत्री जनधन योजना’ के तहत जो अकाउंट खुलेगा, उसको डेबिट कार्ड दिया जाएगा। उस डेबिट कार्ड के साथ हर गरीब परिवार को एक लाख रुपए का बीमा सुनिश्चित कर दिया जाएगा, ताकि अगर उसके जीवन में कोई संकट आया, तो उसके परिवारजनों को एक लाख रुपए का बीमा मिल सकता है।

पांच साल बाद स्थिति

28 अगस्त 2014 को शुरू हुए प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत अब तक गरीबों के कुल 31 करोड़ 60 लाख खाते खोले जा चुके हैं। इनमें से अधिकांश खाते सरकारी बैंकों में शून्य न्यूनतम राशि पर खोले गए हैं। इन खातों में अभी तक कुल 81203.59 करोड़ रु भी जमा हो चुके हैं जिसके लिए प्रधानमंत्री कई बार गरीब लोगों का आभार भी जता चुके हैं। जनधन योजना के तहत अब तक 18.61 करोड़ खाते सिर्फ शहरी इलाके में खोले गए हैं। इस योजना के तहत सबसे ज्यादा खातें बिहार (34222382), मध्य प्रदेश(274999980), आंध्र प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में खोले गए हैं। इस योजना के तहत ही गरीब परिवारों को 30 हजार रुपये तक का जीवन बीमा भी दिया जाता है। हालांकि ऐसे ज्यादातर खातों में वित्तीय लेन-देन काफी कम होता है लेकिन सरकारी योजना का सीधा लाभ पहुंचाने में जरूर मदद मिली है।

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डिजिटल भारत

पीएम मोदी ने लाल किले के प्राचीर से साल 2014 में देश को डिजिटल इंडिया बनाने पर जोर दिया था। उन्होंने कहा था, भाइयों-बहनों, पूरे विश्व में हमारे देश के नौजवानों ने भारत की पहचान को बदल दिया है। विश्व भारत को क्या जानता था? ज्यादा नहीं, अभी 25-30 साल पहले तक दुनिया के कई कोने ऐसे थे जो हिन्दुस्तान के लिए यही सोचते थे कि ये तो 'सपेरों का देश' है। ये सांप का खेल करने वाला देश है, काले जादू वाला देश है। भारत की सच्ची पहचान दुनिया तक पहुंची नहीं थी, लेकिन के हमारे 20-22-23 साल के नौजवान, जिन्होंने कम्प्यूटर पर अंगुलियां घुमाते-घुमाते दुनिया को चकित कर दिया।

विश्व में भारत की एक नई पहचान बनाने का रास्ता हमारे आई.टी. प्रोफेशन के नौजवानों ने कर दिया। अगर यह ताकत हमारे देश में है, तो क्या देश के लिए हम कुछ सोच सकते हैं? इसलिए हमारा सपना 'डिजिटल इंडिया' है। जब मैं 'डिजिटल इंडिया' कहता हूं, तब ये बड़े लोगों की बात नहीं है, यह गरीब के लिए है। अगरब्रॉडबेंड कनेक्टिविटी से हिन्दुस्तान के गांव जुड़ते हैं और गांव के आखिरी छोर के स्कूल में अगर हम लांगडिस्टेंस एजुकेशन दे सकते हैं, तो आप कल्पना कर सकते हैं कि हमारे उन गांवों के बच्चों को कितनी अच्छी शिक्षा मिलेगी। जहां डाक्टर नहीं पहुंच पाते, अगर हम टेलिमेडिसिन का नेटवर्क खड़ा करें, तो वहां पर बैठे हुए गरीब व्यक्ति को भी, किस प्रकार की दवाई की दिशा में जाना है, उसका स्पष्ट मार्गदर्शन मिल सकता है।

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आपको हैरानी होगी, ये टीवी, ये मोबाइल फोन, ये आईपैड, ये जो इलेक्ट्रॉनिक गुड्ज़ हम लाते हैं, देश के लिए पेट्रोलियम पदार्थों को लाना अनिवार्य है, डीज़ल और पेट्रोल लाते हैं, तेल लाते हैं। उसके बाद इम्पोर्ट में दूसरे नम्बर पर हमारी इलैक्ट्रॉनिक गुड्ज़ हैं। अगर हम `डिजिटल इंडिया` का सपना ले करके इलेक्ट्रॉनिक गुड्ज़ के मैन्युफैक्चर के लिए चल पड़ें और हम कम से कम स्वनिर्भर बन जाएं, तो देश की तिजोरी को कितना बड़ा लाभ हो सकता है और इसलिए हम इस `डिजिटल इंडिया` को ले करके जब आगे चलना चाहते हैं।

