Anurag Kashyap Birthday: छितरे हुए हिन्दी सिनेमा को आपस में पिरोने वाले धागे का नाम है अनुराग कश्यप

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नई दिल्ली:

'ब्लैक फ्राइडे', 'गुलाल', 'नो स्मोकिंग', 'देव डी', 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' 'गुलाल', अगर आपसे पूछा जाए कि यह क्या है तो आपका जवाब होगा यह हिन्दी फिल्मों के नाम है जिसे अनुराग कश्यप ने डायरेक्ट किया है। लेकिन अगर आप हिन्दी सिनेमा के बदलाव को देखे तो यह फिल्में महज फिल्में नहीं बल्कि समाज की वास्तविकता को पर्दे पर पेश करने की वह कोशिश है जो अनुराग से पहले इतनी प्रगाढ़ रूप में किसी ने नहीं की।

अनुराग की फिल्मों में पुरानी फिल्मों की तरह नायक-नायिका पेड़ के इर्द-गिर्द घूमकर रोमांस नहीं करते बल्कि उनके किरदार बोल्ड और बेबाक अंदाज में खुले तौर पर सेक्स की बात करते हैं। गैंग्स ऑफ वसेपुर में फैजल खान के किरदार में ऐसे ही व्यक्ति की छवि दिखती है। अनुराग ने बनी बनाई लीक से हटकर फिल्में बनाई और बताया कि अब बॉलीवुड का सिनेमा चम्बल और बीहड़ों से होता हुआ बिहार के कोयला खदानों तक पहुंच चूका है। धनबाद के वासेपुर जैसे गांव का इस कदर संजीव चित्रण पर्दे पर सिर्फ अनुराग कश्यप ही कर सकते थे। उनके फिल्मों में अंचल की पृष्ठभूमि में ही समाज की बदलती हुई तस्वीर दिखाई गई है।

दरअसल अनुराग कश्यप का कहना है, 'सीमाएं कौन तय करेगा। किसी एक आदमी की सीमाएं कोई दूसरा तय नहीं कर सकता। अगर ऐसा होने लगा तो मैं सीमाएं तय कर दूं, कि मेरे अलावा कोई दूसरों की फिल्म देखेगा ही नहीं।'

जो प्रयोग उन्होंने फिल्मों में किए वही प्रयोग हिन्दी सिनेमा के संगीत में भी अजमाया। 'तार बिजली से पतले हमारे पिया' हो या 'जिअ हो बिहार के लाला' उनकी फिल्मों में गीत किरदार के जीवन के भीतर से जागते हुए दिखते है। पियूष मिश्रा का 'इक बगल में चांद होगा' यथार्थवादी सिनेमा का एक छायावादी गीत है जो अपने आप में नायाब है।

अनुराग ने उन निर्देशकों में हैं जो बाज़ार की परवाह न करते हुए फिल्मी दुनिया में दूसरा रास्ता चुना। इनकी सफलता का राज भी यही है। अनुराग की फिल्मों में गोली और गाली दोनों ही होती है। उनकी फिल्म के किरदार एकदम खांटी होते हैं। अनुराग से पहले हिन्दी सिनेमा छितरा हुआ अलग-अलग दिशाओं में उड़ रहा था लेकिन उन्हें आपस में पिरोने वाला धागा गायब था। वह धागा अनुराग कश्यप बने।

अनुराग ने फ़िल्म ब्लैक फ्राइडे से अपना डेब्यू किया था। एक सीरियल लिखने के बाद अनुराग को 1998 राम गोपाल वर्मा की फ़िल्म सत्या में को-राइटर बनने का ब्रेक मिला। अपनी कई फ़िल्मों में अनुराग ने कैमियो भी किया है जिनमें से तेरा क्या होगा जॉनी और नो स्मोकिंग एक हैं।

अनुराग कश्यप की वह फिल्में जिसे उन्होंने अपने एक्सपेरिमेंट से काल्पनिक से वास्तविक बना दिया

