72वां स्वतंत्रता दिवस: 'ये तो नहीं भूलना था दोस्तों'

आजादी की एक लंबी लड़ाई में अपनी कुर्बानी देने वाले शहीदों के परिवारों को यही नसीब हुआ था। सब के सब नेहरू और गांधी जी जैसे परिवारों से नहीं थे।

  |   Updated On : August 14, 2018 07:38 AM
72वां स्वतंत्रता दिवस

72वां स्वतंत्रता दिवस

नई दिल्ली:  

तोरो कुर्बानी हम्मै जिनगी भर नै भुलैबै देश तोरो रिनी रहेते,
हम कर्जदार थे और हमने कर्ज़ देने वालों को अपनी यादों से ही मार डाला।

भीख मांगती हुई मां, और बर्तन मांजती हुई बहनें, शहीद क्रांतिकारी बेटे के किसी दयावान दोस्त के यहां आखिरी दिन गुजारती मां। ये सिर्फ बानगियां है। आजादी की एक लंबी लड़ाई में अपनी कुर्बानी देने वाले शहीदों के परिवारों को यही नसीब हुआ था। सब के सब नेहरू और गांधी जी जैसे परिवारों से नहीं थे। (किसी अनादर के साथ नहीं सिर्फ आर्थिक स्थिति के बारे में बात कर रहा हूं) गरीब, किसानों या ऐसी परिस्थितियों की देन थे जो उनको मजबूर कर रही थी बिना विदेशी पढ़ाई के भी कि इन हजारों-लाखों-करोड़ों लोगो की जिंदगी का रास्ता भी आजादी से जुड़ता है। और वो लोग अपनी जान दांव पर लगाने निकल पड़े। आज सत्तर साल बाद जब ये ख्याल आता है कि एक सरकार को ये कहना पड़े कि भूला दिए गए शहीदों के यहां से यात्रा शुरू करे तब लगता है कि ये किस रास्ते पर आ गए हम। कौन लोग थे जिन्होंने मार्गों पर साईनबोर्ड लगाएं थे और रास्तों के मोड़ तैयार किए थे। 

ऐसा क्या हुआ कि हम लोगो को ये याद ही नहीं रहे। इतिहासकारों की कलम इनके ऊपर से कैसे गुजर गई। 
कई बार एक सवाल भी जेहन में गूंजा, कि क्या कोर्स की किताबों में लिखा हुआ सच है। जिसमें सिर्फ अहिंसा के दम पर दुनिया की सबसे बड़ी ताकत को मात दी गई थी। वो अंग्रेज जिन्होंने जालियांवाला बाग किया, जिन्होंने 1857 में लाखों लोगो कों ही नहीं बल्कि मासूम बच्चों को, औरतों को संगीनों की नौंक पर उछाल कर टुकड़े टुकड़े में बांट दिया था। वो इतनी आसानी से और बिना किसी हथियार की चमक से चले गए थे। यदि वाकई ये सब था तो इतिहास ठीक ही लिखा गया है। और यही वो कारण है जिसके चलते इतिहास की किताबों से इतिहास ही गायब हो गया। सिर्फ अंहिसा को सबसे बड़ी ताकत साबित करने के लिए बड़ी हिंसा की हमारे इतिहासकारों, राजनेताओं और अंग्रेजों की जूतियां चाटने वाले नौकरशाहों के गैंग ने। अगर रास्ता सिर्फ इतना सा ही होता तो ये सब सच होता । लेकिन नौकरशाहों और अंग्रेजों की कॉपी करने की होड़ में लगे राजनेताओं ने हजारों क्रांतिकारियों की ओर जाने वाले हर रास्ते पर पत्थर रख दिया। और इसी के चलते देश की जनता की यादों में रहने वाले, देश की जनता की रीढ़ में ललकार भर देने वाले क्रांतिकारियों को देश ने ही भुला दिया। 

इसके बारे में आपको कोई किताब तलाश करने की जरूरत नहीं बस सोचने की जरूरत है कि जिस बिस्मिल की कविताओं के बिना कांग्रेस के अहिंसक नेताओं की कोई रैली पूरी नहीं होती थी उसकी मां को दो जून की रोटी का इंतजाम नहीं कर सके वो महान नेता। जिस खुदीराम बोस प्रफुल्ल चाकी के बलिदान के गीत से रैली की शुरूआत करते थे वो लोग उसके स्मारक पर शौचालय बननेे से नहीं रोक सके। इसके लिए सोचना बहुत जरूरी है। लेकिन फिर एक सवाल से घिरता हूं कि अगर ये सब याद रहे तो किसकी मेहरबानी से। कैसे याद रहे जनता को इनकी कुर्बानी उस जनता को जिसको बेचारी को अंग्रेजी किताबों का एक बर्का भी पढ़ना नहीं आता हमारी पीढ़ी की तरह। जो अमेरिका के फला राज्य में क्या हो रहा है आपको उंगिलयों पर बता देंगी। पोकिमोन कहां कितने मौजूद है इस का हिसाब किताब समझा देंगी। तो फिर आज मैं कोशिश करता हूं लोककवियों और लोकगीतों के बीच झांकने की, आपसे शेयर करने की जिनके चलते छोटी-छोटी जगहों में हुए संघर्ष लोगों के जेहन में रहे। और अपने मासूम बच्चों को फांसी पर चढ़ाने के लिए आगे करते रहे जबकि पढ़े-लिखे बाबूओं ने अपने बच्चों को विदेश में तालीम देने के लिए भेज दिया।