पांच साल बाद स्थिति

इन पांच सालों में कैशलेस लेन-देन में नोटबंदी के बाद बढ़ोतरी तो जरूर हुई है लेकिन यह कैश लेन-देन के मुकाबले अभी भी बहुत कम है। गांवों और छोटे शहरों में खराब इंटरनेट इसमें सबसे बड़े बाधक बनकर उभरे हैं। दूसरी तरफ शिक्षा की कमी भी देश को डिजिटल इंडिया की तरफ बढ़ने नहीं दे रहा है।

सरकार ने लोगों को तकनीक से जोड़ने के लिए करीब 6 करोड़ लोगों को शिक्षित करने के लिए बजट भी पास किया है लेकिन समस्या यह है कि ज्यादातर शिक्षक, पंचायत के निर्वाचित सदस्य, जनप्रतिनिधि, आशा कार्यकर्ताओं को ही तकनीक का ज्ञान नहीं है। केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक करीब सवा लाख गांवों को इंटरनेट से लैस किया गया है लेकिन एक सर्वे के मुताबिक सिर्फ  18 से 20 फीसदी गांवों में ही अभी इंटरनेट की अच्छी पहुंच है।

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विशेषज्ञों के मुताबिक अगर भारत को विश्व में सही मायनों में डिजिटल बनना है तो सबसे पहले देश में नेट कनेक्टिविटी और ब्रॉडबैंड को बढ़ाने की जरूरत है। विश्व में जहां 256 केबीपीएस की औसत इंटरनेट स्पीड है वहीं हमारे देश में अभी यह स्पीड महज 2 एमबीपीएस है जिससे डिजिटल ट्रांजैक्शन पर सीधा असर पड़ता है।

सांसद आदर्श ग्राम

15 अगस्त 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में गांवों की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए लिए सभी पार्टियों के सांसदों से एक-एक गांव को गोद लेकर उसे संवारने की मुहिम शुरू करने की अपील की थी।

उन्होंने कहा था, मैं आज सांसद के नाम पर एक योजना घोषित करता हूं - 'सांसद आदर्श ग्राम योजना'। हम कुछ पैरामीटर्स तय करेंगे और मैं सांसदों से आग्रह करता हूं कि वे अपने इलाके में तीन हजार से पांच हजार के बीच का कोई भी गांव पसंद कर लें और कुछ पैरामीटर्स तय हों - वहां के स्थल, काल, परिस्थिति के अनुसार, वहां की शिक्षा, वहां का स्वास्थ्य, वहां की सफाई, वहां के गांव का वह माहौल, गांव में ग्रीनरी, गांव का मेलजोल, कई पैरामीटर्स हम तय करेंगे और हर सांसद 2016 तक अपने इलाके में एक गांव को आदर्श गांव बनाए। इतना तो कर सकते हैं न भाई! करना चाहिए न! देश बनाना है तो गांव से शुरू करें। जब 2019 में हम चुनाव के लिए जाए, उसके पहले और दो गांवों को को और 2019 के बाद हर सांसद, 5 साल के कार्यकाल में कम से कम 5 आदर्श गांव अपने इलाके में बनाए।

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पांच साल बाद स्थिति

पीएम मोदी ने 11 अक्टूबर 2014 को इस अभियान की शुरूआत की थी और उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में जयापुर गांव से इसकी शुरुआत की थी। इसक योजना के तहत गांव में बुनियादी सुविधाओं जैसे खेती, पशुपालन, कुटीर उद्योग पर लक्ष्य केंद्रित करना था। 703 सांसदों ने अलग-अलग ग्राम पंचायत में गांवों का चयन किया था और 2017 के आंकड़ों के मुताबिक 19732 परियोजनाओं को पूरा कर लिया गया है। वहीं 7204 परियोजनाएं का चयन किया है। इस योजना में आईसीडीएस केंदआ मों 100 फीसदी पंजीयन, खुले में शौच से 100 फीसदी मुक्ति और संक्रमण से 100 फीसदी बचाव के प्रयास शामिल हैं।

First Published: Tuesday, August 14, 2018 11:26 PM

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