स्वतंत्रता दिवस 2018: इन खिलाड़ियों ने पहली बार विदेशों में लहराया तिरंगा, किया देश का नाम रोशन

  |   Updated On : August 13, 2018 01:57 PM
भारतीय हॉकी टीम (विकीपीडिया फोटो)

भारतीय हॉकी टीम (विकीपीडिया फोटो)

नई दिल्ली:  

क्रिकेट हो या कबड्डी, या फिर बैडमिंटन हो या बास्केटबॉल या रेस ऐसे कई खेल हैं जिसमें भारतीय खिलाड़ियों ने पहली बार विदेशों में तिरंगा लहराया था। देश को आजाद हुए 71 साल हो गए और इन 71 सालों में कई ऐसे मौके आए जब देश खिलाड़ियों ने भारतीय तिरंगे की शान को अपने खेल से बढ़ाया।

आइए आज जानते हैं देश के ऐसे ही कुछ खिलाड़ियों की कहानी

1. हॉकीः

भारत के खेल में हॉकी की बात की जाए तो भारत ने 15 मार्च 1975 को पाकिस्तान के खिलाफ ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। मलेशिया के कुआलालुम्पुर में आयोजित हॉकी विश्व कप में भारत ने पाकिस्तान को 2-1 से हराया था। उस वक्त अजीत पटेल भारतीय टीम के कप्तान थे और असलम शेर खां ने उस जीत में अहम रोल अदा किया था। भारत ने ओलंम्पिक में 8 गोल्ड मेडल जीते थे जोकि अपने आप में एक बड़ी उपलब्धी थी।

जब हॉकी की बात आती है, तो ध्यानचंद के योगदान की बात को भूला नहीं जा सकता। 1936 में बर्लिन ओलंपिक में भारत ने जर्मनी को हराया था। यह मैच हिटलर समेत 40000 से ज्यादा लोगों ने देखा था। जर्मनी की हार को देखते हुए हिटलर नाराज हो गए और उसी वक्त स्टेडियम छोड़ कर चले गए। अगले दिन हिटलर ने ध्यानचंद को मिलने के लिए बुलाया और जर्मन सेना में एक उच्च पद के साथ जर्मन की नागरिकता की पेशकश की लेकिन ध्यानचंद ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया।

जीव मिल्खा सिंह 1982 (विकीपीडिया फोटो)

जीव मिल्खा सिंह 1982 (विकीपीडिया फोटो)

जीव मिल्खा सिंह भारत के पहले प्रोफेशनल गोल्फर हैं। वे फ़्लाइंग सिंह नाम से जाने जाने वाले प्रसिद्द भारतीय धावक मिलखा सिंह के पुत्र हैं।
भारतीय गोल्फ टीम ने क्रमशः 2006 के एशियाई खेलों में गोल्ड मेडल जीता और 2006 के एशियाई खेलों में सिल्वर मेडल से भारत को संतोष करना पड़ा था। इन अद्भुत जीतों के अलावा, इस खेल में जीवन मिल्खा सिंह के योगदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता क्योंकि वह 1998 में यूरोपीय टूर के सदस्य बनने वाले प्रथम भारतीय गोल्फ खिलाड़ी हैं। उन्होंने तीन यूरोपीय टूर टाइटल, चार जापान गोल्फ टूर खिताब और छह एशियाई टूर टाइल्स जीते हैं। दुनिया के कुछ बेहतरीन खिलाड़ियों को हराकर वह 'वाल्वो चाइना ओपन' के भी विजेता बने। उन्होंने स्पेन का 'वाल्वो मास्टर्स' भी जीता। उन्हें 'एशियन प्लेयर ऑफ द ईयर पुरस्कार' 2006 से सम्मानित किया गया।

कपिल देव (विकीपीडिया फोटो)

कपिल देव (विकीपीडिया फोटो)

9 जून से 25 जून 1983 के बीच एक बार फिर इंग्लैंड में आयोजित वर्ल्ड कप के तीसरे संस्करण को भारतीय टीम ने जीता। उस वक्त भारतीय टीम के कप्तान कपिल देव थे। भारतीय टीम ने यह खिताब जीतकर पूरे विश्व में अपना लोहा मनवा लिया। वेस्टइंडीज़ को फाइनल में हराकर न केवल खिताब जीता बल्कि क्लाइव लॉयड के लगातार तीन वर्ल्ड कप जीतने के सपने को भी चकनाचून कर दिया। वेस्टइंडीज ने भारत को सिर्फ़ 183 रनों पर समेट कर शानदार शुरुआत की और जवाब में एक विकेट पर 50 रन भी बना लिए। वेस्टइंडीज समर्थक जीत का जश्न मनाने की तैयारी करने लगे। लेकिन मोहिंदर अरमनाथ और मदन लाल ने शानदार गेंदबाज़ी की और मैच का पासा ही पलट दिया। वेस्टइंडीज की पूरी टीम 140 रन बनाकर आउट हो गई और भारत पहली बार विश्व कप का विजेता बना जिसे टूर्नामेंट शुरू होने से पहले सबसे फिसड्डी टीम कहा जा रहा था।

