क्या तीन तलाक की बहस मुस्लिम महिलाओं को बराबरी का दर्ज़ा और न्याय दिला पाएगी

By   |  Updated On : May 20, 2017 01:40 PM

नई दिल्ली :  

भूखे बच्चों के लिए शाज़िया ने अपने पति से 20 रूपए मांगे तो बदले में उसे तलाक मिला। अपने उन रोते हुए दो बच्चों, चार साल की कहकशां और आठ महीने की आयशा को चुप कराने के लिए उसने शौहर से पैसे मांगे पर बदले में पति ने उसे तलाक दे दिया। आयशा को गोद में लिए शाज़िया के आंसू अब थम नहीं रहे आने वाले कल की सोच कर वो परेशान है कि दो बच्चों के साथ कहां जाए और कौन देगा उसे सहारा।

शाजिया के दर्द की ये अकेली दास्तां नहीं है, ऐसी कई अनगिनत दास्तां है जो तीन तलाक के अंधेरे में अपना भविष्य तलाश रही है। शाजिया जैसी ऐसी कई मुस्लिम महिलाएं हैं जिनके मन में अपनी ग़रीबी के साथ साथ अब सवाल उस तलाक -उल -बिद्दत पर भी है जो एकतरफा तलाक का हक सिर्फ पुरूषों को देती है।

हलांकि तीन तलाक एक ऐसा सवाल है जो कई महिलाओं के लबों तक आकर रुक गया तो कईयों ने इसे मुखर होकर उठाया। लेकिन इन सवालों और विरोधों को ताक़त मिल गई जब उन्हें मिला सरकार का साथ। एक याचिका के ज़रिए जब इसे सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया गया तो और कई सवाल खुलकर पूछे जाने लगे। मसलन जब बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे इस्लामिक देशों में तलाक उल बिद्दत बैन है तो दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश भारत में क्या महज़ धर्म के नाम इसकी आज़ादी क्यों दी जानी चाहिए।

सवाल उठने लगे तो ये सवाल भी उठा कि पुरूषों को क्यों ये आज़ादी दी जानी चाहिए कि वो एक भरोसे के रिश्ते को तीन बार तलाक बोलकर खत्म कर दें। क्यों मुस्लिम महिलाओं को इस डर के साथ जीना पड़े कि ना जाने कब ये तीन शब्द उनकी ज़िंदगी में भूचाल ला दें।

इन सवालों की बेचैनी को केंद्र की मोदी सरकार ने भांपा और सुप्रीम कोर्ट ने पांच जजों की संवैधानिक बेंच बनाकर गर्मियों के बावजूद लगातार 6 दिनों तक सुनवाई की। हालांकि इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक तो नहीं लोकिन सवालों के घेरे में ला दिया था। अब इसके पक्ष और विपक्ष के तमाम तर्कों के बीच मुस्लिम समाज सवाल उठाता है कि महिलाओं की भलाई के नाम पर क्या सिर्फ उनके पर्सनेल लॉ और धर्म के मामलों में न्यायपालिका को दखल देना चाहिए?

हालांकि इसके तर्क में ये सवाल भी उठ रहा है कि क्या धर्म के नाम पर महिलाओं के मानवाधिकार का हनन होना चाहिए? सम्मान के साथ जीने के उनके हक़ के बचाव के लिए क्या कानून को आगे नहीं आना चाहिए? शरीयत के नाम पर सिर्फ भारत में ये एकतरफा फैसले क्यों होने चाहिए जब पाकिस्तान और बांग्लादेश में ये 1961 से बैन है।

ट्यूनिशिया, अलजिरीया जैसे देशों में विवाह विच्छेद जैसे फैसले कोर्ट में ही किए जा सकते हैं। फिर भारत में क्यों मुस्लिम महिलाओं के साथ ये भेदभाव जब यहां मुस्लिम महिलाओं के हालात देखें तो 2011 के सेंसस के मुताबिक 13.59 महिलाओं का निकाह 15 साल की उम्र से पहले हो जाता है और 49 फीसदी की शादी 14 से 19 साल के भीतर हो जाती है। इस उम्र में शादी होने के बाद ज़ाहिर सी बात है वो उच्च शिक्षा से महरूम रह जाती है और आर्थिक रूप से सक्षम होने की संभावनाएं भी ख़त्म हो जाती हैं और इस हालात में अगर बच्चे भी हों जाए तो? तलाक हो जाए तो सर पर छत भी नहीं होती और सहारा भी नहीं होता

ये एक अंतर्द्वंद था जिससे होकर कई मुस्लिम महिलाएं गुज़र रही थीं। इस सवाल का सामना एक ना एक दिन देश को करना ही था और मई 2016 में तीन तलाक को खत्म करने की याचिका डाल कर रहमान ने इसे राजनीति के पाले से उठा कर कोर्ट के पाले में डाल दिया।

हालांकि कानूनी रूप से इसे सुलझाना अब भी बड़ा पेचीदा है और रोज़ दर रोज़ की सुनवाईयों के दौरान ये बात सामने आ भी रही हैं। जहां संविधान में क़ानून के सामने आर्टिकल 14 के ज़रिए बुनियादी अधिकार की बात है तो आर्टिकल 21 के ज़रिए मानवीय प्रतिष्ठा के साथ जीने का अधिकार है तो वहीं आर्टिकल 25 के हिसाब से धर्म को मानने, अभ्यास करने और उसका प्रसार करने की भी आज़ादी है। इसी का हवाला देकर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपना तर्क दे रहा है और इसे अपने धर्म के मामले में हस्तक्षेप मान रहा है।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जिस तरह से अलग-अलग तर्क दे रहा है उस पर भी सवाल है। पिछले साल AIMPLB ने कहा कि कि शरीया सिर्फ पुरूषों को तलाक का अधिकार देता है क्योंकि पुरूष सही फैसले लेते हैं ज़ाहिर सी बात ये ये एक पुरूषवादी मानसिकता की बात थी। इस समय वो ये कह रहा है कि निकहनामें में ये शामिल किया जा सकता है कि महिला तीन तलाक को स्वीकार करे या ना करे। अब उसके ही पक्ष को कमज़ोर करता है। पर सवाल सरकार के पक्ष पर भी है। जिसमें कहा गया कि तीन तलाक की जगह कोई नया क़ानून लाया जा सकता है। ऐसे वक्त पर सबसे ज़्यादा ज़रूरत अगर लग रही है तो भरोसा कायम कर बात करने की और इस मसले का हल निकालने की। जो ना सिर्फ महिलाओं को गरिमा से जीने का अधिकार दिलाए, बल्कि भेदभाव करने वाले तमाम कानूनों में बदलाव का रास्ता खोले।

जिस तरह से तमाम बीजेपी शासित राज्यों में कानून बना कर गौ हत्या बैन और खाने पीने तक की चीज़ों पर बैन लगाया जा रहा है, लोगों के अधिकारों के दायरे को संकुचित किया जा रहा है। उस वक्त निगाहें इस बात पर टिकी हैं क्या ये फैसला नज़ीर बनेगा? क्या एक ऐसा फैसला आएगा जो आगे की राह खोलेगा? या ये हल ही बंटे समाज में भरोसे की खाई चौड़ी करेगा?

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं

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