72वां स्वतंत्रता दिवस: आजादी के ऐसे हीरो जो नहीं बन पाए सुर्खियां, पर साबित हुए मील के पत्थर

स्वाधीनता संग्राम के इतिहास से कुछ ऐसे ही नामों का जिक्र हमने किया है जिनके त्याग और बलिदान से आज हम सबको इस आजाद हवा में सांस लेने का मौका मिल रहा है।

  |   Updated On : August 14, 2018 11:04 PM
15 अगस्त 1947 रायसेना हिल्स (फाइल फोटो)

15 अगस्त 1947 रायसेना हिल्स (फाइल फोटो)

नई दिल्ली:  

'सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में हैं'-स्वाधीनता संग्राम के दौरान हमारे स्वतंत्रता सेनानियों की जबां पर ही नहीं बल्कि एक विचार की तरह यह भावना उनके रगों में दौड़ रही थी। इतिहास के पन्नों में कई कहानियां गुम हो जाती है या फिर उन्हें वो नाम नहीं मिल पाता जिसके वो हकदार होते हैं। स्वाधीनता संग्राम के इतिहास से कुछ ऐसे ही नामों का जिक्र हमने किया है जिनके त्याग और बलिदान से आज हम सबको इस आजाद हवा में सांस लेने का मौका मिल रहा है।

शहीद उधम सिंह
पंजाब के सुनम, पटियाला में 26 दिसम्बर 1899 जन्में शेर सिंह उर्फ उधम सिंह के माता-पिता 7 साल की ही उम्र में चल बसे थे। इसके बाद उधम सिंह ने अपना जीवन अपने बड़े भाई मुक्ता सिंह के साथ केंद्रीय खालसा अनाथालय में बिताया। इसी अनाथालय में ही शेर सिंह को नया नाम उधम सिंह मिला। 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन पंजाब के जलियांवाला बाग में हुए हत्याकांड के दिन उधम सिंह भी वहीं मौजूद थे।

इस घटना से आहत उधम सिंह ने जनरल डायर से बदला लेने की सोची और इसके लिए वो 30 के दशक में इंग्लैंड पहुंचे। हालांकि बीमारी के चलते जनरल डायर की मौत हो चुकी थी। उधम सिंह ने जलियांवाला बाग हत्याकांड के दौरान तात्कालीन वायसराय माइकल ओ डायर से बदला लेने की सोची।

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13 मार्च 1940 के दिन उघम सिंह लंदन के काक्सटन हॉल पहुंचे जहां ईस्ट इंडिया एसोसिएशन और रॉयल सेंट्रल एशियाई सोसाइटी की मीटिंग हो रही थी। इस मीटिंग में माइकल ओ डायर भी मौजूद था। उधम सिंह के हाथ में एक किताब थी और उसमें छिपी थी उनकी एक पिस्तौल। उन्होंने माइकल पर 5-6 गोलियां चलाकर उसका सीना छलनी कर दिया। 1 अप्रैल, 1940, को उधम सिंह को जर्नल डायर का हत्यारा माना गया और 31 जुलाई 1940 को लन्दन के पेंटोविले जेल में फांसी पर चढ़ा दिया गया।

राजकुमार शुक्ल
आजादी की लड़ाई के सबसे नायक महात्मा गांधी को कौन नहीं जानता और कौन नहीं जानता 1917 के उनके चंपारण के सत्याग्रह को, लेकिन बहुत कम लोग ही बात से वाकिफ होंगे कि महात्मा गांधी को चंपारण तक लेकर आने वाले कोई और नहीं बल्कि राजकुमार शुक्ल ही थे। यह वो दौर था जब चंपारण की जनता खासतौर पर किसान ब्रिटिश हुकुमत के जुल्मों का शिकार हो रही थी। जहां एक ओर किसानों को नील की खेती के लिए मजबूर किया जा रहा था वहीं दूसरी ओर बाजार में रासायनिक रंगों की बढ़ती मांग से नील की मांग कम होती जा रही थी। इतना ही नहीं ब्रिटिश सरकार आए दिन किसानों पर नया टैक्स लगा रही थी और टैक्स न देने पर उनकी खाल उधेड़ ली जाती थी।

किसानों पर हो रहे इस जुल्म को देखकर राजकुमार अंदर ही अंदर घुट रहे थे, अंत में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ जंग छेड़ने की ठानी। अपनी इसी जिद के साथ उन्होंने गांधी जी से मिलकर उन्हें चंपारण के किसानों की हालत के बारे में अवगत कराने की ठानी।

