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राष्ट्रपति चुनाव 2017: भारत के इकलौते निर्विरोध राष्ट्रपति हैं नीलम संजीव रेड्डी, जानिए उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें

By   |  Updated On : June 20, 2017 09:55 PM
नीलम संजीव रेड्डी (फाइल फोटो)

नीलम संजीव रेड्डी (फाइल फोटो)

नई दिल्ली:  

नीलम संजीव रेड्डी भारत के छठे और सबसे युवा राष्ट्रपति थे।  इन्होंने 25 जुलाई 1977 से राष्ट्रपति पद को संभाला था।  रेड्डी अब तक के इकलौते राष्ट्रपति हैं जो निर्विरोध निर्वाचित हुए थे।

नीलम संजीव रेड्डी ने दो बार राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा था। पहली बार में उन्हें वी वी गिरी से हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन दूसरी बार उम्मीदवार बनाए जाने पर वो निर्विरोध राष्ट्रपति निर्वाचित हुए।

इनका जन्म 19 मई 1913 को अनंतपुर जिले, आंध्रप्रदेश के एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। नीलम संजीव रेड्डी का निधन निमोनिया के कारण 1 जून 1996 में हो गया था।

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आइये जानते है नीलम संजीव रेड्डी जुड़ी खास बातें

1. नीलम संजीव रेड्डी 15 साल में ही भारत की आजादी की जंग से जुड़े आंदोलनों का हिस्सा बन गए थे। दरअसल 1929 में महात्मा गांधी के साथ मुलाकात के दौरान इनका नजरिया ही बदल गया था।

2. 1938 से दस साल के लिए आंध्र प्रदेश प्रांतीय कांग्रेस समिति का सचिव रहे। साल 1940 से 1945 के बीच भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान जेल में रहे। जहां इनकी मुलाकात टी. प्रकाश, एस. सत्यमूर्ति, के. कामराज और वी. वी. गिरी के साथ हुई।

3. जेल से रिहा होने के बाद यह कांग्रेस के साथ जुड़ गए। 1946 में पहली बार विधायक बने। इसी साल वह कांग्रेस के सचिव भी बने, साथ ही भारतीय संविधान सभा का सदस्य भी बने। अप्रैल 1949 से अप्रैल 1951 तक वो मद्रास राज्य में आवास, वन और निषेध मंत्री रहे।

4. 1951 में मंत्री पद से इस्तीफा देकर आंध्र प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष पद के चुनाव लड़े और जीता। 1952 में इन्हें राज्य सभा के सदस्य बनाए गए। लेकिन 1953 में इस्तीफा देकर टी. प्रकाशम की कैबिनेट में उपमुख्यमंत्री बने।

5. 1955 में दोबारा विधायक बने। इसी समय आंध्र और तेलंगाना को जोड़कर आंध्र प्रदेश की स्थापना की हुई थी। नीलम संजीव रेड्डी आंध्र प्रदेश के 'प्रथम मुख्यमंत्री' बने। तब इनकी उम्र 43 वर्ष थी और यह भारत के सबसे युवा मुख्यमंत्री थे।

6. इसी साल अखिल भारतीय कांग्रेस के अध्यक्ष को संभालने के लिए इन्होंने मुख्यमंत्री पद से भी इस्तीफा दे दिया था। 1962 में अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर फिर से आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

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7. नीलम संजीव रेड्डी अपने उसूलों के पक्के माने जाते थे। आंध्र प्रदेश में सड़कों का राष्ट्रीयकरण किया गया था, जिसकी सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा था। इस कारण रेड्डी ने मुख्यमंत्री बने रहना उचित नहीं समझा। 1964 में इन्होंने स्वेच्छा से मुख्यमंत्री का पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद इन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखा।

8. साल 1964 से 1967 तक राज्यसभा के लिए मनोतीत हुए। इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी के साथ काम किया। इन्होंने स्टील एवं खान मंत्रालय, यातायात, जहाजरानी, नागरिक उड्डयन एवं टूरिज्म मंत्रालय संभाले।

9. 1967 में आंध्र प्रदेश की हिन्दपुर से लोकसभा का चुनाव जीतकर सांसद बने। इन्हें लोकसभा का स्पीकर भी चुना गया। हांलाकि कांग्रेस की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनाए जाने के बाद 1969 में इन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया था।

10.1969 में पहली बार राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवारी ने कांग्रेस को दो भागों में बांट दिया था। इंदिरा गांधी ने उनके खिलाफ वी वी गिरी को उतार दिया था। इस चुनाव में हारने के बाद इन्होंने राजनीति से दूरी बना ली थी। हालांकि 1977 में ने जयप्रकाश नारायण के एक बार फिर वापसी की।

11. इसी साल यह जनता पार्टी की कार्य समिति के सदस्य बने और आंध्र प्रदेश के नंड्याल से लोकसभा का चुनाव जीता। यह अकेले गैर कांग्रेसी उम्मीदवार जो आंध्र-प्रदेश से जीते थे। एक बार फिर लोकसभा के स्पीकर चुने गए थे। हालांकि जुलाई में उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया ता।

12. नीलम संजीव रेड्डी को एक बार फिर से राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाया गया। हालांकि इस बार इन्होंने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि यदि उन्हें सर्वसम्मति से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाता है तभी वह नामांकन पत्र दाखिल करेंगे।

13. इस साल के राष्ट्रपति चुनाव में 37 उम्मीदवारों ने पर्चे दाखिल किए थे। लेकिन जांच में रिटर्निंग अधिकारी ने नीलम संजीव रेड्डी के अलावा सभी 36 लोगों के पर्चे रद कर दिए। इस तरह यह निर्विरोध चुने गए।

14. राष्ट्रपति शासन के दौरान नीलम संजीव रेड्डी ने मोरारजी देसाई, चरण सिंह और इंदिरा गांधी की सरकार के साथ काम किया। इनका कार्यकाल 1982 में पूरा हुआ, जिसके बाद जैल सिंह ने राष्ट्रपति का पद संभाला।

नीलम संजीव रेड्डी ने कम उम्र में ही कई महत्वपूर्ण राजनीतिक पदों की जिम्मेदारी को संभाला है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर राजनीति से संन्यास लेकर वापस आकर राष्ट्रपति तक इन्होंने उसकी गरिमा का सदैव पालन किया।

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