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नोटबंदी के 1 साल: लोगों को उठानी पड़ी 'जबरदस्त परेशानी'-सर्वे

  |  Updated On : November 08, 2017 12:25 AM

ख़ास बातें
  •  नोटबंदी के कारण 63 फीसदी प्रतिभागियों ने उठाई 'गंभीर परेशानियां'
  •  20 फीसदी लोगों का मानना नोटबंदी से आम आदमी को फायदा

नई दिल्ली:  

नोटबंदी की पहली वर्षगांठ से पहले मंगलवार को जारी एक सर्वे के मुताबिक सरकार के इस अचानक लिए गए फैसले से करीब 63 फीसदी प्रतिभागियों ने 'गंभीर परेशानियां' उठाई।

वहीं 65 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्होंने नोटबंदी के कारण शादियां स्थगित होते देखीं। 'अनहद' समेत 32 अन्य नागरिक संगठनों के इस सर्वेक्षण में उन लोगों के नाम भी शामिल हैं, जिन्होंने इस कारण अपना जान गंवाई।

इस सर्वे में ज्यादातर प्रतिभागियों (55 फीसदी बनाम 26.6 फीसदी) ने इस बात से असहमति जताई कि इस कदम से काला धन हमेशा के लिए मिट सकता है। इसके साथ ही 48.2 फीसदी लोगों ने इस पर भरोसा नहीं किया कि नोटबंदी के कारण आंतकवादियों के वित्त पोषण में किसी प्रकार की कमी आई है। 20 फीसदी लोगों का यह मानना था कि इस कदम से आम आदमी को फायदा होगा।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली में 71.8 फीसदी प्रतिभागियों ने कहा कि उन्होंने लोगों को नोटबंदी के कारण 'भारी परेशानी' का सामना करते देखा। यहां तक कि गंभीर रूप से बीमार मरीजों को इलाज नहीं मिल रहा था, क्योंकि वे 'नोटबंदी' के बाद नई मुद्रा में भुगतान करने में असमर्थ थे।

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सर्वेक्षण में शामिल 50 फीसदी लोगों ने कहा कि उनके जानने वालों में से किसी ना किसी की नौकरी नोटबंदी की वजह से चली गई।

65 फीसदी प्रतिभागियों का कहना था कि उन्होंने किसी नेता या अमीर आदमी को किसी बैंक की लाइन में या एटीएम की लाइन में खड़े नहीं देखा। उनका कहना था कि उन्हें ऐसा नहीं लगा कि नोटबंदी के कारण अमीरों को कोई परेशानी हुई हो।

सर्वे में 96 प्रश्न शामिल किए गए थे और यह 2016 के दिसंबर से 2017 के जनवरी के बीच 21 प्रमुख राज्यों में किया गया, जिसमें दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल शामिल हैं।

सर्वेक्षण के इन नतीजों को सामाजिक कार्यकर्ता जॉन दयाल, गौहर रजा, पी.वी.एस. कुमार और सुबोध मोहंते ने नोटबंदी के एक वर्ष पूरे होने के मौके पर मंगलवार को जारी किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल 8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा की थी।

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वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक और इस रिपोर्ट के लेखकों में से एक गौहर रजा ने कहा, 'इन आंकड़ों को 2016 के दिसंबर और 2017 के जनवरी के बीच संग्रहित किया गया था, जब लोगों की भावनाएं नियंत्रित मीडिया चैनलों की बमबारी से अत्यधिक प्रभावित थीं।'

रजा ने कहा, 'झूठी कहानी रचकर लोगों को जमीनी सच्चाई से काटने की हर संभव कोशिश के बावजूद उन शुरुआती दिनों में एकत्र किए गए आंकड़े भी काफी कुछ कहानी बयान करते हैं। अगर यह सर्वे अभी किया जाता है तो परिणाम में इसकी भयंकर भर्त्सना देखने को मिलेगी।'

इस रिपोर्ट में उन 90 लोगों की सूची दी गई है जो बैंक की लाइन में या नोटबंदी से जुड़े अन्य कारणों से मारे गए।

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उदाहरण के लिए जम्मू के सांबा जिले के दूंगा गाव का 8 वर्षीय बच्चे की तब मौत हो गई, जब नोटबंदी के कारण उसके पिता नए नोट नहीं होने के कारण उसका इलाज नहीं करवा पाए। 'ग्रेटर कश्मीर' अखबार के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया कि अपने बच्चे को 50 किलोमीटर दूर के अस्पताल में पैदल चलकर ले जाने से पहले उसने लगातार तीन दिनों तक 29,000 रुपये के पुराने नोट जमा कर नए नोट लेने की कोशिश की थी।

इसी प्रकार 50 वर्षीय बाबूलाल की मौत अलीगढ़ में तब हार्ट अटैक से हो गई, जब वे अपने परिवार में शादी के लिए समय पर नोट नहीं बदलवा सके। इसी प्रकार की कई अन्य दिल दहलानेवाली कहानियां नोटबंदी से जुड़ी हैं।

सीएसआईआर के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक और रिपोर्ट के लेखकों में से एक पी. वी. एस. कुमार ने कहा कि यह सूची अभी अधूरी है। अभी तक हमें नोटबंदी के शिकार पीड़ितों की सही संख्या की जानकारी नहीं है।

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