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Flashback: जब 'न्यू दिल्ली टाईम्स' के संपादक विकास पांडे को मिला पहला नेशनल अवॉर्ड

  |  Updated On : December 08, 2017 07:02 AM
जब 'न्यू दिल्ली टाईम्स' के संपादक को मिला नेशनल अवॉर्ड

जब 'न्यू दिल्ली टाईम्स' के संपादक को मिला नेशनल अवॉर्ड

ख़ास बातें
  •  फिल्म की शूटिंग के बीच में ही उनकी बीवी जेनिफर की मौत हो जाना, दो-दो कोर्ट केस और बेहद ही कम बजट, शशि कपूर के लिए इस फिल्म में काम करना कोई आसान काम नहीं था
  •  फिल्म रिलीज हुई तो नेशनल अवॉर्ड के रूप में उनकी मेहनत वसूल हो गई, इस फिल्म को तीन-तीन नेशनल अवॉर्ड मिले थे। लेकिन फिल्म की शुरुआत में इससे नाखुश थे

नई दिल्ली:  

बॉलीवुड के दिवंगत दिग्गज अभिनेता शाशि कपूर ने सोमवार को अंतिम सांस लेकर हमेशा के लिए अपनी आंखे बंद ली। उनके निधन पर न सिर्फ भारत, बल्कि पाकिस्तान में लोगों ने श्रद्धांजलि अर्पित की।

पाकिस्तान के ऐतिहासिक कैसर खवानी बाजार के करीब स्थित शशि कपूर के पैतृक घर के बाहर उनके फैंस की श्रद्धांजलि के मौके पर आंखें नम थी।

बॉलीवुड और हॉलीवुड का फिल्मी सफर तय करने वाले शशि कपूर भले ही अब हमारे बीच में नहीं हो, लेकिन अपनी बेहतरीन अदाकारी और भारतीय सिनेमा में अपने योगदान के लिए वह हमेशा याद किये जाएंगे।

आज हम उनकी फिल्मों में सबसे अहम और उनके दिल के करीब मानी जाने वाली फिल्म के बारे में बताने जा रहे हैं। इस फिल्म से उनकी नेशनल अवॉर्ड पाने की अदद तलाश पूरी हुई थी। क्योंकि इंडस्ट्री में 36 साल के करियर में 85 से भी ज्यादा फिल्में करने के बावजूद उन्हें एक्टिंग के लिए कोई भी नेशनल अवॉर्ड नहीं मिला था।

जी हां, हम बात कर रहे हैं 'न्यू दिल्ली टाइम्स' की इस फिल्म ने शशि कपूर को उनको पहला नेशनल अवॉर्ड दिलवाया था। इस फिल्म में शशि कपूर एक अखबार के संपादक बने थे, जिनका नाम विकास पांडे था।

यूपी के गाजीपुर में एक स्थानीय एमएलए की हत्या के केस की जांच करते समय विकास पांडे एक दूसरे विधायक ओम पुरी के पीछे पड़ जाते हैं, जो कई तरह के गलत धंधों में लिप्त था। उसके हाथ में कई विधायक थे, जो लगातार सीएम की कुर्सी हिलाने के धमकी देता था। फिल्म में अजय उर्फ ओम पुरी और मुख्यमंत्री त्रिवेदी में कुर्सी को लेकर राजनीति अपनी चरम पर होती है।

अजय इसे पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखता है। खैर, फिल्म का सस्पेंस बेहद शानदार था, आखिर में पता चलता है कि जिसे निर्दोष समझकर शशि मदद कर रहा था, सारी साजिश उसी की थी और वो अपने हितों को साधने के लिए उस सम्पादक का इस्तेमाल कर रहा था।

बहरहाल, जब फिल्म रिलीज हुई तो नेशनल अवॉर्ड के रूप में उनकी मेहनत वसूल हो गई। इस फिल्म को तीन-तीन नेशनल अवॉर्ड मिले थे। लेकिन फिल्म के शुरुआत में इससे नाखुश थे।

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फिल्म अलग-अलग वजहों से सालों लटकी रही। फिल्म की शूटिंग के बीच में ही उनकी बीवी जेनिफर की मौत हो जाना दो-दो कोर्ट केस और बेहद ही कम बजट। शशि कपूर के लिए इस फिल्म में काम करना कोई आसान काम नहीं था।

 गौरतलब है कि शशि ने जब जब फूल खिले, सत्यम शिवम सुंदरम, दीवार, हसीना मान जाएगी,सुहाग, आवारा, क्रांति, वक्त, नींद हमारी ख्वाव तुम्हारे, बॉम्बे टॉकीज, शर्मीली, आ गले लग जा, रोटी कपड़ा और मकान, कभी कभी, फकीरा, त्रिशूल, ना जाने कितनी सुपरहिट और कई अंग्रेजी फिल्में की। लेकिन इनके बावजूद जब शशि कपूर को कोई नेशनल अवॉर्ड नहीं मिला तो ये बात उन्हें बहुत चुभी।

खैर, कहते हैं ना अगर आप शिद्दत से किसी भी चीज को चाहो, तो पूरी कायनात आपको उससे मिलाने में लग जाती है। बिल्कुल ऐसा ही अभिनेता के साथ होने वाला था। जाने-माने पटकथा लेखक, फिल्म निर्देशक तथा नाटककार गुलजार एक कहानी लिख रहे थे और उन्होंने प्रोड्यूसर रमेश शर्मा से उन्हें मिलने को कहा, क्योंकि ये एक राजनीति पर आधारित फिल्म थी।

शशि निर्माता से मिले ने उन्होंने साफ-साफ कह दिया कि फिल्म का बजट ज्यादा नहीं है, आपको पैसा नहीं दे पाऊंगा। 1986 में रिलीज हुई इस फिल्म का बजट महज 35 लाख था और शशि कपूर को फिल्म की कहानी इतनी उम्दा लगी कि उन्होंने एक लाख रुपए में इसमें काम करना स्वीकार कर लिया गया था, बाद में फिल्म में पांच प्रतिशत का शेयर भी मांगा था, जो शायद मिला नहीं।

 फिल्म की शूटिंग पहले दिल्ली में हो रही थी, लेकिन फिर इसकी लोकेशन दिल्ली से मुंबई में शिफ्ट करनी पड़ी। दरअसल, उस दौरान पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मौत के बाद दिल्ली में सिख दंगों भड़के हुए थे, जिसके चक्कर में फिल्म लेट भी हो गई थी और मुंबई भी शिफ्ट करनी पड़ गई।

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उल्लेखनीय है कि मामला यहीं नहीं रुका फिल्म की रिलीज से पहले ही उस पर दो कोर्ट केस लाद दिए गए। एक फिल्म के उस डायलॉग को लेकर किया गया जिसमें शशि कपूर अपनी लॉयर बीवी शर्मिला टैगोर से कहते हैं कि सारे लॉयर लायर(झूठे) होते हैं।

दूसरा केस इस बात पर कि इस फिल्म में एक नेता को दंगे भड़काते दिखाया गया था। किसी नेता के समर्थक ने ये केस कर दिया था। इन्हीं केसों के चलते ही आखिरी मिनट पर फिल्म को दूरदर्शन ने भी रिलीज करने से मना कर दिया था।

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