आज ही के दिन लगी थी भारत के संविधान पर मुहर!

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नई दिल्ली:

26 नवंबर...वो दिन जब 68 साल पहले दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र यानि भारत के संविधान पर मुहर लगी। संविधान सभा की 2 साल 11 महीने और 17 दिनों की कड़ी मेहनत और हजारों संशोधन से बनकर तैयार हुए भारतीय संविधान पर साल 1949 में इसी दिन सहमति बनी, जिसके बाद 26 जनवरी 1950 से भारत में संविधान लागू हुआ। समाज को निष्पक्ष न्याय प्रणाली मिली। नागरिकों को मौलिक अधिकारों की आजादी मिली और कर्तव्यों की जिम्मेदारी भी।

भारत की पहचान रहा है लोकतंत्र
किसी भी मुल्क के संविधान का निर्माण उस मुल्क के अतीत के आधार पर ही होता है। प्राचीन भारत में वैदिक काल से ही लोकतांत्रिक शासन-प्रणाली मौजूद थीं। ऋग्वेद और अथर्ववेद तक में सभा और समिति का जिक्र मिलता है। कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' और शुक्राचार्य की 'नीतिसार' में संविधान की ही झलक मिलती है।

कैसे बने संविधान निर्माण के हालात?
अंग्रेजी शासन में देखें तो 1857 की क्रांति के दौरान ही भारत में संविधान की मांग उठ चुकी थी। उसी दौरान हरीशचंद्र मुखर्जी ने संसद की मांग की थी। 1914 में गोपाल कृष्ण गोखले ने भी संविधान को लेकर अपनी बात रखी। अंग्रेजों ने इसे लेकर अपनी सहमति तो दी, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ सकी। 1922 में महात्मा गांधी ने भारत का संविधान भारतीयों द्वारा ही बनाने पर जोर दिया। 1928 में मोतीलाल नेहरू इसे लेकर स्वराज रिपोर्ट पेश की। इस बीच 1935 में अंग्रेजों ने "गर्वमेंट ऑफ इंडिया एक्ट" बनाया, जिसे कमजोर करार दिया गया। इसके चलते कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच की दूरियां भी बढ़ीं। इसके करीब 10 साल बाद डॉ. तेजबहादुर सप्रू ने सभी दलों के साथ मिलकर एक संविधान का खाका बनाने की पहल की।

दूसरे विश्व युद्ध से बदले हालात
इधर दूसरे विश्व युद्ध में चर्चिल की हार के बाद तत्कालीन सरकार ने 3 मंत्री भारत भेजे, इसे 'कैबिनेट मिशन' का नाम दिया गया, लेकिन कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों के ही विरोध के चलते ये सफल नहीं हो सका। इस दौरान मुस्लिम लीग की बंटवारे की राजनीति और हिंसा को बढ़ावा मिला। इस सबके बीच ही आगे चलकर संविधान सभा का गठन हुआ। डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा को संविधान सभा का कार्यकारी अध्यक्ष चुना गया जबकि डॉ. राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष चुने गए। इस संविधान सभा के वजूद और मकसद पर चर्चिल और मुस्लिम लीग समेत बाकियों ने सवाल भी उठाए, लेकिन सभी सवाल बेबुनियाद निकले। संविधान सभा ने गंभीरता और लगन से अपना काम किया और आकार दिया दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के संविधान को, जो ​दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान भी था।

कितने संविधान साक्षर हैं हम?
संविधान लागू हुए 67 साल बीत चुके हैं। इस लंबे वक्त में लोकतंत्र दिनों दिन परिपक्व हुआ है। विकास के नए कीर्तिमान स्थापित हुए हैं, लेकिन 'संविधान साक्षरता' अभी भी बड़ी चुनौती है। आबादी के बड़े हिस्से को अपने संविधान की बुनियादी जानकारी तक नहीं है। इसी को ध्यान में रखकर मोदी सरकार ने बीते दिनों ‘संविधान साक्षरता’ पर जोर दिया। जाहिर है विशाल आबादी वाले मुल्क् को भी समझना जरूरी है कि संविधान बनाने वालों ने समाज के लिए आखिर सपना क्या देखा था? और 2018 आते-आते उम्मीदों का यह सफर किस पड़ाव पर आ पंहुचा है? जाहिर है संविधान पर मुहर लगने के 68 साल बाद आज इस पड़ाव पर संविधान निर्माताओं के मकसद के मौजूदा हालात को जानने की ईमानदार कोशिश जरूरी है।

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