आजादी के 70 साल: 'हिंदू ग्रोथ रेट' से 'इकनॉमिक सुपरपावर' की यात्रा

  |  Updated On : August 13, 2017 08:45 PM

नई दिल्ली:  

2017 का भारत दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था है। जी-20 समूह की बड़ी अर्थव्यवस्था में शुमार होने के साथ-साथ 2008 की मंदी के बाद से वैश्विक अर्थव्यवस्था का ड्राइवर बना हुआ है।

विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) समेत अन्य बड़ी रेटिंग एजेंसियों के लिए भारत निवेश के लिहाज से न केवल शानदार देश है बल्कि वैश्वीकरण के दौर में यह आज वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए उम्मीद की किरण है।

हालांकि आज से कुछ दशक पहले तक भारत की स्थिति कर्ज में डूबे वैसे देश की थी, जो दिवालिया होने के कगार पर था। उसके पास अपनी जरूरतों के सामान की खरीदारी के लिए अपना सोना तक गिरवी रखना पड़ा था।

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आजादी मिलने के बाद देश की अर्थव्यवस्था के लिए 'हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ' का इस्तेमाल किया जाता था, जिसका मतलब बेहद कमजोर ग्रोथ रेट से था। देश की कमजोर अर्थव्यवस्था का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 1950 से 1980 के दशक के बीच देश की ग्रोथ रेट करीब 3.5 फीसदी रही, वहीं 1947 में देश में प्रति व्यक्ति आय करीब 250 रुपये थी। 70 सालों के बदलाव को इन तुलनात्मक आंकड़ों से समझा जा सकता है।

पिछले वित्त वर्ष में भारत के जीडीपी की दर 7.1 फीसदी रही। हालांकि 2015-16 के 8 फीसदी के मुकाबले जीडीपी ग्रोथ रेट में कमी आई, लेकिन भारत पिछले दो दशक के बीच वैश्विक मंदी के बीच औसतन 7 फीसदी की ग्रोथ रेट बनाए रखने में सफल रहा।

आजादी के तत्काल बाद देश की प्रति व्यक्ति आय महज 250 रुपये थी जो 2016-17 में बढ़कर 1,03, 219 रुपये हो गई। 2015-16 से 2016-17 के बीच देश में प्रति व्यक्ति आय में करीब 10 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।

1950-80 के बीच देश में प्रति व्यक्ति आय के बढ़ने की औसत दर 1.3 फीसदी रही जबकि 2015-16 के बीच यह दर 7.4 फीसदी रही। 1947 का भारत 2017 में वैश्कि महाशक्ति बनने की आकांक्षा रखने वाला देश है। हालांकि वैश्विक मंच पर आज के भारत की मजबूत दखल इन पांच अहम सुधारों के बिना कमजोर और खोखली होती, जिस पर अगले कई दशकों के विकास की बुनियाद टिकी हुई है।

1.बैंकों का राष्ट्रीयकरण
देश की बड़ी गरीब आबादी का बैंकिंग दायरे से बाहर होना और बैंकों में जमा धन का कुछ सीमित हाथों में हो रहा इस्तेमाल तत्कालीन भारत की विकास में सबसे बड़ी बाधा थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बड़ा फैसला लेते हुए 14 बैंकों के राष्ट्रीयकरण का फैसला लिया।

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बैंकिंग सेक्टर के राष्ट्रीयकरण से बैंकिंग दायरे में विस्तार हुआ और कर्ज वितरण पर एकाधिकार की स्थिति खत्म हुई, जिससे देश की आर्थिक गतिविधियों को तेजी मिली। बैंकिंग सेक्टर के राष्ट्रीयकरण की वजह से देश के वित्त पर सार्वजनिक बैंकों की पकड़ मजबूद हुई, जिसने बड़े इंफ्रा प्रोजेक्ट्स की फंडिंग की राह को आसान किया।

2. आर्थिक उदारीकरण
बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद देश की अर्थव्यवस्था को सबसे बड़ी ताकत आर्थिक उदारीकरण से मिली। 1990 तक भारत की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत बंद थी और अधिकांश क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्र का दबदबा था।
उदारीकरण ने न केवल बाजार आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया, बल्कि इसने देश की अर्थव्यवस्था में निजी और विदेशी निवेश के आने का रास्ता खोला। उदारीकरण के इस पहलू की अहमियत को इस बात से समझा जा सकता है कि आज भारत के विकास में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की भूमिका सबसे बड़ी है और 2017 में भारत को 60.1 अरब डॉलर की एफडीआई मिली।