गुलाल

इस फिल्म का हर किरदार प्रासंगिक लगता है। इस फिल्म की कहानी राजपुताना सनक के जरिए राजनीति की एक व्यापक हक़ीकत को बयां करती है। राजपुताना के नाम पर लोगों को भड़का कर अपनी राजनीतिक हित साधने वाले दुकी बना यानी केके मेनन जैसे किरदार राजनीतिक परिदृश्य में आसानी से देखने को मिल जाते जो जातिगत कार्ड खेलते हैं।कॉलेज की राजनीति का जो रूप इस फिल्म में दिखाया है उससे वह सभी युवाओं को कनेक्ट कर पाते हैं जिन्होंने कॉलेज में होने वाले राजनीतिक चुनाव को देखा है।

गैंग्स ऑफ वासेपुर

आजकल की फिल्मों में गाली का इस्तेमाल करने से कई फिल्म मेकर डरते हैं। उन्हें डर होता है कि फुहरपने के कारण सेंसर बोर्ड की कैंची न चल जाए लेकिन इस चिंता से दूर अनुराग की गैंग्स ओफ गैंग्स ऑफ वासेपुर गालियों और गोलियों से लबरेज है। फिल्म का हर पात्र सच्चा दिखता है। हर पात्र अपने आप में समाज का एक किरदार दिखता है जो जैसा है वैसा ही पर्दे पर देखने को मिलता है।

इस फिल्म में लड़ाई कुरैशी और पठान के बीच दिखाई है। कैसे समाज में जीवन की कीमत सबसे कम है और ताकत का मतलब जीवन के ऊपर काबिज होना है इसे अनुराग ने बेहतरीन तरीके से दर्शाया है। यह फिल्म आजादी के बाद एक इलाके में आयी तब्दीलियों को पूरी कठोरता के साथ पर्दे पर उतारती है।

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‘Dev D’

किसने सोचा होगा कि शरतचंद चट्टोपाध्याय ने 1917 में जिस देवदास की रचना की थी वह कभी मार्डन हो जाएगा। इस कहानी को लेकर पहली फिल्म बांग्ला भाषा में सन् 1935 में बनी। इसके बाद हिन्दी पर्दे पर सबसे पहले के.एल सहगल ने 1955 में दिलीप कुमार को देवदास बनाकर प्रस्तुत किया।

इसके बाद संजय लीला भंसाली ने सन् 2002 में शाहरूख को देवदास बनाकर प्रस्तूत किया लेकिन जब अनुराग ने ‘Dev D’फिल्म में देवदास को सिनेमाई पर्दे पर उतारा तो उसका रूप बिलकुल अलग था। इस फिल्म से पता चलता है अनुराग कश्यप सिनेमा और कहानी के पात्रों के साथ एक्सपेरिमेंट करने से डरते नहीं है।

अनुराग कश्यप का देवदास आज का देवदास है। इस फिल्म में अभय देओल का किरदार दारूबाज है और लौंडियाबाज है। एक प्यार करने वाली महबूबा के होते हुए भी, एक वेश्या के साथ शारीरिक संबंध बनाने में इस देवदास को कोई गुरेज नहीं है। फिल्म आनंद और रसास्वादन की पारंपरिक प्रक्रिया को झकझोरती है। इस दिखावटी समाज में असली किरदार कैसे होते हैं यह फिल्म में देखने को मिलता है।

ब्लैक फ्राईडे

साल 2004 में आई फिल्म ब्लैक फ्राईडे ने अनुराग कश्यप को नई पहचान दिलाई। इस फिल्म में जिस तरह से अनुराग कश्यप ने धमाकों के खौफनाक मंजर को दर्शाया है वैसा आज तक कोई नहीं कर पाया। अनुराग ने बम धमाकों की सच्चाई को फिल्म में कुछ इस तरह पिरोया कि सेंसर ने इस फिल्म को पास करने में ही दो साल लगा। यह भी अनुराग की यूएसपी थी कि वरना रियल और वीभत्स ब्लास्ट सीन दिखाने की हिम्मत किसी डायरेक्टर ने आज तक नहीं की।

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