कुछ लोगों के लिए तो आजादी की लड़ाई इतनी आसान रही कि पत्नी विदेश में इलाज कराती रही खुद महल में नजरबंद होते रहे और बच्चों को दुनिया का इतिहास समझाते रहे बिना अपने देश की कहानी बताएं।लेकिन आजादी के बाद और आजादी के पहले में एक बड़ा अंतर ये है कि आजादी से पहले लड़ने वाले क्रांतिकारियों और अहिंसा के अनुयायिओं को बराबर आंका गया लेकिन आजादी के बाद स्थिति उलट गई। सत्ता के लिए लड़ रहे राजनेताओं ने ये समझ लिया था कि क्रांतिकारियों के दर्शन में किसी भी आदमी के भूखा न रहने की बात है। हर आदमी को स्वराज देने की बात है और उनकी शहादत जिंदा नेताओं से बड़ी कुर्बानी है लिहाजा नेताओं के खिलाफ आम जनता को कभी भी खड़ा कर सकती है सो उनको किताबों से मिटाने का काम शुरु कर दिया गया। नया इतिहास लिखा गया और नई जुबान से बात की गई। ये जुबान जो देश की 99 फीसदी आबादी को आती ही नहीं थी। वो मुंह देखते रहे । और इसकी सच्चाई देखने के लिए कई सारे स्रोत्र हैं लेकिन बात करते हैं लोकगीतों से ।उन लोकगीतों से जिनको सुनकर इन महान अहिंसक नेताओं को हिंसक भीड़ आजादी के दीवान बन कर मिलती रही। मिटती रही और बदले में सबकुछ इन नेताओं को मिल गया। 

मैथिली के एक लोकगीत से शुरू करता हूं। 
गरजब हम मेघ जका, बरिसब हम पानि जकां,
उड़ाय देब लंदन के हुंकार में।
बिजली जकां कड़कि कड़कि,
आन्हीं जकां तड़कि तड़कि 
भगा देव गोरा के टंकार में।
कुहुकब हम कोईल जकां, नाचब हम मोर जंका
मना लेब माता के बीना के झंकार में।
ऐसे ही एक दूसरे लोक गीत में 
खूनक एकोटा कतरा
जाधरि शरीर में रहत
फहराईत तिरंगा के
कियो झुका न सकत
सहि नै सकेै छी
हम ककरो शैतानी 
हम देश केर सिपाही।...

क्या किसी को याद है कि बंगाल के अकाल में करोड़ों लोग मर गए थे। कोलकाता की परिधि के बाहर इस बात को किताबों में इस तरह कही कही लिखा गया है जैसे किसी लंबे पाठ के बीच में कही कोमा या फुलस्टाफ दिया हो। 
लेकिन लोककवियों के बीच से ये पाठ गुलाम जनता के बीच गूंजता रहा।
बड़ जुलुम कइलक अकलवा रे
बंगला मुलुकवा में
चार करोड़ आदमी मरल...

भोजपुरी लोकगीत में वारेन हेस्टिंग्स के समय काशी की बहादुर जनता के विद्रोह का जिक्र है। विद्रोहियों को भारी संख्या मारा गया, और उससे भी ज्यादा बड़ी संख्या में अंडमान जिसे कालापानी कहा जाता था भेज दिया गया। इसको याद करते हुए एक लोकगीत बताता है।
अरे रामा नागर नैया जाला काले पनियां रे हरी
सब कर नैया जाला कासी हो बिसेसर रामा,
नागर नैया जाला काले पनियां रे हरी
घरवा में रौवे नागर,माई और बहिनियां रामा
सेजिाय पै रोवे बारी धनिया रे हरी
खुंटियां पै रोवे नागर ढाल तरवरिया रामा
कोनवा में रौवें कड़ाबनिया रे हरी
रहिया में रौवे तौर संग अउर साथी रामा
नार घाट पर रौवें कसबिनियां रे हरी
जो मैं जनत्य़ूं नागर जईबा काले पनियां रामा
तोरे पसवां चलि अवत्यूं बिनु रे गवनवां रे हरि।

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( एक पत्नि अपने पति के लिए कह रही है.. तुमको लेकर नाव काले पानी चली गई। तुम्हारे भाईबहन सब रो रहे हैं। मैं सूनी सेज पर रो रही हूं। यही नहीं, बल्कि तुम्हारे अस्त्र-शस्त्र भी रो रहे है। मुझे ये मालूम नहीं था कि अंग्रेज तुम्हें काले पानी ले जाएंगे। अन्यथा मैं भी लोक-लाज की परवाह किए बिना, बिना गौना हुए ही तु्म्हारे पास आ जाती।-- गीत में आप सुन सकते है कि क्रात्रिकारी को काले पानी भेजे जाने पर काशी की आम जनता रोती है। समाज में हाशियें पर समझे जाने वाली वेश्याएं (कसबिनियां) भी दुखी ही। काले पानी में हजारों लोगों को अपने प्राण गंवाने पड़े थे ये गीत इतिहास को याद रखता है और लोक आयोजनों पर गाया जाता था।..
क्रमश .. अभी बहुत से गीत है जिनको शेयर करना चाहता हूं। उत्तराखंड से लेकर तमिलनाडु तक, भील- गोंड से लेकर उडिया सब भाषाओं के लोग गीतों में अनपढ़ जनता ने वो याद रखा जो हम पढ़े-लिखे भूल गए। 
हौ आजाद त्वौं अपनौ प्राणें क
आहुति दै के मातृभूमि कै आजाद करैलहों
तोरो कुर्बानी हम्मै जिनभी भर नै भुलैबे
देश तोरो रिनी रहेते

First Published: Tuesday, August 14, 2018 07:03 AM

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