पाश की कविता मे सच्चाई की 'भीषण गंध' है जो फिज़ाओं में आज भी महकती है

लिखने मात्र से क्या होता है? कई लिखने वालों को इस सावाल का सामना करना पड़ता है सबका अपना-अपना जवाब होता है लेकिन लिखने मात्र से क्या हो सकता है इसका एकमात्र सटीक उदाहरण है अवतार सिंह संधू उर्फ पाश।

Sankalp Thakur  |   Updated On : September 09, 2018 09:53 AM
अवतार सिंह संधू उर्फ पाश (न्यूज़ स्टेट)

अवतार सिंह संधू उर्फ पाश (न्यूज़ स्टेट)

नई दिल्ली:  

लिखने मात्र से क्या होता है? कई लिखने वालों को इस सावाल का सामना करना पड़ता है सबका अपना-अपना जवाब होता है लेकिन लिखने मात्र से क्या हो सकता है इसका एकमात्र सटीक उदाहरण है अवतार सिंह संधू उर्फ पाश। हर दौर में दो तरह के लेखक पैदा होते हैं। एक जो व्यवस्थाओं की गोद में बैठकर तमगे लूटने वाले होते हैं तो दूसरे वह जो अपने साहित्य के जरिये समाजिक और राजनीतिक चेहरों पर वार करते है और उनके वार से घिनौने चेहरे वाले लोग इतना तिलमिला जाते हैं कि उस जन-कवि की गोली मारकर हत्या कर दी जाती हैं।

पाश उन कवियों की तरह नहीं थे जिनकी किताबों की सूचियां इस व्यवस्था की विडंबनाओं जितनी ही लंबी रही मगर पाश ने जितना भी लिखा वह सब आज भी हमें याद है। न तो वह अपनी कविताओं में ऐसे शब्दों का प्रयोग करते थे जिसे समझने में कोई दिक्कत हो या कोई ऐसी पंक्ति लिखते थे जिसमें कई अर्थ छिपे हो। उनकी लेखनी में सपाटबयानी थी और वे स्वीकार करते हैं

'मैं शायरी में क्या समझा जाता हूं
जैसे किसी उत्तेजित मुजरे में
कोई आवारा कुत्ता आ घुसे।'

पाश की काव्य-यात्रा 15 वर्ष की उम्र से ही आरम्भ हो गयी थी और 20 वर्ष के होते-होते जब उनका पहला संकलन ‘लौह कथा’छपा था। तब वे पंजाबी के एक प्रतिष्ठित कवि बन गए थे। पाश के कुल चार कविता संग्रह मूल पंजाबी में प्रकाशित है और ये हैं 'लौह कथा' (1970) 'उडडदे बांजा मगर'(1974), 'साडे समियां विच' (1978) और 'लड़ान्गे साथी'(1988) और हिंदी में अनूदित दो संग्रह 'बीच का रास्ता नहीं होता' और 'समय ओ भाई समय' भी प्रकाशित हुए हैं।

उन्होंने कभी सत्ता का शोषण स्वीकार नहीं किया और उसके खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया

'हाथ यदि हों तो
जोड़ने के लिए ही नहीं होते
न दुश्मन के सामने खड़े करने के लिए ही होते हैं
यह गर्दनें मरोडने के लिए भी होते हैं'

पाश को आप नाजिम हिकमत, पाब्लो नेरुदा और मुक्तिबोध के कैम्प का कवि कह सकते हैं। उनकी कविता में वह हमे कई चीजों के बारे में आगह करते हुए बताते हैं कि 'सबसे खतरनाक सपनों का मर जाना होता' है न कि और कोई अन्य चीज

मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती
गद्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती
सबसे खतरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का सब सहन कर जाना
घर से निकलकर काम पर
और काम से लौटकर घर जाना
सबसे खतरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना।

कोई कवि प्यार से अछूता नहीं रह सकता। पाश भी इससे अछूता नहीं रहे उन्होंने प्यार में बिताए खूबसूरत क्षणों के बारे में लिखा

तुम यह सभी कुछ भूल जाना मेरी दोस्त ,
सिवाय इसके
कि मुझे जीने की बहुत लोचा (लालसा) थी
कि मैं गले तक जिंदगी में डूबना चाहता था
मेरे भी हिस्से का जी लेना, मेरी दोस्त
मेरे हिस्से का भी जी लेना

पाश की कविताएं हमें सपने दिखाती हैं, लड़ने के लिए तैयार करती हैं और संघर्ष में साथी की तरह साथ होती हैं। जिंदा लाशो के देश मे पाश न सिर्फ सोचते और बोलते रहे बल्कि वो जिंदगी और इंसानियत के लिए लड़ते भी रहे। आज पाश हमारे बीच नहीं हैं लेकिन आज भी पाश की आवाज लोगो के जमीर को झकझोरती रही। पाश की आवाज मे विद्रोह है, प्रेम है, आंचलिकता है, विषाद है, दर्द है, गुस्सा है लेकिन कविता का मूल भाव मे आशा की किरण है।

पाश ने अपातकाल के समय गरीबी से जूझ रही जनता के लिए लिखा

जिन्होने देखे हैं
छतो पर सूखते सुनहरे भुट्टे
और नही देखे
मंडियो मे सूखते दाम
वे कभी न समझ पाएंगे
कि कैसे दुश्मनी है
दिल्ली की उस हुक्मरान औरत की
नंगे पांवो वाली गांव की उस सुंदर लड़की से।

पाश की कविता मे सच्चाई की भीषण गंध है, एक गंध जले हुए लोहे की तरह है जो आज भी फिज़ाओं में फैली हुई है। खालिस्तानी उग्रवादियों द्वारा 23 मार्च 1988 को पाश के शरीर को गोलियों से छलनी कर दिया गया लेकिन पाश मरने के बाद और खतरनाक हो गया। आज पाश हर जगह मौजूद है। विश्वविद्यालय के परिसर में, मेहनतकश कारखानों में, उम्मीद की फसल बोते किसानों में पाश मौजूद है।

First Published: Sunday, September 09, 2018 08:15 AM

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