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एफडीआई निवेश के लिहाज से भारत आज विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है। उदारीकरण के दम पर 1990 से 2000 के बीच भारत की ग्रोथ रेट जबरदस्त रही। कहा जा सकता है कि आज के आर्थिक विकास की बुनियाद 1990 के फैसले पर टिकी है।

3.उदारीकरण ने ही देश में लाइसेंस राज को खत्म करने का काम किया। भारत में 1947 से 1990 के बीच सरकारी नियंत्रण हावी रही, जिसे लाइसेंस राज के नाम से जाना जाता है। लाइसेंस राज अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करती थी, जिससे कुछ लोगों को ही प्रॉडक्शन का लाइसेंस मिलता था। इस दौरान कोई कारोबार करने के लिए करीब 100 सरकारी एजेंसियों से लाइसेंस लेना प़ड़ता था, जो भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता था। लाइसेंस राज आंत्रप्रेन्योरशिप की राह में सबसे बड़ी बाधा थी।

लाइसेंस राज के खात्मे ने देश की अर्थव्यवस्था के आधार को मजबूत किया और इसने निजी क्षेत्र की भागीदारी का रास्ता खोला, जो मौजूदा समय में भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बना हुआ है। लाइसेंस राज का खात्मा दशकों पुरानी नियोजित अर्थव्यवस्था के मुकाबले मुक्त अर्थव्यवस्था की तरफ जाने का आधिकारिक ऐलान था, जिसमें अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों को राज्य नियंत्रित करता था और प्रोडक्शन के लिए कुछ लोगों को ही लाइसेंस दिया जाता था।

4. विभिन्न सेक्टर में एफडीआई की मंजूरी
1990 में जिस उदारीकरण की शुरुआत की गई थी, उसे एक कदम आगे बढ़ाते हुए सरकार ने कई अहम क्षेत्रों में 100 फीसदी एफडीआई की मंजूरी दी। हालांकि अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में एक समान एफडीआई की मंजूरी नहीं दी गई है। हालांकि कृषि और पशुपालन, बागबानी, माइनिंग, पेट्रोलियम और नैचुरल गैस में ऑटोमेटिक रुट से 100 फीसदी एफडीआई की मंजूरी दी गई है।वहीं डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में ऑटोमेटिक रुट के जरिये 49 फीसदी जबकि बाकी 49 फीसदी गवर्मेंट रुट से होगा।

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ब्रॉडकास्ट में 100 फीसदी एफडीआई, सिविल एविएशन और टेलीकॉम के सा ई-कॉमर्स, सिंगल ब्रांड रिटेल, नॉन बैकिंग वित्तीय कंपनियों और रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर में 100 फीसदी एफडीआई की मंजूरी से न केवल इन क्षेत्रों का विस्तार हुआ है, बल्कि देश में आधुनिक तकनीक भी आई है। विदेश निवेश से देश के बैलेंस ऑफ पेमेंट में मदद मिलने के साथ ही डॉलर के मुकाबले रुपये में मजबूती आती है। भारत की अर्थव्यवस्था और अधिक पारदर्शी और सक्षम बनाने का सिलसिला अभी भी थमा नहीं है। पिछले एक साल के दौरान देश में तीन अहम सुधारों को लागू किया गया, जिसे राजनीतिक जटिलताओं और प्रतिबद्धताओं की वजह से लागू नहीं किया जा सका।

5.2016 में नोटबंदी के फैसले से न केवल ब्लैक मनी को नियंत्रित करने में मदद मिली बल्कि बैंकिंग व्यवस्था में नकदी वापस आई। नोटबंदी के तहत सरकार ने 8 नवंबर 2016 को 500 और 1000 रुपये के नोटों को बैन कर दिया था।

नोटबंदी के बड़े फैसले के बाद पिछले कई दशकों से लंबित पड़े आर्थिक सुधार को 2017 में अमली जामा पहनाया। देश में 1 जुलाई 2017 से गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) को लागू किया जा चुका है, जिसने कुल 16 अप्रत्यक्ष करों की जगह ली है। जीएसटी के लागू होने के बाद देश की अर्थव्यवस्था पहले के मुकाबले एकीकृत हो चुकी है, जहां पर केवल एक तरह का कर देना होगा।

इसके साथ ही भारत दुनिया की उन अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हो गया है, जहां एक देश एक बाजार और एक कर की व्यवस्था लागू है।

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