सुप्रीम कोर्ट ने किया अमरनाथ मठ और वैष्णो देवी पर एनजीटी का आदेश खारिज

  |   Updated On : April 16, 2018 08:42 PM

नई दिल्ली:  

 सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को जम्मू एवं कश्मीर स्थित अमरनाथ मठ को शांत क्षेत्र घोषित करने के राष्ट्रीय हरित अभिकरण (एनजीटी) के आदेश को निष्प्रभावी कर दिया।

न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर और दीपक गुप्ता की पीठ ने अमरनाथ श्राइन बोर्ड की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए एनजीटी के 13 दिसंबर के आदेश पर रोक लगा दी। बोर्ड ने एनजीटी के आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी कि मामले में फैसला पक्षकारों की दलील के इतर आधार पर नहीं हो सकती है। 

अमरनाथ गुफा मठ हिंदुओं का पवित्र तीर्थ स्थल है। ग्रीष्म ऋतु में थोड़े ही दिनों को छोड़ बाकी पूरे साल गुफा बर्फ से ढकी रहती है। इन्हीं थोड़े ही दिनों के लिए इसे तीर्थयात्रा के लिए खोला जाता है। 

अमरनाथ श्राइन बोर्ड की तरफ से अदालत में पेश हुए वरिष्ठ एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने पीठ को बताया कि जम्मू में वैष्णो देवी श्राइन परिसर में घोड़ों और टट्टुओं के उपयोग पर रोक लगाने से संबंधित याचिका पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने अमरनाथ मसले को खुद ग्रहण किया था। 

पीठ ने याचिकाकर्ता व पर्यावरण कार्यकर्ता गौरी मुलेखी को अमरनाथ श्राइन से संबंधित मसले पर सही याचिका दाखिल करने को कहा। 

सुनवाई के दौरान रोहतगी ने पीठ को बताया कि एनजीटी ने प्रसिद्ध गुफा के आसपास के क्षेत्र में घंटा बजाने, प्रसाद बांटने और मंत्रोच्चार करने या जयभोलेनाथ के जयकारे लगाने पर रोक लगा दी थी। 

यह सुनकर पीठ ने परिहास करते हुए सवाल किया, ' यह (एनजीटी) क्या कहना चाहता है?'

रोहतगी ने आगे कहा, 'वे आपसे कैसे कह सकते हैं कि आप प्रसाद नहीं ले सकते हैं? लोगों की धार्मिक भावनाएं हैं।'

एनजीटी ने 13 दिसंबर को गुफा श्राइन को शांत क्षेत्र घोषित कर दिया था और हिमस्खलन रोकने और उसकी नैसर्गिकता को बनाए रखने के लिए प्रवेश द्वार के भीतर धार्मिक चढ़ावे पर रोक लगा दी थी। 

विश्व हिंदू परिषद द्वारा इसे तुगलकी फतवा बताते हुए विरोध प्रदर्शन करने पर एक दिन बाद एनजीटी ने स्पष्ट किया कि इसने अमरनाथ मठ गुफा को शांत क्षेत्र घोषित नहीं किया है बल्कि सिर्फ शिवलिंग के सामने शांति बनाए रखने की जरूरत है। 

शीर्ष अदालत ने एनजीटी के एक और आदेश को स्थगित कर दिया जिसमें अभिकरण ने कटरा से वैष्णो देवी मंदिर तक घोड़ों और टट्टओं के पुनर्वास को अंतिम रूप प्रदान नहीं करने पर जम्मू एवं कश्मीर सरकार पर 50 लाख रुपये की लागत थोपने का आदेश दिया था। 

शीर्ष अदालत को सोमवार को सूचित किया गया कि पुनर्वास की स्कीम को अंतिम रूप दे दिया गया है और प्रदेश मंत्रिमंडल के सामने इसे मंजूरी के लिए पेश किया जाएगा।

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