बदलती महिलाओं की छवि है 'वीरे दी वेडिंग'

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नई दिल्ली:

आपने 2001 में रिलीज हुई फिल्म 'दिल चाहता है' जरूर देखी होगी, जिसमें तीन दोस्त अपने ढंग से जिंदगी जीने निकल पड़ते हैं, ठीक इसी तर्ज पर रिलीज हुई है 'वीरे दी वेडिंग', जिसमें चार प्रमुख महिला किरदारों का समाज को लेकर अपना अलग दृष्टिकोण है। इसमें आज के दौर की महिलाओं की इच्छाओं को बेहतर ढंग से उजागर किया गया है।

ये महिलाएं पुरुषों की तरह सिगरेट, शराब पी रही हैं। शादी से पहले शारीरिक संबंधों को लेकर अधिक मुखर हो गई हैं। इतना ही नहीं, अपनी निराशा गालियों के जरिए जाहिर करने में भी नहीं हिचकिचातीं।

इन मुद्दों को सामने रखती है फिल्म

यह फिल्म अरेंज मैरिज, इज्जत और शानो-शौकत के नाम पर शादी में बेहिसाब खर्च, खुद की मर्जी से प्रेमी के साथ भागकर शादी करने जैसे मुद्दों को सामने रखती है।

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गांव ही नहीं, शहरों में भी आज का समाज युवतियों को उनके मनपसंद जीवनसाथी चुनने पर उचकता है, समाज को पुरुषों की तरह महिलाओं के सिगरेट या शराब पीने पर ऐतराज है। अगर महिला सार्वजनिक रूप से अपनी कुंठा को गालियों के जरिए जताती है तो यही पितृसत्तात्मक समाज नाक-भौंह सिकोड़ने लगता है। शादी से पहले यौन संबंधों की चर्चा करे तो हाय-तौबा मच जाती है। आधुनिक महिलाओं की यह छवि हालांकि पचने लायक नहीं है, तभी खुलेतौर पर इसका विरोध भी होता है।

ये है फिल्म की कहानी

करीना, सोनम, स्वरा और शिखा चार बेस्ट फ्रेंड्स हैं। फिल्म की कहानी करीना की शादी के इर्द-गिर्द घूमती है। वह शादी करना चाहती हैं, लेकिन कमिटमेंट्स से डरती हैं। इसके साथ ही इंडियन फैमिली में कितनी उम्मीदें जुड़ने लगती है, यह देखना मजेदार है।

वहीं, सोनम का फोकस करियर पर है। स्वरा बिंदास हैं और अपनी शर्तों पर जिंदगी जीना पसंद करती हैं। शिखा की कहानी कुछ अलग है।

डायरेक्टर शशांक घोष ने पहला हाफ बहुत ही मजेदार बनाया है, लेकिन सेकेंड हाफ सिर्फ करीना के कैरेक्टर के आसपास ही नजर आता है, जो कहानी को थोड़ा-सा स्लो कर देता है।

एक्टिंग और गाने हैं शानदार

करीना कपूर ने जबरदस्त कमबैक किया है। उनकी एक्टिंग शानदार रही है। सोनम कपूर भी अपने कैरेक्टर में ढली नजर आईं। शिखा तल्सानिया ठीक-ठीक हैं, लेकिन स्वरा की एक्टिंग यादगार है। गानों की बात करें तो 'तारीफां', 'भंगड़ा ता सजदा' और 'पप्पी ले लूं' जैसे गानें लोगों के जुबान पर हैं। 

लोगों का क्या है कहना?

गुड़गांव में एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत विधि जैन (45) कहती हैं, 'महिलाओं का आधुनिक होना सही है, लेकिन आजकल आधुनिकता के नाम पर फूहड़ता ज्यादा हो रही है। लड़कियों की एक बड़ी आबादी टशन में शराब और सिगरेट पी रही हैं। ब्वॉयफ्रेंड कल्चर की तो बात ही छोड़ दीजिए। फेमिनिज्म के नाम पर फूहड़ता ही तो फैलाई जा रही है।'

मीडियाकर्मी नेहा भसीन (28) इससे अलग राय रखते हुए कहती हैं, 'फूहड़ता को सिर्फ महिलाओं से जोड़कर क्यों देखा जाता है। क्या सिर्फ महिलाएं ही सिगरेट या शराब पीकर कल्चर खराब कर रही हैं? पुरुषों के शराब या सिगरेट पीने पर हल्ला क्यों नहीं मचता? क्या पुरुष को शादी से पहले यौन संबंध बनाने का कानूनी अधिकार मिला हुआ है? अक्सर सुनने को मिलता है कि लड़की ने भागकर शादी की, लेकिन उसके साथ कोई लड़का भी तो घर से भागता है, उस लड़के का कभी जिक्र क्यों नहीं होता।'

महिला अधिकार कार्यकर्ता मोना माथुर कहती हैं, 'आज के दौर में महिलाओं की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। पहले की तरह शादी कर घर बसाना उनकी लिस्ट में काफी नीचे चला गया है। वह अपनी जिंदगी अपनी शर्तो पर जीने में यकीन करती है। वह सब कुछ करना चाहती है, जो पुरुष करते आए हैं।'

'वीरे दी वेडिंग' ने महिलाओं के उन मुद्दों को उठाया है, जिसे लेकर समाज में दबी जुबान में बात होती है। मसलन, यही कि शादी करने की एक उम्र होती है, भागकर शादी करना परिवार का नाम मिट्टी में डुबोना है। यदि कोई महिला शादी नहीं करना चाहती तो उसके इस फैसले का सम्मान क्यों नहीं किया जाना चाहिए, महिलाओं का वजूद सिर्फ शादी से तो नहीं है।

फिल्म के ट्रेलर में सोनम कपूर का एक डायलॉग रह-रहकर याद आता है, 'कितना भी पढ़-लिख जाओ, डॉक्टर-इंजीनियर बन जाओ, लेकिन जब तक गले में मंगलसूत्र नहीं लटकता, हमारा कोई वजूद ही नहीं है।'

यहां देखें फिल्म का ट्रेलर:

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