योगी आदित्यनाथ के सामने बड़ी चुनौती- अफसरशाही को दुरूस्त करना!

बीते सोमवार योगी सरकार एक बार फिर एक्शन में नजर आई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साफ साफ कहा कि बोझ बन चुके अफसरों पर सख्त एक्शन लिया जाएगा।

  |   Updated On : September 12, 2018 09:32 AM
योगी आदित्यनाथ (फाइल फोटो)

योगी आदित्यनाथ (फाइल फोटो)

नई दिल्ली:  

बीते सोमवार योगी सरकार एक बार फिर एक्शन में नजर आई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साफ-साफ कहा कि बोझ बन चुके अफसरों पर सख्त एक्शन लिया जाएगा। इस मौके पर एक तरफ जहां मुख्यमंत्री ने रिश्वत ना लेने—देने की अपील की, वहीं पिछली सरकारों को जमकर कोसा भी। दावा किया कि तैनाती और नियुक्तियों में 15 साल से चल रहा गड़बड़झाला बंद हो चुका है। वादा किया कि नियुक्तियों में भ्रष्टाचार करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। तो क्या वाकई एक्शन में है योगी सरकार? 

एक्शन तो दिखा, रिजल्ट कब?
यकीनन सरकार एक्शन में तो नजर आती है, लेकिन ऐसा पहली बार नहीं। इससे पहले इसी साल अगस्त में आर्थिक अपराध वाले करीब 150 अफसरों के खिलाफ सीएम योगी ने टास्क फोर्स  गठित कर दो महीने के अंदर कार्रवाई का निर्देश दिया था। फरवरी में तो मुख्यमंत्री ने पुलिस अफसरों से साफ-साफ बोला कि भ्रष्टाचार मिला तो नौकरी करना सिखा देंगे। वैसे बीते साल अगस्त में भी योगी ने अफसरों की क्लास ली और टो टूक कहा कि जो रिजल्ट नहीं दे पाएंगे, वे अब नहीं रह पाएंगे। योगी आदित्यनाथ सुशासन के मोर्चे पर गंभीर नजर आते हैं लेकिन सवाल है कि सूबे के मुखिया की गंभीरता का अफसरशाही पर असर क्यों नहीं?

साख पर सवाल खड़े करते अपने!
कुछ महीने पहले ही ओमप्रकाश राजभर ने अपनी सड़क तैयार नहीं हो पाने के चलते खुद फावड़ा उठा लिया था। ओमप्रकाश राजभर कोई और नहीं योगी सरकार के मंत्री हैं। कुछ दिन पहले ही मथुरा से बीजेपी विधायक पूरन प्रकाश पुलिस के खिलाफ थाने में ही धरने पर बैठ गए। इससे पहले भी सूबे के कई विधायक धरने पर बैठने को मजबूर थे। 

बीजेपी ने किए थे बड़े वादे!
‘न गुंडाराज-न भ्रष्टाचार, अबकी बार बीजेपी सरकार’ इसी नारे के साथ उत्तर प्रदेश में लंबे अंतराल के बाद बीजेपी सत्ता में आई है। चुनाव के दौरान जारी संकल्प पत्र में बीजेपी का वादा 15 साल से पिछड़ेपन से ग्रस्त रहे सूबे को गुंडाराज और भ्रष्टाचार से निकालकर प्रगतिशील प्रदेश बनाने का था। ऐसा भी नहीं कि योगी सरकार ने अफसरशाही की पारदर्शिता तय करने के लिए कदम नहीं उठाए। अधिकारियों की स्क्रीनिंग जारी रखते हुए दागी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का दावा किया। तबादले में पारदर्शिता बरतने का दावा करते हुए पुलिस और शिक्षा विभाग में कंप्यूरीकृत तबादले किए। 

गंभीर नहीं रहीं पिछली सरकारें!
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत 2014 में 28 जबकि 2015 में केवल 60 मामले दर्ज हुए। वहीं 2016 में महज़ 30 मामले! ये पूरे देश में हुए कुल मामलों का केवल 0.7 फीसदी था! मानों अखिलेश सरकार में सब कुछ ठीक था! राज्यपाल कहते रहे कि अखिलेश सरकार को उन्होंने भ्रष्टाचार के 40 मामले भेजे लेकिन एक्शन किसी पर नहीं हुआ। मई 2017 में विधानसभा में पेश हुई कैग रिपोर्ट ने बताया कि अखिलेश सरकार ने 20 करोड़ रूपए के चेक बांटने के लिए 15 करोड़ रूपए खर्च कर डाले! याद रखना जरूरी है कि कांग्रेस की यूपीए सरकार भी पॉलिसी पैरालैसिस का आरोप झेलती रही!

क्यों जरूरी है यूपी में जवाबदेह अफसर?
नीति आयोग के मुताबिक यूपी जैसे राज्यों के कारण पूरा मुल्क पिछड़ा बना हुआ है। रघुराम राजन कमेटी रिपोर्ट बताती है कि उत्तर प्रदेश देश के सबसे कम विकसित राज्यों में एक है। एसोचैम की मानें तो 'बीमारू' राज्यों में यूपी सबसे बीमार है। आंकड़ों के जरिए भी समझें तो 2014—15 में जहां देश की विकास दर 7.2 फीसदी थी, तब यूपी की विकास दर केवल 6.15 फीसदी थी। इसी साल यूपी में प्रति व्यक्ति आय 44 हजार रूपए थी, जबकि भारत में औसतन प्रति व्यक्ति आय यूपी से दोगुनी 86 हजार रूपए थी। जाहिर है उत्तर प्रदेश में विकास की सख्त जरूरत है, जो बिना जवाबदेह अफसरशाही के मुमकिन नहीं! देखना होगा कि योगी आदित्यनाथ का एक्शन कब रिज़ल्ट में तब्दील होता नजर आता है।

लेखक - अनुराग दीक्षित, (एंकर - न्यूज़ नेशन)

First Published: Tuesday, September 11, 2018 08:36 PM

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