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राजकुमार शुक्ल ने दिसंबर 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में पहुंचकर अपने इलाके के किसानों की पीड़ा और अंग्रेजों की ओर से किए जा रहे शोषण की दास्तान के बारे में गांधी जी को सुनाया। हालांकि पहली मुलाकात में गांधी जी राजकुमार से खासा प्रभावित नहीं हुए लेकिन उनके दृढ़ निश्चय और जिद के आगे उन्हें भी झुकना पड़ा। परिणाम यह हुआ कि चार महीने बाद ही चंपारण के किसानों को जबरदस्ती नील की खेती करने से हमेशा के लिए मुक्ति मिल गई।

चंपारण किसान आंदोलन देश की आजादी के संघर्ष का मजबूत प्रतीक बन गया था और इस पूरे आंदोलन के पीछे एक पतला-दुबला किसान था, जिसकी जिद ने गांधी जी को चंपारण आने के लिए मजबूर कर दिया था। हालांकि राजकुमार शुक्ल को भारत के राजनीतिक इतिहास में वह जगह नहीं मिल सकी जो मिलनी चाहिए थी।

प्रीतिलता वादेदार
1911 में बंगाल में जन्मी प्रीतिलता वादेदार एक ऐसा नाम है जिन्होंने मात्र 21 साल की उम्र में देश के लिए मौत को गले लगा लिया। 1932 में चटगांव के यूरोपियन क्लब में हुए हमले के पीछे इसी क्रांतिकारिणी का हाथ था। शुरू से ही उनका झुकाव क्रांतिकारी विचारों की ओर झुकाव था। कॉलेज में आकर उनके विचारों को और मजबूती मिली, नतीजन ब्रिटिश अधिकारियों ने उनके क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने के चलते कोलकाता यूनिवर्सिटी में प्रीतिलता की डिग्री पर रोक लगा दी और मजे की बात यह है कि साल 2012 में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल एम के नारायणन की पहल पर करीब 80 साल बाद रिलीज की गई। खैर अंग्रेजों की ओर से डिग्री रोक लिए जाने के बाद प्रीतिलता वापस गांव लौटकर एक स्कूल में पढ़ाने लगी।

इसी दौरान उनकी मुलाकात प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूर्य सेन उर्फ मास्टर दा से हुई जिन्होंने प्रीतिलता को हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी। 18 अप्रैल 1930 को इंडियन रिपब्लिकन आर्मी का गठन किया गया, हालांकि IRA अपने ग्रुप में किसी महिला को शामिल करने के खिलाफ था लेकिन बावजूद इसके प्रीतिलता IRA में शामिल हो गई। IRA के साथ मिलकर उन्होंने कई मोर्चो पर ब्रिटिश हुकुमत से लोहा लिया।

24 सितम्बर 1932 की रात एक पंजाबी पुरुष के वेष में हथियारों से लैस प्रीतिलता ने पोटेशियम साइनाइड भी रख लिया था। उन्होंने चटगांव के यूरोपियन क्लब के बाहर से खिड़की में बम लगाया। क्लब की इमारत बम के फटने और पिस्तौल की आवाज़ से कांपने लगी। इस हमले में 13 अंग्रेज जख्मी हो गये और बाकी भाग गये। वहीं इस घटना में एक यूरोपीय महिला मारी गयी। दोनों तरफ से गोलियां चल रही थी और इसी दौरान एक गोली प्रीतिलता को भी लगी, वो घायल अवस्था में भागी लेकिन जब वो फिर से गिरी तो उन्होंने पोटेशियम सायनाइड खा कर शहादत को गले लगा लिया।

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मदन लाल ढींगरा
8 सितंबर को अमृतसर में जन्में मदन लाल ढ़ींगरा ने अपने देश के स्वाभिमान की रक्षा करने के लिए सारे सुखों को छोड़कर मौत को गले लगा लिया। मदनलाल धनी परिवार से ताल्लुक रखते थे लेकिन बचपन से ही गुलामी और अन्याय के खिलाफ उनमें एक बगावत की आदत थी। कॉलेज पहुंचकर इस आदत ने प्रचंड रूप ले लिया, उसके फलस्वरूप क्रांति के आरोप में मदनलाल ढींगरा को लाहौर के कॉलेज से बाहर निकाल दिया गया। वह आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए लंदन पहुंचे जहां उनकी मुलाकात भारत के प्रख्यात राष्ट्रवादी विनायक दामोदर सावरकर एवं श्यामजी कृष्ण वर्मा से हुई।