लिएंडर पेस और महेश भूपति की जोड़ी (फोटो -पीटीआई)

लिएंडर पेस और महेश भूपति की जोड़ी (फोटो -पीटीआई)

टेनिस में पेस-भूपति की जोड़ी अब तक विभिन्न प्रतियोगिताओं में 19 युगल खिताब जीत चुकी है। इस जोड़ी ने 1999 में फ्रेंच और विम्बलडन खिताब एक साथ जीते थे। भारतीय टेनिस के इतिहास में तो इस जोड़ी का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान माना जाता है, क्योंकि इन्हीं के कारण भारत 1999 में पहली बार ग्रैण्ड स्लैम श्रृंखला में विजयी हुआ था। उस वर्ष वे चारों ग्रैण्ड स्लैम प्रतियोगिताओं-आस्ट्रेलियन ओपन, फ्रेंच ओपन, विम्बलडन और यू. एस. ओपन के निर्णायक दौर में पहुंचे थे तथा उन्होंने फ्रेंच ओपन और विम्बलडन के युगल खिताब जीते थे। तब अचानक टेनिस के क्षितिज पर उदित हुई इस भारतीय जोड़ी की वि·श्वभर में चर्चा होने लगी। खेलों में भारतीय खिलाड़ियों की अपमानजनक नाकामी से व्यथित भारतीयों के लिए तो उनकी सफलता घोर अंधेरे में रोशनी की किरण की तरह थी। रोशनी की इन किरणों से सारा देश उम्मीदें लगाए बैठा था।

कर्णम मल्लेश्वरी

कर्णम मल्लेश्वरी

वर्ष 2000 के सिडनी ओलंपिक में भारत की कर्णम मल्लेश्वरी ने भारोत्तोलन में कांस्य पदक जीतकर पदक तालिका में भारत का नाम जुड़वाया। इस ओलंपिक में भारत को मिलने वाला यह मात्र एक मात्र पदक था और यह कांस्य पदक 'लौह महिला' कर्णम मल्लेश्वरी ने दिलाया था। मल्लेश्वरी ने महिलाओं के 69 किग्रा वर्ग में कांस्य पदक जीतकर नया इतिहास रचा था। वह ओलिंपिक पदक जीतने वाली भारत की पहली महिला बनी थीं। उस समय वह व्यक्तिगत पदक जीतने वाली चौथी भारतीय थीं।

विश्वनाथन आनंद (फाइल फोटो)

विश्वनाथन आनंद (फाइल फोटो)

इस दिग्गज भारतीय ने अपना पहला विश्व खिताब वर्ष 2000 में जीता था जिसके बाद वह 2007, 2008 और 2010 में लगातार तीन बार विश्व चैम्पियन बनने में सफल रहे। वह 2007 से विश्व चैम्पियन हैं।

अंजू बॉबी जॉर्ज

अंजू बॉबी जॉर्ज

अंजू बॉबी जॉर्ज भारत की प्रसिद्ध एथलीट हैं। अंजू ने सितम्बर 2003, पेरिस में हुए वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनसिप लंबी कूद में कांस्य पदक जीत कर भारत को पहली बार विश्वस्तर की प्रतियोगिता में पुरस्कार दिलाया था। अंजू बी. जॉर्ज वर्ष 2003 में 25 वर्ष की उम्र में विश्व एथलेटिक्स में भारत की प्रथम पदक विजेता बनी।

पंकज आडवाणी

पंकज आडवाणी

पंकज आडवाणी ने 2005 में पहला विश्व बिलियर्ड्स खिताब अपने नाम किया था। इसी साल उन्होंने आईबीएसएफ विश्व बिलियर्ड्स चैम्पियनशिप में समय और अंक प्रारूप दोनों में खिताब जीते थे और यह उपलब्धि हासिल करने वाले पहले क्यू खिलाड़ी बनकर इतिहास रच दिया था। उन्होंने यह कारनामा 2008 में भी दोहराया।

पहलवान खाशाबा दादासाहेब (विकीपीडिया फोटो)

पहलवान खाशाबा दादासाहेब (विकीपीडिया फोटो)

ओलिंपिक में भारत का प्रदर्शन हमेशा से हॉकी में बेहतरीन रहा है, लेकिन एकल मुकाबलों में भारत अपनी धाक नहीं जमा पाया है। भारत को पहला सिंगल्स इवेंट मेडल महाराष्ट्र के खाशाबा दादासाहेब जाधव ने दिलाया था। उन्होंने 1952 में हुए हेलसिंकी गेम्स में कुश्ती में ब्रॉन्ज मेडल जीता था। खाशाबा को 'पॉकेट डायनमो' के नाम से भी बुलाया जाता है। देश को ओलिंपिक मेडल दिलाने वाला ये हीरो गुमनाम बन कर ही रह गया।

