मंगोलपुरी मंगोलिया में नहीं है, मौत उनकी भी है लेकिन मीलार्ड देख तो लीजिये

| Last Updated:

नई दिल्ली:

शाम का वक्त। खाना खाने के बाद दोनों दोस्त करणबीर और दिनेश रोज की तरह घर से बाहर घूमने निकल गए। घर के अंदर बच्चे अपने कामों में लग गए। कुछ देर में ही गली में शोरगुल मच गया। बच्चों ने गली में झांका तो किसी ने चिल्ला कर कहा कि चाकू मार दिया, चाकू मार दिया। करणबीर के बेटे ने थोड़ा सा बाहर झांका तो होश उड़ गए, उसकी समझ में नहीं आया कि उसके पिता खून में लथपथ कैसे पड़े है। कौन उनको चाकू मार सकता है। उसके कुछ दूर दिनेश भी इसी हाल था। गली में तीन-चार लोग और भी थे जो खून से सने हुए चीख रहे थे। किसी को चाकू लगा था किसी को दूसरे हथियार से मारा गया था। अपने पिता को लेकर भागते हुए बेटे को किसी चीज की याद नहीं सिर्फ इसके कि वो अपने पिता को बचा सके। लेकिन उसकी भागदौड़ बेकार साबित हुई। पिता को बचा नहीं सका। और न ही पिता के दोस्त को बचाया जा सका। पिता की उम्र महज 47 साल थी और पिता के दोस्त की उम्र भी महज बत्तीस साल ही थी। तीन लोग गंभीर रूप से घायल हो गये और अस्पताल में अपनी जिंदगी को बचाने की जंग लड़ रहे है।

दूसरी गली में भी जलबोर्ड का एक कर्मचारी चाकू के वार झेल रहा था। बदमाशों को इनसे क्या दुश्मनी थी किसी को मालूम नहीं क्योंकि इनमें से किसी की भी कोई दुश्मनी नहीं थी। किसी का भी कोई झगड़ा नहीं हुआ था। और महानगरों के उसूल कि किसी के पंगें में पैर नहीं फंसाना है ये उसी का पालन भी करते रहे थे फिर भी इनको चाकू से गोद दिया गया। और जब कारण सुना तो पैरों तले जमीन खिसक गई। बदमाशों को वो शख्स मिला नहीं जिसको मारना था और वो चाकू खोल चुके थे, तमंचें में गोलियां भर चुके थे लिहाजा किसी पर तो चलानी ही थी और ये इन लोगों की गलती थी कि ये अपने घरों में ताला बंद कर अंदर नहीं बैठे थे। ये बदमाशों के शहर में खुले घूमने की नापाक और बेजा हिम्मत कर रहे थे ये उसी का नतीजा था। ये वारदात मंगोलपुरी की है और मंगोलपुरी दिल्ली में है मंगोलिया में नहीं। वारदात को मंगोलों ने नहीं दिल्ली के छुटभैय्या कहे जाने वाले गुंड़ों ने अंजाम दिया है। और मरने वालों में एक पेंटर था तो दूसरा मजदूरी कर अपने बच्चों को पाल रहा था। इसीलिए ये कहानी कोई बड़ी कहानी नहीं बन सकी। मीलार्ड की नजर में नहीं जा सकी। और मीलार्ड ये देख नहीं सके कि प्रेशर कुकर में कही सेफ्टीवॉल्व ज्यादा तो कस नहीं गया है और उसमें विस्फोट तो नहीं हो गया।

ये राजधानी दिल्ली है। वो दिल्ली जिसके पुलिस वालों पर कितना खर्च होता है अगर उसका हिसाब जोड़ा जाएं और उसको दूसरे राज्यों से तुलना करे तो आपका सर चकरा सकता है। देश की राजधानी दिल्ली के अखबारों में रोज ( टीवी पर नहीं वो तो इस वक्त मी टू नक्सल में लगे हुए है) मौत की ऐसी कहानियां दिखती है। रोज बलात्कार की कहानी दिखती है रोज लूट और चाकूबाजी की घटनाएं दिखती है लेकिन इनको आप अपने आसपास महसूस नहीं करते। क्योंकि आप शाम को घर चले आते है इस बात से बेखबर और अगले दिन की चाय के साथ जानने के लिए कि कुछ लोग सुबह गए थे लेकिन शाम को नहीं लौटे। इस बात पर किसी मीलार्ड को परेशानी नहीं होती है क्योंकि मरने वालों की गिनती आदमियों में करने के लिए कभी कभी वो जुमले वाले फैसले दे देते है और बौंनों की भीड़ अगले दिन रीढ़ की बची हुई तमाम खाल बेचकर गुणगान कर नाचने लगती है। लेकिन ये भीड़ के लॉटरी के टिकट में बदलने की कहानी है। भीड़ जिसकी जिंदगी की लॉटरी रोज निकल रही है कभी किसी का नंबर आ रहा है और कभी किसी का। जो बच जाता है उसको एक दिन का ईनाम मिल जाता है। और अगले दिन की लॉटरी खेलने का अववसर भी। लेकिन नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों को इनमें भी कुछ मिल जाता है।