सावरकर ढ़ींगरा की प्रचण्ड देशभक्ति से बहुत प्रभावित हुए। ऐसा माना जाता है कि सावरकर ने ही मदनलाल को अभिनव भारत नामक क्रान्तिकारी संस्था का सदस्य बनाया और हथियार चलाने की ट्रनिंग दी।

मदनलाल इण्डिया हाउस में रहते थे जो उन दिनों भारतीय विद्यार्थियों के राजनैतिक क्रियाकलापों का केन्द्र हुआ करता था। ये लोग उस समय खुदीराम बोस, कन्हाई लाल दत्त, सतिन्दर पाल और काशी राम जैसे क्रान्तिकारियों को मृत्युदण्ड दिये जाने से बहुत क्रोधित थे। उस दौरान पता चला कि अंग्रेजी भारतीय सेना का अवकाश प्राप्त अधिकारी कर्जन वाईली भारतीय विद्यार्थियों की जासूसी करता है।

1 जुलाई सन् 1909 की शाम को इण्डियन नेशनल ऐसोसिएशन के वार्षिकोत्सव में भाग लेने के लिये जब भारी संख्या में भारतीय और अंग्रेज इकठे हुए। जैसे ही भारत सचिव के राजनीतिक सलाहकार सर विलियम हट कर्जन वायली अपनी पत्नी के साथ हाल में घुसे, ढींगरा ने उनके चेहरे पर पांच गोलियां दागी, इसमें से चार सही निशाने पर लगीं। उसके बाद ढींगरा ने अपने पिस्तौल से स्वयं को भी गोली मारनी चाही किन्तु उन्हें पकड़ लिया गया। किसी भारतीय द्वारा ब्रिटेन में की गई यह पहली हत्या थी।

23 जुलाई 1909 को ढींगरा के केस की सुनवाई पुराने बेली कोर्ट में हुई। अदालत ने उन्हें मृत्युदण्ड का आदेश दिया और 17 अगस्त सन 1909 को फांसी पर लटका कर उनकी जीवन लीला समाप्त कर दी। मदनलाल मर कर भी अमर हो गये। 13 दिसंबर 1976 को मदनलाल ढ़ीगरा का शव भारत लाया गया।

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बिरसा मुंडा
बात उस दौर की है जब अंग्रेजी हुकुमत के अत्याचार लगातार बढ़ते जा रहे थे। 15 नवम्बर 1875 को रांची जिले के उलिहतु गांव में जन्में बिरसा मुंडा एक आदिवासी नेता और लोकनायक थे, जिन्हें सिंहभूमि के आदिवासी 'बिरसा भगवान' कहकर याद करते हैं।

गरीबी के इस दौर में बिरसा को उनके मामा के गांव अयुभातु भेज दिया गया जहां उन्होंने दो साल तक रहकर पढ़ाई की। बिरसा पढाई में बहुत होशियार थे इसलिए स्कूल चलाने वाले जयपाल नाग ने उन्हें जर्मन मिशन स्कूल में दाखिला लेने को कहा, उस वक्त क्रिस्चियन स्कूल में प्रवेश लेने के लिए इसाई धर्म अपनाना जरुरी हुआ करता था तो बिरसा ने धर्म परिवर्तन कर अपना नाम बिरसा डेविड रख दिया जो बाद में बिरसा दाउद हो गया।

1895 के दौरान उनके इलाके में चेचक की बीमारी फैल गई, इस वक्त बिरसा ने जमकर लोगों की सेवा की और उनकी सेवा के चलते लोग ठीक भी होने लगे। इसके चलते लोग उन्हें भगवान का अवतार मानने लगे। लोगों में यह विश्वास दृढ़ हो गया कि बिरसा के स्पर्श मात्र से ही रोग दूर हो जाते हैं।

1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे, अगस्त 1897 में बिरसा और उनके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूंटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेनाओं से हुई जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गयी लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ़्तारियां हुईं।

जनवरी 1900 में डोमबाड़ी पहाड़ी पर एक और संघर्ष हुआ था जिसमें बहुत से औरतें और बच्चे मारे गये थे। उस जगह बिरसा अपनी जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे। बाद में बिरसा भी 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर में गिरफ़्तार कर लिये गये।

बिरसा ने अपनी अन्तिम सांसें 9 जून 1900 को रांची कारागार में ली जहां उनकी मौत रहस्यमयी तरीके से हो गई। अंग्रेजों ने उनकी मौत का कारण हैजा बताया जबकि उनके शरीर में हैजा का कोई लक्षण नहीं मिला।

First Published: Tuesday, August 14, 2018 10:43 PM

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