पी. टी. उषा (फाइल फोटो)

पी. टी. उषा (फाइल फोटो)

भारत की शान, उड़न परी पी टी उषा ने 101 अंतर्राष्ट्रीय पदक जीते हैं और वो एशिया की सर्वश्रेष्ठ महिला एथलीट मानी जाती हैं। 1980 में उषा ने मास्को ओलम्पिक में भाग लिया लेकिन पहली बार में वो ज्यादा सफल नहीं हो पायीं। ये पहला ओलम्पिक उनके लिए कुछ खास नहीं रहा। लेकिन कोच ओ ऍम नम्बियार ने भी हार नहीं मानी और उषा को और निखारने का काम शुरू कर दिया। 1982 में फिर से उषा ओलम्पिक में भारत की ओर से खेलीं और इस बार उषा ने हर भारतीय का मस्तक गर्व से ऊँचा कर दिया। अपने चमत्कारी प्रदर्शन की बदौलत उषा ने 100 मीटर और 200 मीटर की दौड़ में स्वर्ण पदक जीते। इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर उषा ने कई बार अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन को कई बार दोहराया।

मैरी कॉम

मैरी कॉम

मैरी कॉम एक ऐसी भारतीय महिला, जो किसी परिचय की मोहताज़ नहीं है। जिसने यह साबित कर दिया कि अगर आप के अन्दर कुछ करने का जज्बा है तो सफलता हर हाल में आपके कदम चूमती है। इन्ही कदमों पर चलकर एक गरीब किसान की बेटी ने महिला मुक्केबाजी की दुनिया में भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में धूम मचा दी। पांच बार विश्व मुक्केबाजी प्रतियोगिता की विजेता रह चुकी मैरी कॉम अकेली ऐसी महिला मुक्केबाज़ हैं जिन्होंने अपनी सभी 6 विश्व प्रतियोगिताओं में पदक जीता है। 2014 के एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीत कर वह ऐसा करने वाली पहली भारतीय महिला मुक्केबाज़ बनीं। महिला विश्व मुक्केबाजी चैम्पियनशिप में भी उन्होंने 5 स्वर्ण और एक रजत पदक जीता है। एशियाई खेलों में मैरी ने 2 रजत और 1 स्वर्ण पदक जीता है। 2012 के लन्दन ओलंपिक्स में कांस्य पदक जीत कर उन्होंने देश का नाम ऊंचा किया।

दीपा कर्माकर

दीपा कर्माकर

दीपा कर्माकर ने रियो ओलंपिक मनें अपने प्रदर्शन से करोड़ों भारतीयों का दिल जीत लिया। दीपा जिमनास्टिक के फाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला बनी। दीपा ने वॉल्ट में बेहद कठिन माने जाने वाले प्रोदुनोवा को सफलतापूर्वक अंजाम दिया और रियो-2016 में ऐसा करने वाली वह एकमात्र जिम्नास्ट रहीं।

भारतीय महिला क्रिकेट टीम (फाइल फोटो)

भारतीय महिला क्रिकेट टीम (फाइल फोटो)

भारत की महिला क्रिकेट टीम जो कभी भी पुरुषों के क्रिकेट की तरह फ्रंटफुट पर नहीं रही, आज पूरी दुनिया में उनकी चर्चा हो रही है। विश्वकप 2017 में महिला क्रिकेट टीम ने फाइनल तक का सफर तय किया और पूरी दुनिया में अपने खेल का लोहा मनवाया। इससे पहले कभी संसाधनों की कमी तो कभी क्रिकेट बोर्ड के दोहरे रवैये की वजह से देश की बेटियां हमेशा बैकफुट पर खेलने को मजबूर रहती थी। पूरी भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने अपने प्रदर्शन के दम पर न सिर्फ लोगों के दिल में बल्कि उनके दिमाग में भी जगह बनाई। महिला विश्वकप ने भारतीय महिला क्रिकेट को नई पहचान दी है।

पीवी सिंधु (फाइल फोटो)

पीवी सिंधु (फाइल फोटो)

पांच जुलाई 1995 को तेलंगाना में जन्मी पांच फुट साढ़े 10 इंच लम्बी पीवी सिंधु तब सुर्खियों में आई जब उन्होंने साल 2013 में ग्वांग्झू चीन में आयोजित विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता। साल 2013 में ही उन्होंने मलेशिया ओपन और मकाऊ ओपन का ख़िताब जीता। सिंधू ने रियो ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीत कर इतिहास रच दिया और भारत का नाम पूरे विश्व में गौरवांवित किया।

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