आप कभी भी गौर करते है कि इन सब में कड़ी निंदा करने वाले बयान और निंदा करने की सजा दोनों का काम भी चलता रहता है। ये खबर लिखने का कारण भी ये है कि लूट के लिए मारने वाले बदमाशों को शरीफ मान लेना पड़ रहा है, वो गैंग भी दयालुओं का गैंग दिख रहा है जो बीस रूपये के लिए भी कत्ल करता रहा यात्रियों का और 52 कत्ल के बाद संख्या भूल गया था क्योंकि उनका मकसद दिख रहा था। लेकिन इन दोनों लोगों की मौत से दिमाग में सन्नाटा सा छा गया कि इस तरह से भी हो सकता है। बीट बीट में बंटे हुए पैसों और लूट की रकम का हिसाब करने वाली नौकरशाही अपने किलो में बैठ कर कुत्तों के साथ खेलने में मशगूल है। वो जानती है कि उसका कुछ नहीं बिगड़ सकता है। 


दिल्ली पुलिस की कहानी तो और भी यादगार रहती है, सालों पहले पुलिस को कवर करने वाले बौंनों की भीड़ में मैं भी शामिल था। पुलिस की वार्षिक प्रेस क्रांफ्रेस थी और हम लोग दिल्ली पुलिस की उपलब्धियों को रिकॉर्ड के तौर पर देख रहे थे तभी एक आंकड़ा पेश किया गया और आंकड़ा था कि अलीग, मेरठ और शायद गाजियाबाद इन तीन जिलों की अपराधवार संख्या और दिल्ली के बीच तुलना थी। मैं बैठे बैठे चौंक गया। कितनी स्मार्ट नहीं कितनी शातिर पुलिस। पचपन हजार की संख्या वाली ( उस वक्त का अंदाज) और सर्वोत्तम साधनों से संपन्न और सबसे कम राजनीतिक दखलंदाजी झेलने वाली पुलिस का मुकाबला जीपों में पेट्रोल भरपाने की रकम से भी महरूम या फिर थानों की बिजली का पैसा चुकाने में असमर्थ होने और लाईन कट की समस्याओं को झेल रहे जिलों के साथ मुकाबला कोई शातिर दिमाग ही कर सकता है।

दिल्ली में बड़े बडे़ बदमाश आराम से गैंग चला रहे है। खुलेआम मर्डर कर रहे है, जेलों से गैंगवार ऑपरेट हो रही है, फोन से वसूली, जेलों से फोन और जेलों में बंद उद्योगपतियों की ऐश सब कुछ बौंनों की फौंज छिपा कर भी दिखा देती है। लेकिन पुलिस के कानों में कोई आवाज पहुंचती नहीं है। वो जानती है बौंनों की फौंज की आवाज तो बीट कांस्टेबल बंद कर सकता है उसके लिए किसी अधिकारी को परेशान होने की जरूरत नहीं है। ऐसे में मारे गए लोगों के आश्रित लोग भीख मांगकर कफन जुटाएं या फिर भिखारी के तौर पर अपने अपने शहर लौट जाएँ इस पर किसी को सोचने की जरूरत ही क्या है। दिल्ली में एक अलकापुरी भी है जहां कुछ भी होने पर मीलार्ड की नींद भी टूट जाती है। निर्भया याद है ना उस पर दिए गए बड़े बड़े बोल भी अदालतों की कार्रवाही के दौरान बौंनों ने उछल उछल कर दर्जनों बार स्क्रीन पर बोला लेकिन किसी के मुंह से आवाज नहीं निकल पाती कि मीलार्ड कुकर का ढक्कन कैसा है कि रात के दो बजे भी खुल सकता है किसी आतंकी के लिए, कांपने लगते है किसी भी करोड़ों कमाने वाले के लिए लेकिन निर्भया के फैसले के लिए कोई नजीर नहीं बन पाती है। छुटभैय्या जानते है कि एक कत्ल का मतलब है पुलिस के हाथों कुत्ता बन जाना और कई कत्ल का मतलब है बहुतों को कुत्ता बना लेना। और इसी समाज में मीट का टुकड़ा बन कर जिंदा लोग अपने कफन के दिन को आगे करने के लिए रात को घुस कर ताला लगा लेते है जुबां पर, दिमाग पर और हाथों में। 
मैं एक अदृश्य दुनिया में जी रहा हूं
और अपने को टटोल कर कह सकता हूं
दावे के साथ
मैं एक साथ ही मुर्दा भी हूं और ऊदबिलाव भी।
मैं एक बासी दुनिया की मिट्टी में
दबा हुआ
अपने को खोद रहा हूं।
मैं एक बिल्ली की शक्ल में छिपा हुआ चूहा हूं
औरों को टोहता हुआ
अपने से डरा बैठा हूं। 
मैं गलत समय की कविताएं लिखता हुआ 
एक बासी दुनिया में 
मर गया था। श्रीकांत वर्मा ( एक मुर्दे का बयान)

First Published: